सफरनामा

21 नवंबर, 2010

राजनीति के दरिद्र दिनों में राहुल गांधी


राहुल गांधी का एडवेन्चर और कौतुक के प्रति विशेष आग्रह है। उन्हें सरकारों से लेकर आम आदमी तक को चौंकाना बहुत भाता है। मीडिया अब चौंकता नहीं बल्कि उनसे हर दिन नई लीला की आशा करता है। वे अपनी सुरक्षा की परवाह किए बिना कहीं भी, कभी भी पहुंच जाते हैं। ऐसा करते हुए वे उस कौतुक प्रिय बच्चे की उत्तेजना से भरे होते हैं जो दबे पांव पीछे से आकर आपकी आंखें बंद कर लेता है। पहचान के सारे अनुमान विफल होने के बाद जब आंखे खुलती हैं तो खेल में यह उसके लिए सफलता और आनंद का क्षण होता है। यह जाना-पहचाना अप्रत्याशित घटित करना ही राहुल गांधी की राजनीति का स्थायी भाव है। राहुल गांधी अमेठी से दो बार सांसद हो चुके और इसी बीच युवा से अधेड़ में बदल गए। यदि उनके नाम के आगे अब भी बाबा (बच्चा) का विशेषण मजबूती से चिपका हुआ है तो इसमें उनकी खिलवाड़ी राजनीति और ऊटपटांग बयानों की बड़ी भूमिका है।

राहुल बाबा पर बड़ा बोझ है। उनका जगप्रसिद्ध खानदान, खानदान की स्मृति और भंगिमाओं से चलती कांग्रेस पार्टी और तमाम लोग उन्हें भविष्य के प्रधानमंत्री के रूप में देखते हैं। अपने वंश के प्रधानमंत्रियों को छोड़ कर, वे अब तक हुए बाकी तमाम प्रधानमंत्रियों की तरह नहीं होना चाहते। वे वंश परंपरा में कुछ नया और विलक्षण जोड़ना चाहते हैं इसलिए प्रधानमंत्री बनने के पहले भारत और उसकी आत्मा (जो आम आदमी की आंखों में झिलमिलाती बताई जाती है) को अच्छी तरह समझ लेना चाहते हैं। पढाई पूरी करने के बाद राहुल गांधी मुंबई में एक टेक्नालाजी आउटसोर्सिंग की एजेंसी चलाना चाहते थे। तब उन्होंने धंधा जमाने के लिए अपने उपभोक्ताओं की आत्मा में झांकने के इतने व्याकुल और दुस्साहसिक प्रयास कभी नहीं किए। उन्हें पता था कि धंधे का अपना गणित है उसके नियमों का पालन करने से वह चल ही जाएगा लेकिन यहां देश चलाने की तैयारी है इसलिए कौतुक घटित हो रहे हैं। भारत की आत्मा कोई प्रोटोकाल नहीं मानती सो उसके निकट जाने में सुरक्षा का प्रोटोकाल टूट जाता है।

वे दलितों के घर जा रहे हैं, वे ट्रेन में सफर कर रहे हैं, उन्होंने रेस्टोरेन्ट में चिकेन रोल खाया, उन्होंने कुल्हड़ में चाय पी, हैन्डपम्प का पानी पिया...ये सब मीडिया की सुर्खियां हैं जिसकी पृष्ठभूमि में भकुआए साधारण लोग हैं जो राहुल बाबा को ताक रहे हैं...इतने बड़े राजनीतिक खानदान का वारिस और यहां। यह सब उस दौर में हो रहा है जब राजनीति में कामयाब होने वाला हर शख्स जनता के लिए दुर्लभ है। हर दिन कोई न कोई नेता जनता की भीड़ से निकल कर सत्ता के गलियारे में खो जाता है और यहां एक आदमी सत्ता के शीर्ष से जोखिम उठाकर जनता के बीच आ रहा है। वे कुछ करते नहीं बस जनता से मिल लेते हैं। उनके पास कहने और करने को कुछ खास है भी नहीं। राजनीति आम आदमी से दूर होकर बहुत दरिद्र हो गई है जहां नेता का जनता से मिलना घटना है, खबर है। यहां से देखें राहुल गांधी अपने खानदान से ज्यादा राजनीति की दरिद्रता की उपज हैं। जिन लोगों ने भविष्य के प्रधानमंत्री से हाथ मिलाए हैं वे अपने हाथों का क्या करें। वह सिर्फ एक स्पर्श है जिसमें हाथ मिलाने वाले की जिन्दगी और समाज बदलने के भरोसे की जगह ढेर सारा क्षणजीवी, अर्थहीन ग्लैमर है।

यह लोकतंत्र है जहां राजा रानी के पेट से नहीं बैलट बाक्स से पैदा होता है। एक मिनट के लिए यह सोचा जाए कि राहुल गांधी अगर प्रधानमंत्री नहीं बन पाते तो उन्हें भविष्य में किस तरह के राजनेता के रूप में याद किया जाएगा। शायद कुछ इस तरह- वे अधेड़ होने तक हर तरह के जोखिम उठाकर जनता को समझने का प्रयास करते रहे, काफी कुछ समझ भी गए थे लेकिन यह समझदारी किसी काम नहीं आ सकी क्योंकि वे राजनीति नहीं कर रहे थे राजनीति की दरिद्रता का आनंद ले रहे थे।

9 टिप्‍पणियां:

  1. अनिल जी, बहुत ही अच्छा लिखा है|
    राहुल गाँधी जी की ये आदत कुछ कुछ राखी सावंत टाइप है :) अब आदत पड़ गयी है तो उनसे नए ड्रामे की उम्मीद बनी रहती है|

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  2. हाँ...यह भी एक नजरिया है देखने का...सही है गलत यह तो वक्त बताएगा।
    ..दरिद्र राजनीति की उपज के स्थान पर एक अभागी पुत्र का अपने दायित्वों के लिए..अपनी बुद्धि के अनुसार किया जाने वाला संघर्ष भी तो कहा जा सकता है!

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  3. बिल्कुल देवेन्द्र जी आपकी करूणा से इत्तेफाक है। लेकिन इस संघर्ष की प्रकृति और उसके भविष्य पर बात करने में क्या हर्ज है।

    फर्ज कीजिए देश में इस वक्त युवा अपनी मेधा कैरियर में झोंकने के बजाय जनता के लिए जूझ रहे होते तो उनके आगे राहुल के लटके कहां ठहरते।

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  4. श्रीमान अनिल जी, आप यह क्‍यों कह रहे हैं कि फर्ज कीजिए ...
    इससे तो यही जान पड़ता है कि देश के सारे युवा आत्‍मोत्‍थान की लाइन पर ही चल रहे हैं जबकि ऐसा है नहीं।
    शुरुआत तो दो पक्षियों के सुर मिलाने कसे ही हुई थी फिर आगे की कहानी तो आपको पता ही है।
    मैं तो उद़दाम आशावादी हूं कि राह खोजने का काम ठीक दिशा में हो रहा है।

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  5. Dilchasp dhang se likha gaya gambheer lekh. ek tarh se yh gareebon ka majaak udaane ki hi rajneeti hai. jis party ki poori rajneeti gareebon ko bebas banane ki arthneeti se sanchalit ho, us party ka rajkumar aise hi kautuk se janta ko ullu banana chahta hai.

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  6. nice articele..liked it !

    waise bhi rahulG, garibo ke ghar jo nightout marte hain, wha jo naye tarike ke khane ka enjoy karte hai..wo bechare garibo ka ek waqt ka bhojan hota hai !

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  7. Rahul ka ye totka hai sirf vote bank majboot karne ka. kya Rahul chori chupe kabhi kisi garib ke ghar jate hai? unki kisi samsya ko suljhate hai ya ki badhate hai? Jis kisi garib ke ghar ye gaye hai inke aagman se pahle us garib ko surakha aur anya karno se kitni pareshaniya jhelni padi hongi ye to bhagwan hi janta hoga.

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