सफरनामा

21 दिसंबर, 2008

इस चाभी से खुलेगा क्या यह जंग लगा ताला


ये भारत रहे जी जो पिछले पांच साल में घटी आतंकवादी घटनाओं से दहल गए हैं। अब वे एक नए घर में शिफ्ट कर रहे हैं जिसका नाम रा.इच्छाशक्ति रखने की सोच रहे हैं। उनके हाथ में ताजा किताब है जिसमें वह नया कानून लिखा है जो उन्होंने आतंकवाद को ठिकाने लगाने के लिए हाल में ही बनाया है।
(इलस्ट्रेशन किसका है यह राइट क्लिक करके जाना जा सकता है।)

20 दिसंबर, 2008

कुहरे में दुविधा बाबू


जिंदगी जिस रफ्तार से भागी जा रही है,(हालांकि भाग कर वह कहीं पहुंच नहीं पा रही है) उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि जमाने बाद....तो जमाने बाद दुविधा बाबू, कुहरे में सड़क पर जाते दिखे। यह जाना भी कोई जाना था। एक पैर उठ कर हौले से धुंध में लुप्त हो जाता था, कुछ देर बाद दूसरा अकेला पैर नजर आता था। उनके दोनों पैर, जन्म से एक दूसरे के लिए अजनबी हैं। इसी कारण अपनी जिंदगी में वे कहीं पहुंच नहीं पाए हैं।

वे एक पान की दुकान पर रूके। जेब से लाइटर निकाल कर गुमटी के एक कोने को घूरते रहे। उन्होंने एक च्यूंइगम मांगा। उनकी आवाज में खुरदुरी और अकंप कोई चीज हमेशा से थी जो जमाने बाद उन्हें फिर अच्छी लगी। बहुत दिनों बाद शायद उन्होंने अपनी आवाज सुनी होगी। उन्होंने चार च्यूंइगम और ले लिए। पनवाड़ी उन्हें देखकर कुछ इस अंदाज में मुस्कराया जैसे वे रात में गॉगल लगाए टहल रहे हों। उसने उनके हाथ में लौंग से तीन फूल रख दिए।

कुछ दूर जाकर मेडिकल स्टोर से उन्होंने दो रूपए की सुआलीन की चार गोलियां खरीदीं। खांसी उन्हें महीने भर से आ रही थी लेकिन वे सुन ही नहीं पा रहे थे। आज अपनी आवाज सुनी तो खांसी का भी ख्याल आया होगा। एक चीनी कहावत भी याद आई कि सबसे ऊंचे पहाड़ पर चढ़ने की शुरूआत एक छोटे से कदम से होती है। (अपने यहां भी होगी लेकिन दुविधा बाबू चीन के चेयरमैन को अपना बाप कहने वालों की सोहबत में काफी रहे हैं)

कोई डेढ़ किलोमीटर तन कर सधी चाल से चले होंगे कि एक भारतीय कहावत ने उन पर हमला कर दिया जिसके अनुसार केश लुंचन से मुर्दे का वजन हल्का नहीं हो जाता। फिर दूसरी कहावत आई कि गोबर सुंघाने से चुहिया जिंदा नहीं हो जाती फिर तीसरी कि पाव भर जीरे से ब्रह्मभोज के मंसूबे बांधने का अभी वक्त नहीं आया है। और उनकी चाल शिथिल पड़ गई।

उनके पास चीनी कहावत अदद एक थी और देसी की कोई गिनती नहीं। यानि वे देशी हैं चीनी उनको सूट नहीं करती। टहलते-टहलते आधी रात हो गई और उन्होंने पाया कि सारी दुकानें बंद हो चुकी हैं और उन्हें बहुत तेज प्यास लगी है। प्यास का कोई तर्क नहीं था उसमें बस शक्ति थी, वह दुविधा बाबू को उद्देश्यपूर्ण ढंग से चलाते हुए वहीं ले गई जहां से वे चले थे।

30 अक्तूबर, 2008

हिचकी, एक सपना ऑनलाइन


कहते हैं कि कोई याद करता है, तब वे आती हैं। बचपन में कई टोटके सिखाए थे नानी ने। उनमें से एक यह था कि अपने पैर की धूल गले पर लगा लो, ठीक हो जाएंगी। क्या पता इसके पीछे यह सोच हो... हिचकी को सबूत के तौर पर पैरों की धूल पेश कर दी गई है। जा कह दे उससे जो याद कर रहा-रही है मैं निकल पड़ा हूं सफर में और हिचकी इस दिलासे से सो जाती हो।

लेकिन अब पैरों में धूल ही कहां लगती है जो उसे गले पर लगाएं। स्लीपर के नीले रबड़ की अरूचिकर गंध से क्या किसी को किसी भी तरह की दिलासा दी जा सकती है। चाहे वह हिचकी ही क्यों न हो।

जी में आया एक ई-मेल लिखकर सेन्ड आल कर दूं। दोस्तों, दुश्मनों कहा सुना माफ करो, सोने दो अब। झटका खाते-खाते पसलियां दर्द करने लगी हैं।

तीन घंटे हो चुके। मैं सारी इच्छाशक्ति बटोर कर सोचता हूं अब नहीं आएगी। काफी देर तक नहीं कोई सुराग नहीं। जरा सा ध्यान बंटता है कि कॉलर बोन के नीचे चुप्पा निर्वात बनता है और हुच्च...।

नींद, मुझे हिचकी समेत अपने भंवर में खींचे लिए जा रही है। मैने हिचकी और नींद दोनों के आगे समर्पण कर दिया है। अब जो करना है तुम्हीं दोनों करो, दुनिया के सिखाए सारे तरीके विफल हो चुके हैं। दुनिया खुद नींद न आने से परेशान है और अंधी लालसाओं के पीछे हुच्च..हुच्च करती भागी जा रही है।

...................जाडों का धवल हिमालय है और एक रिज पर बंगी-जंपिंग का प्लेटफार्म है।

काले रबड़ की विशाल कुंडली मारे रस्सियां तेज सनसनाती हवा में हिलती हुई बुला रही हैं....आओ अपने अस्तित्व अनिश्चतता में, अपने अनजाने भय, अपनी सारी दुश्चिंताओं में बिना कुछ सोचे-समझे कूद पड़ो। जिंदगी में तुम्हारी सारी कारीगरी (प्लानिंग) इस अनिश्चय से बचने के लिए ही है तो है। एडवेंचर नब्बे फीट.. अमेच्योर तीस फीट दो प्लेटफार्म हैं।

नब्बे फीट वाले प्लेटफार्म की तरफ बढ़ते हुए सोच रहा हूं दफ्तर की मेज से वाया बाइक की गुदगुदी सीट घर के आरामदेह बिस्तर की आदी निस्तेज, मुलायम पड़ती देह क्या यह झटका झेल पाएगी। अब तक के भीषणतम एडवेंचर, पलंग के सिरहाने तीन तकियों की टेक लगाकर किसी किताब के मटमैले पन्ने पर ही तो किए गए हैं। कहीं ऐसा न हो कि घुटनों से जरा आगे तक सिर्फ दोनों टांगे ही ऊपर आएं.....................।
जरा सा अल्कोहल भी है कहीं ऐसा तो नहीं गुरूत्वाकर्षण खून के दबाव को उकसा कर आंख, कान और मुंह से उसे बाहर ही बुला ले। लेकिन जिन कबीलों में अब भी किसी पेड़ की इलास्टिक जटा को पैर में बांध कर आदिवासी बंगीपना करते है वे तो त्यौहार में टन्नावस्था में ही होते हैं। ऐसी एक फोटो मैने मटमैले पन्ने वाली किसी विदेशी किताब में देखी थी। पर कहां जंगल के अधियारे में अपने पुरखों की आत्माओं को देख लेने वाला आदिवासी का मन और हैलोजन के लैंप पोस्ट के नीचे अपनी बीवी को फोन न कर पाने के लिए बीएसएनएल के नेटवर्क को कोसते तुम। वह प्रकृति में है और तुम बाहर उसमें प्रवेश के लिए किसी तकनीक के मोहताज।

...............सारा डर, सारी उत्तेजना को आदतन भींच कर, मैं खुद को बस गिर जाने देता हूं। मैं चीखता नहीं क्योंकि हर दिन ढेरों अचरजों पर तटस्थ रहने का आदती हो चला हूं। बस एक आंधी जैसी सीटी गले और कान के पास बज रही है जिसे सिर्फ मैं सुन सकता हूं। एक खामोश लंबी यात्रा शुरू होती है...हरा, काई में लिपटा अंधेरा भागा जा रहा है....नीले आसमान की कौंध....पंख फैलाए निश्चिंत गोल चक्कर घूमती एक चील की झलक....भागता अंधेरा। प्रतीक्षा....प्रतीक्षा....प्रतीक्षा.....वह झटका और मैं वापस उछाल दिया जाऊंगा फिर निश्चित ही जमीन की तरफ लौटने की यात्रा शुरू होगी।

झटका...फिर झटका मैं आज जरूर दो टुकड़े हो जाऊंगा। एक तेज पतली, पानी की धार है जिसके हाथ भर ऊपर मैं झूल रहा हूं। यह क्या...............।

रबड़ की दोनों रस्सियां टूट चुकी हैं। अब सेफ्टी बेल्ट में बंधी नायलॉन की एक रस्सी है जिसने मुझे गिरकर तरबूज की तरह फट जाने से बचा लिया है। आय स्पाई। आय स्पाई।। एक शरारती सा विचार....अब मैं उस दुनिया से चुपचाप गायब हो सकता हूं। पुलिस, एम्बुलेंस, हेलीकाप्टर, रिमोट सेंन्सिंग वगैरा के खिलौनों पर चढ़कर ढ़ूढने दो लपुझन्नों को। .....तेली कछम कबूतर पाले, आधे गोले-आधे काले........।



मैं सेफ्टी बेल्ट को खोल कर खड़ा हो जाता हूं। पैरों में पानी की चीर देने वाली ठंडक लगते ही सामने घराट पर बैठी एक बुढिया दिखाई देती है जो बकरियां चरा रही है। वह बड़ी देर तक मेरी तरफ हाथ चमका-चमका कर बड़बड़ करती रहती है। मैं हंसने के सिवा कुछ नहीं समझ पाता।

दो साल हुए एक गांव में हूं। इस घाटी में एक छोटी सी सुरंग से ही घुसा जा सकता है। वहां का आदमी तो छोड़ो को जंगली जानवर भी अगर बच्चा नहीं है तो इस छेद से अंदर नहीं आ पाएगा। खेती करने, जानवर चराने और एक किलोमीटर दूर से हर दिन बारह-पंद्रह डोल पानी भर कर लाने से पुट्ठे फिर से मजबूत हो गए हैं। बच्चों के साथ कपड़ों की थिगलियों से बनी फुटबाल खेलता हूं। रात में एक ढिबरी की रोशनी में अपनी पिछली जिंदगी और इस दुनिया का मीजान कागज पर मिलाता हूं। इस सपने के कई रंग और भी हैं लेकिन वह मैं नहीं बताने वाला।

...............बस मैं वापस नहीं लौटना चाहता।

19 अक्तूबर, 2008

करवा-चौथ का चांद


घड़ी से बेहतर गर्मियों के बारे में बताता है एक कीड़ा,
दिनों का जिन्दा कैलेंडर है स्लग (शराब का प्याला और कवचहीन घोंघा दोनों अर्थों में प्रयुक्त)
यह क्या बोलेगा मुझसे, जब एक कालातीत कीट
कह रहा है कि ये दुनिया छीज रही है?


ये लाइनें हैं डायलान थॉमस (1914-1953) की जो अपनी कीर्ति में स्नान करते हुए, अतीव शराबखोरी के कारण बस ३९ साल की उम्र में न्यूयार्क में मरे। बस और क्या।

वैसे स्वैन सी वेल्स में जन्मे, लंदन में पढ़े. बीस साल में पहला कलेक्शन आया जो सर्रियलिज्म और अथाह कल्पनाशीलता के कारण बेहद मकबूल हुआ. अगले पंद्रह सालों में चार-पांच कलेक्शन और आए जो भाषा की ताजगी और बदहवास आदमी के भीतर झांकती कवि-आंख के कारण जाने गए. डाक्यूमेंटरी मोशन पिक्चर्स के लिए पटकथाएं लिखीं, उपन्यास भी लिखा. दूसरी बड़ी लड़ाई के बाद बीबीसी में साहित्यिक टिप्पणीकार रहे. असली ख्याति मिली एक रेडियो ड्रामे अंडर मिल्क वुड से जो उनके गुजरने के बाद १९५४ में छपा. अभी यह ड्रामा अधूरा था कि डायलान ने इसका अपने ही अंदाज में कैम्ब्रिज मैसाचुएटस में पाठ किया. पाठ के अंदाज के कारण थॉमस अमेरिका में लीजेंड बन गए. पता नहीं, उनकी
विलक्षण कविताओं से ज्यादा उनके पढ़ने के अंदाज की बात क्यों होती है.

चांद में बैठा मसखरा

मेरे आंसू हैं, खामोश मद्धिम धारा
बहती जैसे पंखुड़ियां किसी जादुई गुलाब से
रिसता है मेरा दुख सारा
विस्मृत आकाश और बर्फ के मनमुटाव से.

मैं सोचता हूं, जो छुआ धरती को मैने
कहीं छितर न जाए भुरभुरी
यह इतनी दुखी है और सुंदर
थरथराती हुई एक स्वप्न की तरह.

18 अक्तूबर, 2008

करवा चौथ पर श्री टेलीविजन को पत्र



श्री टेलीविजन जी,

कल करवा चौथ है. सो आज भीषण शापिंग के चलते मेरे शहर की सड़कें जाम थीं. बिल्कुल नई दुल्हन सा सजना होता है इसलिए सबकुछ नया चाहिए होता है. कांच की चूडियों को टूटने से बचाने के लिए सेफ्टी पिन और टूथब्रश भी.

जाम में फंसी दयनीय ढंग से सजी औरतें देखीं, ब्यूटीपार्लर श्रमिकों के घनघोर परिश्रम के बावजूद लटकते लोथड़ों, जीवन की सोहबत छोड़ चुकी त्वचा, झुर्रियों समेत वे ध्यान खींच पाने में विफलता के क्षोभ से चमकती आंखों से वे मेंहदी रचे, कुचीपुडी नृत्य की मुद्राएं बनाते हाथों को कारों की खिड़कियों से बाहर झुलाते निहार रहीं थी। सौंदर्य-विज्ञान की विफलता पर बेहद क्रोध आया कि वह इन अरमानों से उफनाती औरतों की सहायता क्यों नहीं कर सकता, इराक पर बम गिराने वालों की तो लाल-भभूका दृश्यावलियां रच कर करता है. क्रोध उन सुंदर लड़कियों पर भी आया जो सूरत का सत्यानाश कराकर गांवों की रामलीला में मुर्दाशंख पोते सेत्ता जी से मुकाबला कर रहीं थीं.

उनके भीतर आप थे. आप के भीतर वे थीं और सामने सोफों पर बैठे लाखों पुरूषों से संबोधित थीं. एक भी औरत किसी सोफे पर क्या मूढे या बोरे पर भी नहीं बैठी थी. वे मादा दर्शक नहीं चाहतीं थीं. क्योंकि वह रीझती नहीं, सराहती नहीं, ईष्याग्रस्त हो जाती है और विवाहेतर संबधों वाले सीरियलों के बारे मे बात करने लगती है.

निर्जला व्रत होगा. चलनी से चांद देखा जाएगा और उसी से पति को देखा जाएगा. तब भी वे आप ही के भीतर होंगी और उनके भीतर आप होंगे.

एक लड़की ने मेंहदी लगवा ली लेकिन कहा कि वह व्रत नहीं रहेगी. पड़ोसनें उसे कोसने लगीं. घर लौटते उसने अपनी दोस्त से कहा कि इनमें से कई की अपने पति से शाम ढलने के बाद बातचीत बंद हो जाती है. वे इस उम्मीद में सज रहीं हैं कि शायद, शादी की स्मृति ताजा हो जाए और रातों का जानलेवा सूनापन टूट जाए. मैं चाहता हूं कि ऐसा ही हो. लेकिन उस क्षण भी वे आप ही के भीतर रहना चाहती है.

मैने शहर आने के बाद या कहिए डीडीएलजे देखने के बस जरा पहले ही इस राष्ट्रीय से लगते पर्व का नाम सुना था. आज मेरी बूढ़ी मां ने अपनी बहू को धमकाया उस लफंडर के चक्कर में न आना वह तो मुझे जीऊतिया (इसका तत्सम वे भरें जिन्हें हिंदी से प्यार है) का व्रत भी नहीं रहने देना चाहता था. तू अपने सुहाग की फिक्र कर बेटी. आपने अपनी छवि-लीला से मनोरंजन-प्रिय उस किसान बुढ़िया का दिमाग भी धो डाला है जिसके कबीर-पंथी पिता यानि मेरे नाना ने उसे आत्मनिर्भर बनाने के लिए चरखा कातना सिखाया था और एक एक दम नया ब्लेड लाकर दिया था कि दाईयों का हंसिया छीन लिया करो और उनके साथ जाकर बच्चों की नाल काटो। बहुत सारी नन्हीं जाने टिटनेस से बचाई बाप-बेटी ने, चाचा नेहरू के जमाने में.

आपकी ताकत से आक्रांत पुलकित हूं कि काश आपने बस पढ़ना-लिखना और चांद, तारे, नक्षत्र, भाग्य, देवता, अपशकुन वगैरा को बस एक कदम पीछे हट कर गौर से देखना सिखा दिया होता. तो क्या होता? जरा सोचिए. भारत माता, गाय और ईश्वर के बीच में आपकी भी जगह होती.

इस चिट्ठी को शायद वे भी पढ़े जो अपनी पूंजी से उपग्रह और प्रसारण के अधिकार किराए पर लेकर आपको चलाते हैं। लेकिन आपके आगे अब उनकी भी खास औकात नहीं. आपकी टीआरपी पर रोकड़ा कदमताल करता है.

आपकी ताकत की बलिहारी हे चकमक चौकोर भस्मासुर। विध्वंसक लालसाओं के लहकावन.

जै हिन्द।

मगन

मगन

15 अक्तूबर, 2008

आपका दिल हमारे पास है


इ. इ. कुमिन्ग (1864-1962)
नेट पर सबसे अधिक कौन कवि इधर पढ़ा गया. इस मटरगश्ती में ये सज्जन मिले. नाम है इ. इ. कुमिंग, अमेरिका के रहने वाले. ज्यादा परिचय का कोई खास मतलब नही है. सूरत कितनी जानी-पहचानी जैसे मेरे गांव के किसी आदमी को अंगरखे की जगह शर्ट पहना दी गई हो. खैर यह झूठ है वहां अब कोई टेलर मास्टर अंगरखा सिलता भी नहीं. असल चीज तो इनकी कविता है जो जीवन को वैसे पकड़ने की कोशिश करती है जैसा कि वह होता है. बिना चेतावनी दिए, बिना भाषा की मदद लिए या बिना अपने होने का पता दिए. अपने ही फार्म की निराली यह कविता पढ़िए। शीर्षक और अनुवाद मेरा। बाकी कुमिंग साहब का।

आपका दिल हमारे पास है
तुम्हारा दिल साथ लिए फिरता हूं ( मैं इसे अपने दिल में लिए रहता हूं ) बिना इसके कभी नहीं होता हूं
( कहीं जाऊं तुम जाते हो, और मुझसे जो भी हुआ तुम्हारा किया हुआ है, मेरी जान ) मुझे डर नहीं किस्मत का ( मेरी किस्मत तुम जो हो, प्रिये ) नहीं चाहिए मुझे दुनिया ( क्योंकि सुंदरी तुम दुनिया हो मेरी, असल मेरी ) और यह तुम हो जो भी हमेशा एक चांद होने का मतलब होता है और जो भी एक सूरज सदा गाएगा, तुम हो यहां है गहनतम रहस्य जिसे कोई नहीं जानता ( यह उस पेड़ के जड़ की जड़ है और कली की कली और आसमानों का आसमान जिसे जीवन कहा जाता है, जो बढ़ता जाता है आत्मा की संभवतम आशा या मन के रहस्यों से भी ऊंचा ) और यही वो अचरज है जो सितारों को अलग-अलग किए हुए है मैं तुम्हारा दिल साथ लिए फिरता हू ( अपने दिल में ही तो लिए रहता हूं )

14 अक्तूबर, 2008

जो शिकस्तः हो तो अज़ीज़तर

न बचा-बचा के तू चल इसे, तिरा आईना है वो आईना
जो शिकस्तः हो तो अज़ीज़तर, है निगाह-ए-आईनासाज़ में

... यह त्वरित प्रक्रिया मेरी पहली पोस्ट समझी जाय इस ब्लॉग पर. यहां पिछली दो पोस्टों का लिखा पढ़ने के बाद से ये शेर बस घुमड़ रहा था.

बाक़ी यूं है के:


आगे आते नहीं किसू की आंखों में
हो के आशिक़ बहुत हकीर हुए

अब जो मन में आएगा, यहीं आएगा!

दुर्गा दादा का गढ़वाल क़िस्सा आगे न चला पाने की जादों साब की हर अपील को ख़ारिज किया जाता है. सो अलग. इसी माह इसकी असल वाली सर्रीयल और असल किस्तें न आने पर सज़ा-ए-मौत का फ़रमान भी इस बिलाग को.

13 अक्तूबर, 2008

डालफिन की डूब


सोचा था जब तक दुर्गा दादा के साथ गढ़वाल में अकेलेपन की यात्रा होगी ब्लाग पर कुछ नहीं लिखूंगा। और कुछ लिखा तो शायद यात्रा न पूरी हो क्योंकि वैसे ही आलस्य का लालची मन कहीं और फंस गया तो लटक जाएगा। अशोक ने हुसका कर यह सिलसिला तुड़वा दिया तो अब यही सही। इन दिनों यह भी लग रहा है कि जो कुछ, जैसा हम संप्रेषित करना चाहते करना चाहते हैं चाहे जितनी कीमियागरी कर लिखें वह नहीं होना होगा तो नहीं होगा। क्योंकि पढ़ने वाले के भीतर एक केमिकल लोचा है, उसके साथ लिखे का केमिकल रिएक्शन होता है और एक नयी चीज उसके सामने आ जाती है। किसी भी टेक्सट का यह पाठक का अपना एकांतिक, एक्कदम्म....से अपना वाला अर्थ है जो उसके लिए बेहद कीमती है। लिखने का खेल, जैसे जीवन के विकास की दिशा अनिश्चत होती है वैसा ही है। लिखे जा चुके की पढ़ने और लिखने दोनों वालों से स्वतंत्र सत्ता है वह हर नए पढ़ने वाले के साथ नया अर्थ लेती जाती है यह बेहद दिलफरेब खेल है। इस लिए समझदार लोग कहते पाए जाते हैं कि लिखो, इसकी परवाह मत करो कि वह कैसा लिखा गया है। लिखने के पीछे अगर जिंदगी की कोई लय है, बात है, कुछ असल है तो वह अपनी फ्रीक्वेंसी वाले पाठक के भीतर रिजोनेट करेगी। पुल पैदल जाती पलटन अपनी कदमताल तोड़ देती है, कहीं रिजोनेन्स से पुल ही न टूट जाए। तानसेन वगैरा अपने गले से खिड़की, गिलास वगैरा अक्सर तोड़ा करते थे- ऐसा नतीजा मैने विज्ञान आओ करके सीखें- का एक पाठ पढ़कर मैने निकाला था।





सूनी शामों को सकल भुवन में झनझन
तमाशे से निराश डॉलफिन सा गोता लेकर
रक्त-दाब पाताल-मुखी होता जाता, होता जाता
डूब-डूब-डूब।
नहीं कोई सिर सहलाने वाला
नहीं प्रतीक्षा किसी की, चिर संगी अल्कोहल की भी
मटमैली रोशनी से रंगी आकृतियां जानी-पहचानी
पुतली की लय में भटकती हैं आंखों के आगे
थकन न जाने कितने जनमों की
स्पांडिलाइटिस फुसफुसाती गरदन, ऐंठती पिंडलिया
खुल गई है टोटी कोई पास ऐड़ी के
वजन है जिससे बहता जाता
जीवन में जो भी वजनी लगता था।
चालीस का तू छोकरे वहां
यूरो वाले जब लाइफ बिगिन किया करते हैं
वे तेरे नेट-भाई (यथा-गुरूभाई) ग्लोबल-गांव के रहने वाले
नाभि-नाल एक केबिल से बंधे हम दोनों
कॉफी, अंडा या पानी संग नमक की दांडी-यात्रा खून में
जैसे कोयला बीत चुके भाप के इंजन में
कुछ नहीं, कुछ नहीं, कुछ नहीं।
कुछ और, कुछ और, कुछ और।।
मसलन यही कि
कोई स्फुरण, कौंध कोई, कोई तो हो विचार
जिंदगी को कोई मकसद मिल जाए।
फौरन, अभी तुरंत
अरे। बिन मकसद, अब तक जीते आए?
हां बडा मजा था, बड़ा....
धरती पर पैर रखने को महसूसना ही सबसे बड़ा काम लगता था
और अकेले में तरह-तरह से मुंह बनाना कि
क्या सोचते होंगे ऐसी मुख-मुद्राओं वाले
फिर पता नहीं क्या हुआ?
क्या हुऊआ----?
विलाप से दहाड़ तक फटता एक सवाल
जिसकी लय पर डालफिन डूबती जाती है।

12 अक्तूबर, 2008

आशा से उन्मत्त


आज एक दोस्त से बात की. हमेशा करता था लेकिन आज जरा सी बात की. करनी ही थी. उससे न करता तो किसी पेड़ से करता, दीवार से करता, खुद से करते-करते थक चुका. उसने कहा कि देखता हूं, सोचता हूं, कुछ करते हैं। करते हैं, करना पड़ेगा, यह जरूरी है. अब मैं उन्मत्त हूं. मेरे पास फिर से आशा है. ठहर कर सोचता हूं कि यह कहने का साहस भी उसमें आखिर कैसे बचा हुआ है. विघ्नसंतोषी नहीं हूं. बस हैरत है जो बचपन से अब तक आंखों सी फैलती जाती है.

रचने की तड़पः उनकी और हमारी

अशोक पांन्डेः विन्सेन्ट वान गॉग को एब्सिन्थ पसन्द थी. और पॉल गोगां को भी. हल्के आसमानी रंग की यह दारू मैंने पहली बार प्राग के एक रेलवे स्टेशन पर ख़रीदी थी और अगले रोज़ प्राग में ही काफ़्का संग्रहालय जाने के पहले उस अतीव प्रभावकारी दारू के दो गिलास चढ़ा लिए थे.
काफ़्का शराब नहीं पीता था. मांस भी नहीं खाता था.
वान गॉग बाद के दिनों में खू़ब शराब पीता था. वैश्यागामी भी था.
उसके बाद एक बार विएना के लियोपॉल्ड म्यूज़ियम में हैनरी दे तुलूस लौत्रेक की प्रदर्शनी देखने के बाद मैं लौत्रेक नामी इस महान वैश्यागामी, शराबी और 'मूलां रूज़' को अमर बना देने वाले चित्रकार का मुरीद हो गया.
शराब और सिगरेट की अति से अपने स्वास्थ्य को तबाह कर चुका फ़र्नान्दो पेसोआ जब अपने पीछे सत्ताइस हज़ार से ज़्यादा पांडुलिपियां छोड़कर जाने वाला था, वह अपनी मौत से एक दिन पहले अपनी डायरी में लिख रहा था: " मेरे भीतर गहरे कहीं हिस्टीरिया के लक्षण हैं ... जो भी हो मेरी कविता का बौद्धिक अस्तित्व मेरे शारीरिक रोग से उपजा है. अगर मैं एक स्त्री होता तो मेरी हर कविता पड़ोस में कोहराम मचा देती, क्योंकि स्त्रियों में हिस्टीरिया उन्माद और पागलपन के रूप में प्रदर्शित होता है. लेकिन मैं एक पुरुष हूं और पुरुषों में हिस्टीरिया दिमाग़ी मसला होता है. इसलिए मेरे लिए हर चीज़ ख़ामोशी और कविता में जाकर ख़त्म होती है."
हिन्दी के सारे महान कवि भीषण दर्ज़े के शराबख़ोर पाए जाते हैं और बड़ी सीमा तक यौनकुंठित भी. उनका ज़्यादातर ख़ाली समय शराब पीने के बाद दिए गए उनके प्रवचनों की सद्यःवाचाल पवित्रता और प्रत्युतपन्नमति पर रीझे अकवि और आमतौर पर कहीं युवतर श्रोता समुदाय द्वारा इतने बड़े 'नामों' की संगत में उभरी "अहा! अहो!" पर मुदित होने में बीतता है.
विन्सेन्ट ने क़रीब आठ साल पेटिंग की. सत्रह सौ से ज़्यादा अमर कैनवस तैयार किये.
काफ़्का साहित्य का सर्वज्ञाता ईश्वर है.
तुलूस लौत्रेक के नाम क़रीब पांच हज़ार कैनवस-स्केचेज़ हैं.
फ़र्नान्दो पेसोआ के पूरे काम को अभी छपना बाकी है. छपा हुआ काम तीस हज़ार पृष्ठों से ज़्यादा है.
विन्सेन्ट अड़तीस साल जिया.
काफ़्का इकतालीस.
लौत्रेक सैंतीस.
पेसोआ सैंतालीस.
हमारी हिन्दी में पचास पार के कवि को युवा कहे जाने की परम्परा है. जब वह अस्सी का होता है उसके पास चार से ले कर आठ पतले-दुबले संग्रह होते हैं. उसके साथ शराबख़ोरी कर चुके लोगों की संख्या लाख पार चुकी होती है और वह "मैं मैं" कर मिमियाता-अपनी घेराबन्द साहित्य-जमात का मुखिया हो कर टें बोल जाता है.


फोटोः रीडिंग द मैप्स से साभार।
अनिल यादवः मैं कई ऐसे कथाकारों को देख रहा हू् जो मारखेज की आत्मकथा लिविंग टू टेल द टेल आने और हिंदी में उसके अंश कई जगहों पर छपने के बाद धुआंधार सिगरेट सूत रहे हैं, एकाध तो बीड़ी भी। .....हां जी बीरी। इस जमाने जबकि उसे सिर्फ गाने में ही लालसा से ताका जाता है क्योंकि वह बिप्स के जिगर से जलती है।.........इसलिए कि आत्मकथा के पहले खंड पर घटिया तंबाकू वाली सस्ती सिगरेट का धुंआ रहस्यमय तरीके से फैला हुआ है गोया उसी ने मारखेज को लेखक बनाया हो। लिखा तो यह भी है कि बला की गरमी में जब उसके दोस्त अपने कपड़े उतार कर सिर्फ अंडरवीयर में अखबार के दफ्तर में बैठा करते थे वह छह से आठ घंटे तक अखबारी कागज पर लिखता रहता था। अपनी मां के साथ घर बेचने के बहाने हुई अर्काताका की यात्रा के बाद, जब वह वन हंड्रेड इयर्स....का पहला ड्राफ्ट लिख रहा था तो इसे अखबार के पेस्टिंग स्केल से फीट में नापा करता था।...इसकी नकल नहीं हुई।
ऐसी जानकारियों का असर जादुई होता है। मैने सुन लिया था कि पिताजी गणित में कमजोर थे मैने फिर गणित नहीं पढ़ी तो नहीं पढ़ी। जवाहर कट वास्कट, साधना कट बाल और बुल्गागिन कट दाढ़ी....पर्सनालिटी स्टेटमेंट ऐसे ही बन गए। (आवारा लड़कों में सिगरेट का एक बार नीलू फुले स्टाइल भी चला था। नीलू फुले एक फिल्म में इस अंदाज में सिगरेट मांगता था जैसे उसे अपनी, कान पर रखी सिगरेट जलानी हो। जलाने के बजाय वह अपनी सिगरेट, जलती सिगरेट के पीछे पाइप की तरह फिट कर दो-तीन कश लगाकर वापस कर देता था। )
बड़े व्यक्तित्वों में का जो कुछ आसानी से ग्राह्य हो झट से अपना लिया जाता है। बुरा तो और भी तेजी से। क्योंकि वह प्रचारित सनसनीखेज तरीके से होता है और अंदर के पोलेपन को छिपाकर, छद्म छवि के निर्माण के काम में फटाक लग जाता है। शराबखोरी के साथ भी यही है। उसे इस तरह से प्रस्तुत भी तो किया जाता है जैसे लेखक, कवि, पेन्टरादि होने की जरूरी शर्त हो। जैसे, पुराने जमाने के गंजेड़ियों का नारा...जिसने न पी गांजे की कली, उससे तो लौंडिया भली...हर फिक्र को धुंए में उड़ा देने वाला कड़ियल मर्द होने का घोषणापत्र था।...दम मारो दम या हिप्पी दौर के कई पॉप नंबर्स इसी के तत्सम, मेट्रो वर्जन हैं।
अपने यहां क्रिएटिव-शराबखोरी के चोंचले का एक और कारण है जो मुझे बड़ा महत्वपूर्ण लगता है। सड़क किनारे बैठने वाली एक स्वयंभू, रचनात्मक, युवा मद्यप-मंडली के कुछ महीनों के संचालन के दौरान इसे मैने महसूस किया था। वाचाल, किंचित उन्मत्त होने के बाद वाकई कहन में एक नया रंग और रवानी तो आ ही जाती है। उसका असर सामने वाले की आंखों पर चेहरे पर तुरंत दिखाई देता है। इन्स्टैन्ट। यह सुख अपनी किताब का पहला संस्करण देखने से जरा भी पतला नहीं होता। जिसे इसका चस्का लग गया उसका लिखना फिर मुश्किल होता है।
यौन-कुंठा का मसला जरा हटकर है। वैसे पश्चिम में भी लफंडरों और पिसान (आटा) पोत कर मुख्य रसोईये की तरह जुल्फें झटकने वालो की कमीं नहीं है। लेकिन पियक्कड़ ओ, हेनरी, पैसोआ वगैरह का अपने काम के प्रति समर्पण गहरा, प्रमुख और एकाग्र है। अपने यहां जो भी खास तौर पर हिंदी का साहित्य रचने लगता है साथ एक सत्ता भी रचता है। वह साहित्य के जरिए तुरंत सत्ताधारी होना चाहता है। जरा सा नाम हुआ नहीं कि चेलों, चिलगोजों और चकरबंधों की फौज खड़ा करना शुरू कर देता है। हमारे समाज में प्रतिभाविहीन चिलगोजों की अछोर संख्या है जो किसी नामचीन की रोशनी में थो़ड़ी देर के लिए ही बस चमक लेना चाहते हैं।
..........जब रचने की बेचैनी और न रच पाने से उपजे असंतोष की जगह, कुछ नाम और पुरस्कारों से निर्मित सत्ता का निंदालस होगा और चंपुओं की फौज उसकी अवधि अपनी विनम्र, लसलसी जीभ से खींच कर चौबीस घंटे की कर देगी....तब साहित्य की तरह, यौन के क्षेत्र में भी पराक्रम दिखाने की कामना होगी जो पचासा पार युवा साहित्यकार को हाथ पकड़कर यौन-कुंठा की आवेशित गली में ले ही जाएगी।

26 सितंबर, 2008

यात्रा की यात्रा-५

अब थोड़ी देर के लिए रूद्रप्रयाग देखने की बारी मेरी थी। अनायास कस्बे के इकलौते सिनेमा के सामने पहुंच गया जहां कोई बीस साल पुरानी कुली चल रही थी और सामने जाली के भीतर ठेका था। हाल में ही शराब की बढ़ा दी गई कीमतों की लाचारी पियक्कड़ों की आंखों में दिखती थी। मेरा ध्यान गया कि उस ठेके में अंग्रेजी की बोतलों की चहारदीवारी में कहीं खांटी देस दिखाई दे रहा था। एक बल्ब के होल्डर पर लाल लंगोट टंगा हुआ था, जिसके नीचे एक लड़का बैठा किताब पढ़ रहा था। शायद पहलवान के सपनों का यह सबसे शुरूआती सीन हुआ करता होगा। दीवार में काली की मूर्ति थी जो शराब के ठेकेदार पर सदा सहाय रहा करती होंगी। मूर्ति के बगल में एक चटका शीशा और एक मैल भरी कंघी थी जो दिन में कई बार लड़के के बाल संवारा करती होगी। एक पहलवान टाइप आदमी काउंटर पर बैठा था और उसका एक साथी वहीं बैठा बिना बेंट के एक अनगढ़ चाकू से आलू-टिंडे काट रहा था। चाकू की बेंट पर सुतली बड़े जतन से लपेटी लगती थी। यह माइनस जनाना गृहस्थी के बीच चलता सुख का कारोबार था और जाली के इस पार इत्मीनान से खड़ी भीड़ थी। क्या पता कोई जनाना या लड़के की मां भी हो जो ठेके का शटर गिरने के बाद दृश्य में प्रवेश पाती हो। पता नहीं क्यों मुझे लगने लगा कि ज्यादातर लोग अंदर रखी बोतलों को देखने दूर-दूर के गांवों से चलकर आए हैं। देख रहे हैं, देखे जा रहे हैं। अचानक एक हिलती है जो बाहर आकर मिलना चाहती है। फिर झुरझुरी होती है-बेवकूफ याद कर नत्थू लाल की मूंछों को ग्लैमराइज करने के बाद वाले उस गाने में अमिताभ बच्चन क्या कहता था-नशा शराब में होता तो नाचती बोतल। कहा था कि नहीं।

रम का एक क्वार्टर, उस शाम हम लोगों के लिए काफी था।

दुर्गा दादा के कान गरम हों और कोई जरा इसरार, फिर इसरार करे तो अपनी भयानक आवाज में कोई पुरानी बंदिश काहे को मोरा जिया लै ले, काहे को मोरा जिया दै दे गा दिया करते थे। मैं कहा करता था रोमांटिक मूड में भेड़िया- फिर भी कोई बात थी। वे गाते तो लगता था कि कोई काठ पर लिखा प्रेम-पत्र पढ़ रहे हैं जिसका सार यह है कि जियरा के लेन-देन के गदेलेपन में क्यों पड़ते हो। अब तक जितने पड़े उन्होंने तकिए भिगोने, सुखाने, भिगोने के अलावा क्या किया। अपनी पर आ जाएं तो वे एक अवधी का बड़ा मारू गीत गाते थे जिसे सुनते हुए सीपिया टोन की एक फोटो भीतर बनने लगती थी- कोई जालिम जमींदार है जिसकी मूंछे झुकी हुई हैं, जिसे रस्सी से बांध कर गरीब-गुर्बा लोग काली माई के चौरे पर बकरे की तरह बलि देने के लिए लाए हैं। वे नाच-गा रहे हैं। यह मनौती जिस लाल रंग के झंडे के नीचे मानी गई थी वह नए जमींदार की तलाश में नए गांव की तरफ निकल गया है। मिर्च काटने के बाद उन्होंने सिसकी ली, होंठ से नाक के बीच एस के आकार की एक झुर्री फड़कने लगी यानि आज काहे को मोरा जिया....कहीं भीतर से चल चुका था। बस आने वाला था। सिसकी कई खतरों की एक साथ पूर्व सूचना थी। मैने बाकी माल एक बोतल में पानी लबालब भर कर जेब के हवाले किया और उनका हाथ पकड़ कर लॉज से बाहर निकल आया चलिए दादा, आज जरा पहाड़ की रात देखते हैं।

रात के साढ़े दस बजे, सोनप्रयाग के रास्ते पर अलकनन्दा के पुल के आगे हाहाकार करता एक कैलेंडर टंगा हुआ था। ऊपर एक अकेला चीड़ का पेड़ था, चांद का विशाल गोला उठा, जल गया। एक-एक पत्ती हीटर के एलीमेंट के घुमाव पर टंगी दहकने लगी। नीचे हहराती नदी थी, लहरों का फेन था और पुल के खंभों की थिरकती परछाई। एक दम हूबहू कैलेंडर। किसी फोटोग्राफर के हुनर का सबूत। कहीं आसपास एक रातरानी का झाड़ था जिसकी महक उड़-उड़ कर शोर के साथ चली आती थी। नदी के कगार पर जैसे-तैसे टिके दुकानों के पिछवाड़े चांदनी में चमक रहे थे। प्लास्टिक, चिथडों से ढके गलते पटरे जिनसे पानी टपक रहा था। लगा ये दुकानें अब गिरी कि तब गिरीं।

-आपने देखा है इन दुकानों में काम करने वाले छोकरों को किसी बात पर अचरज नहीं होता। आंख तक नहीं झपकती?

-अरे, सालों के पेट में दाढ़ी है। हमको-तुमको बाजार में बेच खांएं।

पुल से ऊपर सीढ़िया थी जो अंधेरे में बुग्यालों के बीच से किसी गांव की तरफ जाती थी। इतनी रात भी कोई सायकिल कंधे पर लादे चढा आ रहा था। हम वहीं बैठ गए। उस पार पीली रोशनी वाली खिड़कियों में लोग सिनेमा के लोगों की तरह नजर आ रहे थे। पार्श्व में उनकी गृहस्थी थी। अलकनंदा का संगीत था और संवाद हमारे। हम अंधेरे में बैठकर घुटकी लेते उन्हें देख रहे थे।

-देखना वह बुड्ढा जो कुर्सी से उठकर खड़ा हुआ है अभी दो-तीन बार ऊपर-नीचे हाथ हिलाएगा और फिर वहीं जाकर बैठ जाएगा। वो लड़की जो किताब लिए इतराती घूम रही है देखना तब तक घूमती रहेगी जब तक सामने वाली खिड़की में बत्ती जलती रहेगी। लड़के-लड़कियों के कुल पंद्रह-बीस टाइप के सपने होते हैं वहीं सभी बारी-बारी से देखते हैं और इसी तरह इतराते हैं। वह औरत अभी कुल नौ बार अलग-अलग जगहों पर टंगे कपड़े छुएगी और थोड़ी देर बाद फिर छूने आएगी। मेरी बात गलत निकल जाए तो बताना। तुम्हें पता है वो आदमी जो अपनी बीबी के साथ बैठा चाय या कुछ पी रहा है, वह इस समय सोच रहा होगा कि यह जो कटिया मार कर बिजली जला रखी है, कहीं छापा तो नहीं पड़ जाएगा। हम लोगों के सारे निष्कर्ष सच निकले और खिड़कियों की एक-एक कर बत्तियां बुझने लगीं। शो खत्म होने पर कई घुटकियों और अंधेरे में कुछ ज्यादा विकसित संतोषप्रद अपनी-अपनी मुस्कानों के बाद तय पाया गया कि दुनिया फिलहाल कई हजार सालों से बेहद तुच्छ कामों में तल्लीन जा रही है और सोने से पहले पुल तक जाकर एक बार और रातरानी की महक ली जाएगी। जो नहीं मिली। पता नहीं कहां उड़ चुकी थी।

अजीब बात थी, हम लोगों की एक जोड़ा नाकें जाम हो चुकी थीं. रातरानी के पौधे ने अपनी जगह बदल दी थी या हवा ने अपना खेल कर दिया था। रातरानी की महक नहीं मिली। पुल के चारों कोनों पर पेशाब की आंखों में आंसू ला देने वाली तीखी झार थी। बस एक क्वार्टर के आधे में इतना नशा कि मैने सैंडिल उतार कर अपना पुराने करतब का यांत्रिक अभ्यास शुरू कर दिया यानि पुल की रेलिंग पर नंगे पैर चलने लगा। गोल रेलिंग पर चलना कठिन था। मेरा मानना था कि मैं ऐसा अक्खड़ शराबियों की तरह, यह जांचने के लिए ऐसा करता हूं कि कहीं नशे में तो नहीं हूं। दादा का पुराना विश्लेषण था कि मुझमें आत्महत्या करने के लिए जरूरी साहस का अभाव है जो शराब से थोड़ी मात्रा में मिलता है और मैं ऊची जगहों की तरफ इसीलिए खिंचता हूं और वहां इस तरह चलते हुए मरने के लिए किसी अनायास गलती की प्रतीक्षा करता हूं। वे तटस्थ भाव से देखते रहे। बस एक बार कहा, चूतियाराम जो आप कर रहे हैं, सर्कस में उसके लिए चवन्नी तक नहीं मिलती। वे रेजीडेंसी की मीनार, ओसीआर की छत अन्य तमाम जगहों पर नशे के क्षेत्र में प्रगति के दौरान इसे देखने के अभ्यस्त हो चुके थे।

17 सितंबर, 2008

यात्रा की यात्रा का विज्ञापन


सैर कर दुनिया की गाफिल जिन्दगानी फिर कहां।
जिन्दगानी गर रही तो यो नौजवानी फिर कहां।।

05 सितंबर, 2008

यात्रा की यात्रा-४


रूद्रप्रयाग जा रही रोडवेज की खटारा बस की सीट के नीचे बैग रख रहा था कि कातर भाव से आकाश ताकते दादा पर नजर पड़ी. कई दिन बाद अचानक याद आया कि उन्हें हार्निया है, डाक्टरों के कहने के बावजूद जिसका आपरेशन वे कई साल से कभी खर्चा, कभी काटा-पीटी का डर, कभी अब कितने दिन बचे हैं के बहानों से टालते आ रहे थे. वह बस के दरवाजे की पहली सीढ़ी से झटका खाकर उतरने के बाद अपने साबुत हाथ से जोर देकर, धीरे- धीरे अपने पेट के निचले हिस्से को सहलाते हुए खांस रहे थे. पहली बार मुझमें अपराध का भाव भरने लगा यह मैं उन्हें कहां लिए जा रहा हूं। मैने कहा- रहने दीजिए, लौट चलिए वहां हर दस कदम पर आयरन करना पड़ेगा. खांसी पर काबू पाकर, सायास खिलायी मुस्कान के साथ उन्होंने अपना दूसरा हाथ मुंह के सामने उठाकर हिलाया जिसका मतलब था पंजा लड़ाओगे। उनका एक हाथ जन्म से कमजोर था और उस पर एक आंदोलन, जिसका नारा था- यूपी के तीन चोर, मुंशी, गुप्ता, जुगुलकिशोर, के दौरान लाठी भी पड़ चुकी थी. गुप्ता, पूर्व मुख्यमंत्री बनारसी दास गुप्ता यानि टप्पू उर्फ बसपा के बनिया नेता और उद्योगपति अखिलेश दास गुप्त के पिता के किस्सों का उनके पास खजाना था.
बस चलने के आधे घंटे तक बच्चा भाव से अच्छा-अच्छा चला। सामने क्या देवदार के पेड़ दिख रहे हैं। नहीं-अच्छा। क्या वहां ठंड बहुत तो नहीं होगी। नहीं-अच्छा। पहाड़ के रास्ते पर हैं कहीं ड्राइवर खाई में तो नहीं गिरा देगा। नहीं-अच्छा।
उन्हें खिड़की के पास बिठाकर मैं पीछे जाकर बस के खलासी से गपियाने लगा। अब उनका पजेसिव भाव जगा और खड़े होकर पूरी बस को सुनाते हुए बोले- सुनिए मिस्टर आप हमारे टूर आपरेटर नहीं है, हम लोग साथ घूमने जा रहे हैं इसलिए यहां आकर मेरे पास बैठिए। मेरे सामने वैसा करने के अलावा और कोई चारा नहीं था। श्रीनगर से थोड़ा पहले एक ढाबे पर मैने खलासी के भी खाने के पैसे दे दिए तो फिर वे उखड़े और सीधे उससे बोले- इनके पास खुद भूंजी भांग नहीं है और कांग्रेसियों की तरह कांस्टीच्युएंसी बना रहे हैं. आप अपने पैसे खुद दीजिए। खलासी आत्मसम्मान बचाने के लिए ड्राइवर होने के रास्ते पर था उसने सहज हंसते कहा दादाजी हमने कब कहा कि हम गंगू तेली नहीं हैं। रास्ते में श्रीनगर यूनिवर्सिटी के सामने बस थोड़ी देर को हमने देश की शिक्षा व्यवस्था कस-कस कर कई लातें लगाईं, मास्टरों को चोर वगैरा बताया, पहाड़ के कई छात्र नेताओं के नाम याद करते हुए लड़के-लड़कियों के कैरियरिस्ट, नापोलिटिकल और जूजू हो जाने पर थोड़ा अफसोस जाहिर किया बाकी घुमावदार, हरी ठंडक थी जिसने शांति व्यवस्था कायम रखने में भरपूर योगदान दिया।

जब रूद्रप्रयाग पहुंचे तो दिन तकरीबन ढल चुका था और गुप्तकाशी से आगे हमारी मंजिल की तरफ जाने वाली आखिरी बस आंखों के सामने निकल गई। हम लपके लेकिन दिन भर बैठे रहने के कारण जोड़ जाम हो चुके थे और बस, बस सरक ही गई।

पहाड़ मे पहला दिन मैं सेलीब्रेट करना चाहता था लेकिन दादा किसी और गुनताड़े में थे. अभी आया कह कर निकल लिए। बस अड्डे पर मैने तीन चाय पी, घुन लगी मठरियां अखबार में लपेट कर दादा के बैग में रखने के बाद उसे दुकानदार के हवाले करने के बाद कस्बे की इकलौती दारू की दुकान लोकेट की, पुल पर जाकर नदी देखी तब कहीं जाकर वह प्रकट हुए इस खबर के साथ कि चलो एक आलीशान होटल मिल गया है। सामान रख कर फिर घूमा जाएगा। यह एक घर के ऊपर अधबना लॉज था जिसकी दीवारों पर उसका मालिक टोपी लगाए तराई कर रहा था। जो कमरा हमें मिला शायद उसका फर्श एक हफ्ता पहले ही बना था। किराया तीस रूपए।
मैने कहा दादा आपने तो कमाल कर दिया इसलिए सौ रूपए ढीले कीजिए ताकि दारू का बंदोबस्त किया जा सके। आपने दो सौ रूपए का शुद्ध मुनाफा कमाया है। दादा हल्के गरूर के साथ बोले कि कम्युनिस्ट राजनीति जो व्यावहारिकता सिखाती है उसमें से एक यह भी हैं. और यह मुनाफाखोरी नहीं सिर्फ सीमित संसाधनों का अधिकतम इस्तेमाल करते हुए शोक को शक्ति में बदलने की कला है। मिडिल क्लास बोरजुआजी की तरह हद से हद इसे बचत कह सकते हो। लंबी झिकझिक के बाद पचास रूपये मिले।

02 सितंबर, 2008

यात्रा की यात्रा-३


कामरेड दुर्गा
ईटिंग मुर्गा
ड्रिकिंग ब्हिस्की
टेकिंग सिस्की
वेरी रिस्की
लाल सलाम।।।

घबराइए मत, डीजल भराया जा रहा है। सफर अब शुरू होने वाला है।

09 अगस्त, 2008

यात्रा की यात्रा-2

इस ट्रैवलाग ने एलानिया कहानी बनने की तरफ पहला गोता मार दिया है। लेकिन मैं इसे पूरी ताकत लगाकर कहानी होने से बचाना चाहता हूं क्योंकि हमारे जीवन का यथार्थ कहानी से कहीं ज्यादा दिलफरेब है। कहानियां जो कभी आत्मा की खुराक हुआ करती थीं se doori का कारण भी यही है। खासतौर से इन दिनों की हिन्दी की कहानियां पता नहीं किस लोक की हैं। उनमें हमारा जीवन नहीं है जिनका है वही पढ़ते भी होंगे। हिन्दी बोलने वाले तो नहीं पढ़ते।

मिसाल के तौर पर यही देखिए कि अवसाद दिखाने के लिए मैंने लिख मारा है कि रेल के डिब्बे में चालीस वाट का पीला लट्टू जल रहा था। हमारी ट्रेनों में चालीस वाट के बल्ब नहीं लगते। किशोरावस्था के चिबिल्लेपन में अपना होना साबित करने के लिए गाजीपुर जिले के सादात स्टेशन से माहपुर रेलवे हाल्ट के बीच मैने दर्जनों बल्ब चुराए हैं और होल्डर में ठूंसने के बाद उन्हें फूटते देखा है। अब अगर कोई एमएसटी dhari पाठक यह नतीजा निकाले कि यह संस्मरण लिखने वाला कल्पना के हवाई जहाज पर चलता है लेकिन उसने ट्रेन में कभी सफर नहीं किया है तो मुझे पिनपिनाना नहीं चाहिए।


....``बिना मकसद बताये यात्रा के लिए चंदा बटोरा गया और अखबार के दफ्तर से तनख्वाह भी मिल गयी थी।´´ किस अखबार के दफ्तर सेण्ण्ण् लेखक बेटे!

इन दिनों स्मृति मेरे साथ यह खेल कर रही है मैं जिस घटना को याद करना चाहता हूं मुझे उससे तीन-साढ़े तीन साल पीछे के समय में ले जाकर खड़ा कर देती है, घटनाएं अपनी जमीन से उजड़ कर प्रवासियों की तरह नई ही दिशा में चल पड़ती हैं। यह कुछ वैसा ही है जैसे कि विपाशा बसु बीड़ी फूंकते हुए बताएं कि उनकी पहली फिल्म बावरे नैन थी जिसमें कन्हैया लाल के अपोजित उन्होंने एक नटखट विधवा का रोल किया था।
उन दिनों की एक डायरी पलटने से पता चला कि मैं एक साल से बेरोजगार था। एक मित्र की छत पर बने अकेले कमरे में दरी पर सोता था। हर सुबह आत्मसम्मान के बोझ और घर से उठती खाने की खुशबू न झेल पाने के कारण दबे पांव वहां से निकल लेता था। कभी कभार पकड़ कर नाश्ते की मेज पर बिठा दिया जाता था तो एक संत की तरह बड़ी-बड़ी बातें ठेलता हुआ नाम मात्र का मुंह जूठा कर लेता था। वहां से दादा की दुकान के बीच सात किमी के पैदल पथ में ठेले का सबसे मोटा खीरा या भुट्टा कुतरते हुए चला जाता था। कभी-कभार चेतना पुस्तक केन्द्र खुलने से पहले ही पहुंच जाता था मानो दुनिया में मेरा कोई और ठिकाना ही नहीं था। कोई ग्यारह बजे तक दुगाZ दादा एक धूपी चश्मा आंख पर चढ़ाने के बाद अपने पैर काउंटर पर पसार देते थे और मैं उनकी कुर्सी की टूटी हुई पीठ, किताबों की रैक पर टेक कर फर्श पर पसर जाता था। बहुत बिरले सुखद हस्तक्षेप सा चमत्कार घटता कि कोई लड़की उनकी घिसी पतलून से निकले उनके ढीठ पैरों को तरेरती हुई योगा या कुकरी की किसी किताब का नाम बताती। दादा को मानो मुंहमांगी मुराद मिली। वे क्षण भर का सेल्समैन बनने को आतुर मुझे देखते फिर पैर हिलाते एक-एक शब्द का मजा लेते हुए कहते- ``कुकरी-फुकरी नहीं मैडम यहां सोशल चेंज की किताबें मिलती हैं, इफ यू डोंट माइंड, ट्राई टू अंडरस्टैंड we आर इन बिजनेस ऑफ रिवोल्यूशन´´हड़बड़ाती लड़की की जाती हुई पीठ देखते हुए स्वगत बड़बड़ाते, साली कुकुरी, पता नहीं कहां-कहां से चपंडक चले आते हैं यहां, क्या जमाना आ गया है।
मुझे लगता कि उनके चेहरे पर लगभग, अवश्य, संतुष्ट, कपट मुस्कान है और मैं किसी किताब में और धंस जाता। अक्सर यह कोई दोस्तोवस्फी, सोलोखोव, मायकोवस्की नहीं कॉमिक्स या बाल कविता की किताब होती थी। इतना क्षेपक इसलिए कि जरा सी चूक से इस यात्रा में अभी कहानी के सलमे-सितारे सज चुके होते और उसमें से जीवन का वह अवसाद घुला, खिन्न और कठिन समय भाग खड़ा होता। तब हाथी घोड़ा पालकी फिर उसी तुक में जय कन्हैया लाल की बताने के सिवा और बचता ही क्या?

डायरी के मुताबिक यह 15 सितंबर 2000 की खुनकी भरी सुबह थी।

तो अब हिसाब दुýस्त कर लिया जाये। दुगाZ दादा की जैकेट के नीचे कुर्ता था। कुतेZ के नीचे बंडी थी जिसमें दिल के ऊपर गुप्त जेब थी। गुप्त जेब में साढ़े आठ सौ के आसपास ýपए जतन से रखे थे।यकीन मानिए यह सबसे बड़ी रकम थी जो हाल के वर्षों में उन्होंने देखी होगी। उन्हें करीब 600 ýपए हर महीने पार्टी वेज देती थी और हर शाम को शटर गिराने से पहले हिसाब मैं ही जोड़ता था। हर दिन क्रांतिकारी विचारdhaरा के मानवीय व्यापार में बिक्री का औसत हर दिन बीस से साठ ýपए के बीच रहता था। मेरी जेब में कुल साठ-पैंसठ थे। टूर आपरेटरों की गाइडपना जताती लनतरानियों और टैक्सी ड्राइवरों की बकबक के बीच हम रूद्रप्रयाग जाने वाली सरकारी बस तलाश रहे थे जिसका किराया सबसे कम हो। दो दुनिया से नाराज, बुरी तरह उकताए दोस्त...एक बेरोजगार पत्रकारनुमा युवा और एक बूढ़ा कामरेड आतुर भाव से पहाड़ों की रहस्यमय झिलमिली को ताक रहे थे। क्या पता वहां जिंदगी वैसी दमघोंटू न हो?

08 जुलाई, 2008

07 जुलाई, 2008

एक यात्रा की याद

मुझे आजकल लगता है कि मैं कोई जमाने से यहीं खड़ा, हवा चले न चले सिर पटकता पेड़ हूं। या कोई धूल से अटी पिचके टायर वाली जीप हूं जिसके स्टीयरिंग का पाइप काटकर मेरे गांव छोकरे लोहार से कट्टा बनवाने की सोच रहे होंगे। या कोई हिरन हूं जिसकी सींगों को तरास कर, भुस भर दिया गया है और जिसकी कांच की आंखों में उजबकपन के सिवा कोई और भाव नहीं है।

कभी लगता है कि बीमार, मोटे, थुलथुल, सनकी, भयभीत और ताकत के नशे मे चूर लोगों से भरे एक जिम में हूं। पसीने और परफ्यूम की बासी गंध के बीच मुझे एक ऐसी मशीन पर खड़ा कर दिया गया है जिस पर समय लंबे पट्टे की तरह बिछा हुआ है। मैं उस पर दौड़ रहा हूं, पसीने-पसीने हूं, हांफ रहा हूं लेकिन वहीं का वहीं हूं। कहीं नहीं पहुंचा, एक जमाना हुआ। समय का पट्टा मुझसे भी तेज भाग रहा है। अगर मैं उसके साथ नहीं चला तो मशीन से छिटक कर गिर पड़ूंगा और कोई और मेरी जगह ले लेगा। मैं थक रहा हूं यानि समय जरूर कहीं न कहीं पहुंच रहा है। मैं लोगों को चलने का भ्रम देता आदमी का एनीमेशन हूं (यह सिर्फ मुझे पता है।)

जमाना हुआ, मैं कहीं गया ही नहीं। कई बार सपनों में बेहद तेज हूक उठी लेकिन वह नींद में ही मर गई।

आखिरी बार मैं शायद रिपोर्टरी के धंधे के चलते शायद जबलपुर गया था एक राजनीतिक पार्टी का सम्मेलन कवर करने। लेकिन वह जाना इतना प्रायोजित, समय का पाबंद, वातानुकूलित, अल्कोहलमय था कि कुछ महसूस ही नहीं हुआ। यहां तक कि आधीरात को भेड़ाघाट का धुआंधार और आधारताल में ज्ञानरंजन महाशय का घर खोजने की असफल कोशिश में भी कुछ नहीं था। सड़के, सड़क जैसी थी, बत्तियां बत्तियों जैसी और वहां के आदमी यहां के आदमियों जैसे और क्या? वह नमक के एक बोरे का रेलगाड़ी पर लदकर जबलपुर जाना और आना था। रास्ते में जिनसे बात हुई उन सबने इसे थोड़ा-थोड़ा चखा और कहा कोई खास बात नहीं नमक जैसा ही लगता है।

दुर्गा दादा में भी यह अम्ल बहुत था। नसों में बहता और मुंह से भभकता सलफ्यूरिक एसिड। उन दिनों थकी कम्यूनिस्ट पार्टी की कराहती किताबों की दुकान चलाते थे। दिन भर वही भभकेः जमाना खराब, दुनिया खराब, लोग हरामजादे मक्कार, संसद सुअरबाड़ा, पार्टी के नेता सब उसी की नौकरी बजा रहे हैं। चाची भी चार बात सुनाती हैं, बच्चे भी ढंग से बात नहीं करते। सारे अच्छे लोग गुजर गए। हियां अब जी घबराता है, अनिल निकालो हमको यहां से ले चलो कहीं जहां आदमी और आदमी की जात से मुलाकात न हो।

दुर्गा मिसिर की एक खास बात। सारे दिन काउंटर पर बैठे-बैठे अपने मरे कामरेडों और दोस्तों की लिस्ट बनाया करते थे और शाम को शटर गिराते समय फाड़ कर फेंक देते थे। कुल उनसठ नाम-कभी अंग्रेजी में कभी एकाध चेहरे का चेहरा या फूल भी, अक्सर उलझी रेखाओं की गोंजागोंजी। मुझमें भी नकार ही भरा था दुनिया के लिए। यही शायद साठ पार के दुर्गा से मेरी दोस्ती का धागा रहा होगा।

दुर्गा दादा एक दिन घर से अपना गांधी आश्रम वाला पुराना गाउन उठा लाए और दोपहर में पहन कर दुकान में खड़े हुए। एक हाथ से पकड़ कर दूसरे को सिर तक उठाया और उकताकट से फटती आवाज में बोले, बच्चा अब यहां से कहीं चलो।

सबसे पहले हम लोग आंख का आपरेशन करा कर अस्पताल मे पड़े महात्मा हरगोविंद के यहां गए। देखने का बहाना था। हालचाल नहीं चाभी लेने। केदारनाथ के रास्ते में झोसी गांव में उनका दो कमरों का एक घर था जिस पर शायद अब भी पत्रकार आश्रम की तख्ती लगी होगी। उनको मरे दो साल हो रहे हैं। कभी आजादी के मूल्यों के पतन से क्षुब्ध महात्मा वहां रहकर अध्यात्म की सस्ती, उपयोगी किताबें लिखते थे, खुद गुलाब के कलाकंद और अपना च्यवनप्राश बनाते थे और गाय-बकरियां चराते हुए कच्चे अखरोट फोड़कर चबाने वाले बच्चों से बतियाते थे।

चाभी मिलने के बाद किराया जुटाने की बात आई। किताब की दुकान पर आने वाले दोस्तों से बिना मकसद बताए चंदा बटोरा गया और इसी बीच अखबार के दफ्तर से तनख्वाह भी मिल गई। रिजरर्वेशन हो गया और हम लोग एक दिन दो झोले और कुछ किताबें लेकर चल पड़े। निकलते समय मैने गौर किया दुर्गा दादा बेहद हड़बड़ी में थे। डिब्बे में घुसने के लिए अपना बैग घसीटते हुए इतना झटके से भागे कि गिर पड़े, उठे और बैग वहीं छोड़कर डिब्बे में घुस गए। पता नहीं क्या सोचकर फिर उतरे और अपना बैग उठाया। दरअसल हम लोग कहीं घूमने नहीं जा रहे थे। यह दुनिया के शोर, कमीनगी और धूसरपन से छूटने की यात्रा थी। हमें निविड़ एकांत में जाकर महसूस करने की बेहद जल्दी थी कि इसी दुनिया में इतने सालों से बेमन से रहते-रहते हम कितने बचे रह गए हैं। वहां ऊपर पहाड़ के निर्जन में हमारा एक टेस्ट होना था और उसमें मिले नंबरों के आधार पर जीवन आगे चलना या नहीं चलना था।

अपनी बर्थ पर बैठने के दस मिनट बाद, अपने पड़ोसी यात्री से उन्होने राधा छाप तमाखू की पुडि़या फड़वा कर अपनी हथेली पर रखवाई और फांकने के बाद लगभग घोषित कर दिया अब पब्लिक पूरी तरह नानपोलिटिकल हो चुकी है। पहले ट्रेन, बस वगैर जो सफरी बहस का माहौल था वह मंडल-मंदिर यानि जाति-धर्म की पार्टियों और उनके चाकर मीडिया ने साजिशन खत्म कर डाला है। अब कुछ बचा नहीं है।

ये लोग आदमी हैं, चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के खिलौने नहीं कि कामरेड माओ खटका दबाएंगे और खट-खट बहस शुरू हो जाएगी।- मैने चिढ़कर कहा।

डिब्बे में बेहद भीड़ थी, बस एक चालीस वाट का पीला लट्टू था। इसके सिवा कुछ नहीं था। रहा भी होगा तो हम देखना नहीं चाहते थे। ट्रेन बहुत धीरे चल रही थी। हम तेज चल रहे थे। अपने भीतर न जाने कहां-कहां गए और पस्त होकर सो गए।

अगले दिन ऋषिकेश के बस स्टैंड से क्षितिज पर पहाड़ की झिलमिली दिखी तो दुर्गा दादा फिर उफनाए जो पहिली बस मिले निकल लो अब यहां के चूतिया-चर्खे में फंसने का कोई काम नहीं है।

....अगली किस्त शायद कल।

30 जून, 2008

डिब्बे से एकालाप

जो भी थोड़ी सी कंप्यूटरबाजी जानता है ब्लागर हो सकता है। यह अपने अमरूद का गुआवा होना है। वही हैं...हैं वही हाय-हाय वही हौं-हौं...। नया कुछ नहीं। वही मिडिल क्लास दंतचियरपन और पानमसाले और रात में ब्रश करने की आदत न पड़ पाने से पीले दांत दिखाना। वही खीरा खाने के बजाय आंख पर रख कर सोना। अहो- अहो और अबे तू के बीच झूलती छोटी सी बैल के अंडकोष के बराबर की लेकिन रक्ताभ, आभासी दुनिया। सोचते हैं कंप्यूटर का डब्बा कीर्ति देगा। एक गब्बर भी है भीतर जो अंत में पूछता है कितने आदमी थे? क्या लाए हो ज्वार? सोचा था सरदार शाबासी देगा। वहीं अपना ये भी है बजाज चेतक पर बैठा मूंगफली से बतियाता हुआ। कहां है सब सांबा, पाम्बा, बाम्बा। सफोला से पेट पर बने टायर स्वेटर में छिपाए, मफलर की छांव में कोलेस्ट्राल पाउच संभाले, झूलते गालों से पूछता हुआ और वो गब्बर कहां है? कहां गए सब अयं। किस सहारा के सहारे?

कंप्यूटर मुनाफा देता है। आढ़तियों को। यह कला आजकल डिब्बा ट्रेडिंग के नाम से जानी जाती है। न माल कहीं आता है न जाता है (ये सब करिश्माए तसव्वुर है शकील वरना आता है न जाता है कोई के अंदाज में) आनलाइन बुक जरूर होता है। जानने वाले जानते हैं कि मंहगाई बढ़ने के स्थायी कारणों में यह प्रमुख है। ब्लागिंग ख्यालों की डब्बा ट्रेडिंग है।

यह मास्टर काहे का अखबारों में इतना भौकाल बनाता है। अभिषेक कहता है जेब में बीस- चालीस पोस्टकार्ड रखा जाए और हर दिन एक पोस्ट कर दिया जाए जिन पर लिखा हो- सर जी, आज कई अखबार और पत्रिकाएं देख डालीं आप और उत्तिमा केशरी, पूर्णिया नहीं दिखाई दिए। प्लीज जहां कहीं भी हों, जिस भी हाल में हों, कुछ लिख-विख दीजिए न। अब लगता है कि यह मास्टर दरअसल इंटलेक्चुंअल गुंडा है जो हिंदी के गरीब किंतु परिस्थितजन्य कमीने लेखकों को उनकी जान में उड़नतश्तरी सी रहस्यमय किंतु भीम चीजों ब्लागिंग, गीगाबाइट, देरिदा, टेक्सट, उत्तरआधुनिकता, विखंडनवाद, यंगिस्तान वगैरा का डर दिखाकर अखबारों से हर हफ्ते साढ़े आठ सौ लेकर डेढ़ हजार तक खींचता रहता है। खैंच कर एतना सेफ हो गया है कि चश्मे में डोरी लगवा ली है कि कमानी टूट जाए तो भी सेफ रहेगा यानि निर्भरता के एकाधिक उपादान लहा चुका है। वे बेचारे पत्नी-बच्चों को कंट्रीमेड गन प्वाइंट पर खामोश कर अब भी साली-सलहज की दांताकिल-किल लिखे जा रहे हैं। अंदर ब्लगारी हुंकार भरी है आबे, पहचान। दो हंसों का जोड़ा छाप बीड़ी बेचने वाला आगरे का पप्पू आई विल क्राई टूमारो वाली लिलियन रूथ का हवाला देकर कहता है कि अमां रेवरेंड मदर उर्फ अम्मीजान चुप भी रहा करो, स्त्रीमर्श चल रहा है। ये दोनों बस आभासी नेता है बाकी असली जनता उर्फ प्रवृत्ति की जमात काफी बड़ी है।

अमां यही होना था ब्लागिंग में। वही चिरकुटपन। आज मैने सपने में हर्षद मेहता और धीरूभाई अंबानी दोनों को चिंदबरम को कंपट देकर, छोटा भाई कह कर इमोसनली ब्लैकमेल करते जब उसने छोटा होना मान लिया तो धौंसिया कर चुप कराते देखा। साथ में एक उपेक्षित एक छोटा सा काला, कुपोषित, नंगा, उत्पाती बच्चा था जो कहता था कि एक हफ्ता बहुत होता है बेटा- अब ब्लागिंग से नमस्ते करने का समय आ गया है। कट लो। करना क्या है आते समय दस-बारह दबाए थे जाते समय बेसिक में घुस कर बस एक डि्लीटटटटटटटटटटट वाला दाबना है और क्या? उस समय कोई शब्दपुष्टिकरण टाइप के बेहुदा सवाल पूछे तो हमसे कहना।

ऐसी दुनिया है यह जहां लोगों को उनकी पोस्टवैल्यू, फेसवैल्यू को ही स्वीकारना पड़ता है। उसी के हिसाब से रिस्पांस करना पड़ता है। अंत में तैलचित्र में प्रदर्शित समुद्र में तैरता हुआ हिमालय से भी ऊंचा आभासी पहाड़ खड़ा हो जाता है। यहां आंख का झपकाना, हकलाना, पसीना या कंपन नहीं देखे जा सकते। इस कला में हम पहले ही कम माहिर थे? त्याग और दान की नैतिकता पेलते हुए घूस बटोरने वाले, देवी को पूजते हुए बीवियों को कूटने वाले, बच्चों को भगवान मानते हुए ग्रेड के लिए उन्हें रेत कर शुतुरमुर्ग बनाने वाले, हर असुविधा के लिए सरकार को कोसते हुए अपराधमुक्त हो जाने वाले, कमजोरकोचांपने और दबंग के आगे हें-हें करने वाले। हम उन्हीं की तो संताने हैं। ब्लागों के इस कदर अमूर्त, सहमतिपरक और व्यक्तिगत होते जाने के कारण आनुवांशिक हैं। कोई एन्थ्रोपोलाजिस्ट अगर ब्लागर नहीं है तो चकित हो सकता है कि यह कला तो हमने सतयुग से साध रखी है उसके लिए ब्लाग की क्या आवश्यकता थी।

सबसे अच्छे ब्लाग वे होते हैं जिनमें कहा कम समझा ज्यादा जाता है।

जैसे कबाड़खाना, अंर्तध्वनि, मीत, रेडियो आदि। जैसे आज ही छाप-तिलक में यह क्यों कहा कि बात अधम कह दीनी रे नैना मिलाय के। वह भगवान और भक्तिन के बीच कौन सी बात थी जो अधम थी। क्या भगवान ने भी ब्लाग के जरिये कहा जिसे कोठारिन जी समझ नहीं पाईं और उनका आंचल मैला होते-होते रह गया।

26 जून, 2008

पॉवर--पुत्र


पिता अचानक पॉवर हाउस हो जाएं तो अंधियारे से बाहर आए बेटे चौंधिया कर गदर काटने ही लगते हैं। जहां भी पॉवर है, उसका प्रदर्शन है। वह दिखे नहीं तो पॉवरफुल को अपना होना व्यर्थ लगने लगता है। पॉवर होगा तो खैर, खून, खांसी, खुशी और अनुराग की तरह ही छिप नहीं सकता, इसमें नया कुछ नहीं है।

नया वह है जो मायवती सरकार के मंत्रियों के घरों में हो रहा है। बेटों को पता है कि पिता यानि मंत्री जी, पांच कालिदास मार्ग पर जो अगली बैठक होगी, उसमें फटकारे जाएंगे, उन्हें अलग खड़ा कर सबके सामने अपने लाडलों की करतूत बयान करने के लिए भी कहा जा सकता है। यहां तक कि जिसकी वजह से पॉवर है, मंत्री पद भी जा सकता है। एक झटके में पॉवर का लट्टू जो अभी जला ही जला है, फुस्स हो सकता है। फिर भी वे नहीं मान रहे।

मुख्यमंत्री मायवती अपने एक सांसद और दो मंत्रियों को जेल भिजवाने के बाद इन दिनों ईमानदारी से इस कोशिश में लगी हुई हैं उनका कोई मंत्री या विधायक कानून अपने हाथ में न ले। एक साल से थोड़ा पहले उन्हें जो बहुमत का जनादेश मिला था, वह सर्वजन फार्मूले से ज्यादा पिछली सपा सरकार के मंत्रियों विधायकों की गुंडागर्दी के खिलाफ मिला था और फिर लोकसभा के चुनाव सामने हैं। जिस सरकार ने कानून के राज को अपने एजेंडे पर सबसे ऊपर रखा हो, उसके मंत्रियों के बेटे इसी तरह गदर काटते रहे तो वह लोकसभा चुनाव में मतदाताओं के सामने क्या मुंह लेकर जाएगी? इसी सवाल ने मायावती को परेशान कर रखा है। अपने सरकारी घर, पांच, कालिदास मार्ग पर पिछली बैठक में मायावती ने तीन मंत्रियों, कई विधायकों को जब खड़ा करके अपने ही अंदाज में जब समझाया था तो उनके चेहरे पर यही परेशानी, गुस्सा बनकर उभर आई थी। उसी दिन सुबह मुख्यमंत्री ने महाराजगंज कोतवाली में भीड़ के साथ घुसकर एक कांस्टेबिल की हत्या के आरोप में जमुना प्रसाद निषाद को गिरफ्तार भी कराया था। यानि वह बैठक एक मंत्री की गिरफ्तारी के मंगलाचरण के साथ शुरू हुई थी।

अगर मंत्रियों के बेटों को मायावती जैसी मुख्यमंत्री का भय भी नहीं रोक पा रहा है तो जरूर इसके कुछ कारण होंगे और उनकी बुनियाद उस भावना में होनी चाहिए जो आदमी को अपने बस में लेकर थोड़ी देर के लिए हर तरह के भय से मुक्त कर देती है। यही सत्ता की खास चारित्रिक विशेषता है।

जो बेटे या युवा इन दिनों गदर काट रहे हैं उन सबमें एक खास समानता है। वे सभी दलित, पिछड़े हैं, सत्ता का चस्का नया है और नौसिखिए हैं। लालबत्ती, दरवाजे पर चंपुओं की जय-जयकार, फटकारने के बाद भी न हिलने वाली फरियादियों की भीड़ और मालिक, आपसे ज्यादा जलवा किसका की फुहारों से अकबका कर वे लड़खडाते हुए निकल पड़े हैं। जलवा के पावरप्ले में यह पहली पीढ़ी है, इसलिए उन्हें नहीं पता कि जलवा कैसे महसूस कराया जाता है। रौब, जलवा, आतंक, हनक वगैरा को बहुत पहले ही जमींदारों के सामंती युग में ही क्राफ्ट में बदल डाला गया था। जिसके पास पॉवर हो उसे खुद हाथ गंदे करने की जरूरत नहीं पड़ती। इसका एक कारण यह है कि जलवा सबसे अधिक असरदार तब होता है जब आप अनुपस्थित हों और वह किसी बहुरूपिए की तरह भेष बदल कर तरह-तरह से लोगों के सामने प्रकट हो।

पॉवर को इस्तेमाल करने का ग्रामर न जानने के कारण ही ये नौसिखिए बेटे गच्चा खा रहे हैं और अपने पिताओं के लिए मुसीबतें खड़ी कर रहे हैं। झांसी में मंत्री रतनलाल अहिरवार के बेटे ने अपने दोस्त का क्रेशर बिठाने का विरोध करने वाले आदमी को धमकाने के लिए फायरिंग की तो उसकी बीवी जूझ गई और भीड़ ने घेर लिया। बेटे को अपना लावलश्कर छोड़कर भागना पड़ा। सबूत के तौर गाड़ी और रायफल भी वहीं छूट गई। अंबेडकर नगर के अस्पताल में परिवहन मंत्री रामअचल राजभर के बेटे को अपने चिरकुट पत्रकार दोस्त को जलवा दिखाना था जो चाहता था कि एक वकील की बीवी से पहले डाक्टर उसे अटेंड करे। वकीलों की भीड़ ने मंत्री के बेटे और दोस्तों को धुनक दिया, महीने भर हड़ताल पर रहे और अब लखनऊ हाईकोर्ट में आय से अधिक संपत्ति का मुकदमा दाखिल कर दिया है। याचिका में इस बात का जिक्र है कि रामअचल राजभर जो सन् १९९२ तक साइकिल पर लाउडस्पीकर बांधकर चूहा मार दवाई बेचते थे, के पास इतनी संपत्ति कहां से आई। गोरखपुर में मंत्री सदल प्रसाद के भाई ने
अपने एक परिचित को हनक दिखानी चाही, नही् दिखी तो बिजली विभाग के एक क्लर्क पर कट्टा तान दिया। यह नौसिखियापन नहीं तो और क्या है। ये जिन्हें डराने की कोशिश कर रहे हैं वे सभी मामूली लोग है और यह भी जानते हैं कि ये नए जलवा गर कल तक हमारी ही हालत मे डरे, सहमें रहा करते थे। इसी कारण वे सरकारी ताकत की परवाह न करते हुए उनसे जूझ जा रहे हैं। लेकिन यह नया-नया नशा है जिसके आगे मंत्रियों के बेटे मजबूर हैं। जब उतरेगा तब सोचेंगे क्या बुरा था क्या भला।

जरा इन बेटों की तरफ खड़े होकर सोचिए कि उनके सामने विकल्प क्या है। अब तक जो तथाकथित कुलीन, भद्र, सुसंस्कृत, ऊंची सोच के लोग सत्ता में रहे उन्होंने भी तो यही किया। पॉवर का ग्रामर जानते थे इसलिए अपने हाथ गंदे नहीं किए, खुद नहीं फंसे और बलि के लिए पाले बकरों से काम चलाते रहे। इनके सामने सत्ता के इस्तेमाल का और मॉ़डल है ही नहीं। यह कुछ वैसा ही है कि जंगल में भेडि़ए के साथ पला बच्चा भेड़िया हो जाता है। अपवाद के तौर पर कुछ लोगों ने सत्ता का इस्तेमाल कमजोरों की सरपरस्ती और अन्याय के खिलाफ लड़ने के लिए जरूर किया है। उनके रास्ते पर चलना जरा जिगरे का काम है जिसे इन दिनों मूर्खता भी कहा जाता है।

21 जून, 2008

ब्लागविवेचन कौमुदी



अयं कः।


अयं ब्लागरः
ब्लागरं किं करोति
कटपट-पश्यति-खटपट- पश्यति, क्लिकति पुनपुनः मूषकम्।


ब्लागर कौन होता है? जिसके पास कम्प्यूटर होता है। कंपूटर किसके पास होता है? जो साक्षर होता है। क्या कंपूटर होने से कोई प्राणी ब्लागर होता है? नहीं सिर्फ मनुष्य अब तक ब्लागर होता पाया गया है और इंटरनेट कनेख्शन भी अपरिहार्य है। इंटरनेट किसके पास होता है? जो शुल्क देता है। यह शुल्क लेता कौन है क्या वणिक? चुप वे देवता हैं जो ज्ञान, सूचना और अभिव्यक्ति और मनोरंजन के समुद्र में तैरने के लिए कास्ट्यूम और उसके खारे जल की हानियों से जिज्ञासुओं की त्वचा को बचाने के लिए आसुत जल और तदुपरांत लोशन देते हैं। साधु, साधु।


किंतु कंपूटर किसके पास होता है? जिसके पास उसे रखने के लिए एक मेज हो। मेज किसके पास होती है? जिसके पास उसके समक्ष रखने के लिए एक कुर्सी हो। कुर्सी किसके पास होती है? हां यह भी एक तरह की खामोश, अनुल्लेखनीय सत्ता है, अधिक काल तक उस पर वही बैठ पाता है जो नितंब-दाह से बचने के लिए उस पर कुशन रखता है। कुशन किसके पास होते हैं? जिसके पास अन्य कुशन होते हैं अर्थात वे समूह में रहते हैं। अन्य उपादान? नेत्र हानि से बचने के लिए चश्मा, पानी के लिए जलछुक्कक, काफी का मग जिसमें काफी, चाय या बियरादि वैकल्पिक द्रव हों. ये सब क्या अंतरिक्ष में अवस्थित होते हैं। मनुष्य जिस गुरूत्वाकर्षण का दास है उसी से आबद्ध होने के कारण कदापि नहीं, ये किसी नगर या उपनगर के किसी पुर के भवन में या भवन के एक कमरे में स्थित होते हैं।


भवन या कमरा किसका होता है? जो उसका स्वामी होता है या किराया अदा करता है। किराया का पण्य क्या होता है? मुद्रा- लीरा, डालर या रूबल देश, काल, परिस्थिति के अनुसार परिवर्तनीय किंतु अपने मूल स्वरूप में अविचल एवं अपने समान पण्य की सभी वस्तुओं यथा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष आदि को क्रय कर सकने में सक्षम. साधु साधु।


ब्लागर का संपूर्ण अपरिहार्य एवं तात्कालिक परिवेश कितने मूल्य का होता है? अगर वह अविवाहित, समूह में रहते हुए लैमारी का अभ्यासी या कार्यालय के संसाधनों का प्रयोग करने में निपुण नहीं है तो भारतीय मुद्रा में न्यूनतम बीस हजार रूपए। इतनी भारतीय मुद्रा कहां से आती है? चाकरी, व्यापार किवां उत्कोच या चोरी करने से अन्य स्रोत भी हैं जिनका तुम्हारी हरी धनिया सी ताजी और खुशबूदार चेतना पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है। साधु साधु।


उत्पादन की प्रक्रिया का चिंतन से गूढ़ संबंध है अस्तु बीस हजार या अधिक भारतीय मुद्रा अर्जित करने की प्रक्रिया ब्लागर रूपी जातक की चेतना पर प्रभाव डालती है और उसके विचारों को कैसे रूपांतरित करती है? उसके मष्तिष्क का प्रतिबद्धता भाग लुप्त हो जाता है, विवेक भाग उत्तरोत्तर क्षीण होता है, अपने वर्तमान स्तर की सुरक्षा व प्रगति हेतु चेष्टा करने वाला भाग ग्रीष्म के वायु की भांति प्रलयंकर हो जाता है। तो क्या निर्धन, विकलांग, स्त्रियां, बालक या पण्यविहीन वनों में रहने वाले संन्यासी ब्लागिंग नहीं कर सकते यदि करें तो उनके विचार कैसे होंगे? किसी प्रकार की विकलांगता, लिंग या वय से इसका संबंध नहीं है इसका संबंध संसाधन एवं तकनीक के ज्ञान से है जिसके संसाधन गुड़ है जिसके पीछे ज्ञान कुत्ते की तरह विचरण करता है। साधु साधु।


ब्लागिंग का उपयुक्त काल क्या है और इसे कैसे करना चाहिए? प्रातः प्रातराश से पूर्व या रात्रि को कोलाहल प्रिय परिजनों के शयन के पश्चात, यदि सिद्ध हो जाए तो कभी भी किया जा सकता है। इसका हेतु क्या है और यह क्यों आवश्यक है? इसका अविष्कार ग्राम सभ्यता, संयुक्त परिवारों एवं कृषि आधारित व्यवस्था के उच्छेद काल के परवर्ती भ्रष्टाचार के कच्चे माल से चलने वाले उद्योगों से प्रकीर्ण महानगरों में मनुष्य के अकेले पड़ जाने के पश्चात असुरक्षा की भावना के शमन के लिए हुआ। भली प्रकार से सुसज्जित एवं अन्य सुखकर उपादानों से आच्छादित किंतु बंद प्रकोष्ठों में बैठे मनुष्य समूह से पृथक श्रृंगालों की भांति हुंआ-हुंआ करते हैं अन्य उनकी ही ध्वनि को प्रतिध्वनित करते हैं तब उन्हें एक बार फिर समूह में होने का आभास होता है। इसी प्रक्रिया में एक अन्य रसायन का भी स्राव होता है जिससे लगता है कि श्वान काष्ट की विशाल गाड़ी की छाया में सुखपूर्वक चलने की बजाय उसे संपूर्ण बल से खींच रहा है। तदनंतर इस कल्पित पुरूषार्थ से श्वास फूलने लगता है और वत्स तुमसे यह गुप्त भेद कहता हूं कि उसकी अनुभूति संतति प्राप्ति हेतु किए गए मैथुन से श्लथ आत्मा को मिलने वाले उल्लास मिश्रित आनंद से भिन्न नहीं होती।


इन श्रृंगालों का स्वामी कौन है?


वे आभासी विश्व में रहने के अभ्यस्त हो चले हैं अतः उनमें से अधिकांश स्वयं को स्वामी कहते है, कुछ के स्वामी आभासी विष्णु हैं जो क्षीरसागर में बीस हजार किमी से अधिक लंबे इंटरनेट केबिल रूपी शेषनाग पर लेटे लक्ष्मी से पैर दबवाते रहते हैं।


क्या विष्णु ब्लागिंग करते हैं?


नहीं करते तो अब करेंगे लेकिन अब तुम जाओ सुत रहो। अगले सत्र में अपने मातृकुल से अनुमति से लेकर आना।


19 जून, 2008


असली कौन चेहरा या हाथ

अमिताभ बच्चन जी आजकल अपने ब्लाग पर नैतिकता, ईमानदारी, अच्छाई वगैरा पर बड़ी प्यारी-प्यारी बातें कर रहे हैं, मीडिया को भी कस कर हौंक रहे हैं। मीडिया ने जीवन भर जो उन पर ज्यादती की उसका संचित बदला ले हैं। बता ही डाला कि उन्हीं की दारू पीकर भाई लोग उन्हीं को अगले दिन नसीहत लिख मारते हैं।

ब्लाग बिगबीबिगअड्डा.काम पर उनका जो फोटो लगा है डराने और बस जरा सी जुगुप्सा जगाने वाला है। क्योंकि उनके हाथों और चेहरे की बीच कम से कम पचास साल का फासला है। लगता है कि यह हाथ इस चेहरे को कभी-कभार आशीर्वाद देने या कान उमेठने के लिए छूता होगा वरना दोनों में बरसों तक देखादेखी नहीं होती होगी। बगल में हरिवंश जी की एक कविता है इस्तेमाल यह बताने के लिए किया गया है कि जिंदगी ने मुझे इतना मौका ही नहीं दिया कि मैं किए-कहे-माने की नतीजा सोच सकूं। बेटा-तुम जो आजकल कर रहे हो ठीक है, यानि सही जा रहो हो- एक पिता की कविता अपने व्यापक सरोकारों से कट कर सिर्फ अपने बेटे के लिए वहां कुछ ऐसा ही बिंब बना रही है।

उन खबरों का उनकी तरफ से कोई अभी तक खंडन नहीं आया है जिनमें कहा गया है कि ये बातें करने के लिए उन्हें सौ करोड़ दिये गए हैं। वे ये बातें अपनी तरफ से करते, इसके लिए इतना ज्यादा पैसा लेने की क्या जरूरत थी। अगर उन्होंने पैसा ले लिया है तो इस नैतिकता, ईमानदारी, साफगोई, हिम्मत आदि सामानों का असली मालिक किसे माना जाए? इसे बताने के लिए भी क्या वहां हरिवंश राय बच्चन की कोई एक कविता राइट क्लिक- कापी फिर क्लिक और पेस्ट की जाएगी।

आज बाराबंकी के केपी तिवारी से बात हुई। तिवारी जी लगे बताने कि अपने भाई के ५२ वें जन्मदिन यानि २७ जनवरी को बच्चन जी ने अपनी बहू एश्वर्य, लड़के अभिषेक और धर्मपत्नी जया बच्चन के साथ दौलतपुर गांव आकर लड़कियों के एक कालेज का शिलान्यास किया था। कालेज का नाम पहले हरिवंश जी के नाम पर रखा जाना था लेकिन रखा एश्वर्य के ही नाम पर गया।

वहां चंद्रबाबू नायडू, ओमप्रकाश चौटाला, फारूख अब्दुल्ला यानि पूरा तीसरा मोर्चा और तीसरे मोर्चे के चेयरमैन मुलायम सिंह यादव भी थे। जया बच्चन ने कहा कि वे चाहती है यूपी के हर घर एश्वर्य जैसी पढ़ी-लिखी, शालीन, समझदार बहू आए इसलिए यह कालेज शुरू किया जा रहा है। उन्होंने एश्वर्य से भी कहा कि वे हर साल यहां आकर देखें कि पढ़ाई कैसी हो रही है- कहीं मस्टराइनें एक दूसरे की जुएं निकाल रही हों और लड़कियां पिछवाड़े के खेतों में कबड्डी खेल रही हों। एश्वर्य ने माइक पर अभिषेक को कहा अभिषेक जी और अभिषेक ने कहा ऐश्वर्य जी और लोगों को बड़ा मजा आया। बड़ी देर तक तालियां बजती रहीं। पता नहीं क्यों, शायद दोनों पहली बार एक दूसरे का पहचान लिया था इसलिए।

यह भी कहा गया कि कालेज अगले सत्र से शुरू हो जाएगा और इसे चलाने का जिम्मा जया प्रदा के एनजीओ निष्ठा फाउंडेशन को दिया जा रहा है। उस दिन जिला प्रशासन ने हेलीकाप्टरों के फेरे और तामझाम के सलमे-सितारे गिन कर तखमीना लगाया कि कोई पांच करोड़ का खर्चा शिलान्यास, पूजा-पाठ पर तो आया ही होगा। जो झक्कास हाईप्रोफाइल बस अमिताभ बच्चन के परिवार को लेकर एयर पोर्ट से वहां आई थी वह अफसरों की नजर में चढ़ गई और जांच हुई तो पता चला कि हमीरपुर से उसका जो रजिस्ट्रेशन था फर्जी है जांच एक दारोगा कलकत्ता अमर सिंह के लिए घर गया वहां उसका स्टिंग आपरेशन हो गया और वह मुख्यमंत्री मायावती की बदले की भावना का सबूत बन गया। किस्सा चंद्रकांता संतति सा पेंचदार है....बहरहाल भटकने से बचने के लिए बाराबंकी के दौलतपुर चलें।

तिवारी जी ने बताया कि जौन ईंटा रखा रहा गा हुंआ, कुछ दिन रखा रहा, अब मनई लइ जा रहेन चरनी-नांद बनावै खातिर और जयाप्रदा के फाउंडेशन का अबै तक कौनो अता-पता नहीं ना।

जिस गांव दौलतपुर में यह कालेज है वहां एक और किसान ने अखबार पढ़कर यह जानकारी प्राप्त की है अमिताभ बच्चन का हाथ थोड़ा तंग है क्योंकि किसी अफ्रीकी देश में अभी उन्होंने बयान दिया था कि कालेज के लिए कोई ट्रस्ट है जो अभी पैसा इकट्ठा करने का काम कर रहा है।

तिवारी जी का कहना है कि खांमखां का हौफा है अरे जेतना उद्घाटन में फूंकिन ओतने में तौ हियां लल्लन टाप कालिज बन जातै।

अमिताभ बच्चन जी, जिस कालेज ने आपको जीवन के सबसे बड़े संकट से उबारा ताकि आप रोष में सिंकती अपनी नैतिकता को लोगों तक अबाध पहुंचा सकें- वह कब से शुरू होगा?

ब्लाग अनुबंध की शर्त के बतौर अगर किसी कंपनी या आदमी ने प्रतिबंध न लगा रखा हो तो मैं विनम्रतापूर्वक चाहूंगा कि हारमोनियम पर आकर बताएं। यह भी कि जब आप खुले दिल से डायलॉग करने ब्लाग पर आ ही गए तो यह हाथ और चेहरे बीच आधी सदी का फासला क्यों है? कोई जरा ईमानदार सी फोटो पेस्ट कीजिए ताकि जिन्होंने जिंदगी भर आपकी तस्वीरें देखीं अब आपको भी देख सकें।

17 जून, 2008

साभार विजय- देह की भाषा में बतियाता खबरची

भाई दिलीप मंडल की पोस्ट एसपी की गैरहाजिरी का मतलब में अनिल यादव ने लिखा है, ‘काश, वह क्लिपिंग मेंरे पास आज होती तो आधी रात इतना हारमोनियम बजाने की जरूरत नहीं पड़ती। शायद आपके किसी परिचित ने कोई किताब एसपी पर एडिट की है, जिसमें शायद वह राइटअप है। अगर वह मिल सके तो उसे जरूर अपने ब्लाग पर डालिएगा। ’

एसपी सिंह के निधन के बाद निर्मलेंदु जी ने एक पुस्तक संपादित की थी, ‘शिला पर आख़िरी अभिलेख ’। पुस्तक में विशेष सहयोग देने वालों में दिलीप मंडल भी थे। यह पुस्तक मेरे पास है। रिजेक्ट माल पर मैंने जो टिप्पणी की थी, उसमें जिस किताब का ज़िक्र हुआ है, वह यही है। अनिल यादव का वह लेख पृष्ठ क्रमांक 192 पर है। शीर्षक है, ‘देह की भाषा में बतियाता खबरची ’। अनिल जी का वह लेख प्रस्तुत कर रहा हूं : विजयशंकर चतुर्वेदी

‘एंकरपर्सन’ एसपी सिंह को परदे पर ख़बर बांचते देखना अजीब था। एक तटस्थ और शातिर सांवादिक (कम्यूनिकेटर) की तरह ख़बर को हवा में तैरा कर वह चुप नहीं हो जाते थे - भौंहें सिकोड़ कर, बहुत ज़ोर लगा कर, गर्दन मटकाते हुए पढ़ते थे। मानो ख़बर में छिपी ख़बर को धकियाते हुए परदे के पार जितना अधिक हो सके, उतनी दूर भेज देना चाहते हों। उन्हें शायद यक़ीन नहीं आता था कि दूरदर्शन के सेंसर की चारा मशीन में फंस कर लंगड़ी हो चुकी ख़बर ख़ुद अपना सफ़र तय कर पाएगी।उनका यह ढंग थोड़ा खीझ ज़रूर पैदा करता था, लेकिन साथ ही साथ दर्शकों को ज़्यादा हो कर टीवी के सामने बैठने को बाध्य भी करता था। आख़िर कुछ तो है, जिसकी तरफ आंखों से, गर्दन को पूरा ज़ोर लगा कर वह इशारा कर रहे हैं।

वह सरकार और बाज़ार की बंदिशों को धकेल कर देह की भाषा में सबसे बतियाते खबरची थे। खबरें उन्हें फड़फड़ाने को मजबूर करती थीं। यह बहुत बड़ी बात थी। शिखर पर बैठा हुआ प्रोफेशनल होने के बावजूद एसपी ठंडे और तटस्थ नहीं रह पाते थे।

जनवरी 1997 की एक शाम। ‘आज तक’ के दिल्ली दफ्तर में एसपी से हुई लंबी मुलाक़ात जेहन में आज भी फंसी हुई है - जस की तस। वह पत्रकारिता में बहुतों के आग्रह थे। कुछ के गुरूर (दिलीप जैसे लोगों के) थे और कुछ के लिए कुशल ख़बर मुनीम। यहां दूसरे एसपी थे। आत्मरति में नहायी आग और पत्रकारीय किलाफतह लनतरानियों से एकदम अछूते। थोड़े हताश, बहुत आक्रामक, करीब-करीब मुंहफट और बेधड़क। बिना इंट्रो के नंगी ख़बर की तरह अनौपचारिक और बेलौस।

उस शाम इस एसपी के सामने मैं भी नौकरी मांगने की गरज से पहुंचा औरों की तरह।

एक रिपोर्टर के हाथ से पैकेट ले कर खोलते हुए वह मुस्कुराए - ‘देखा? हमारा रिपोर्टर अब भी भालू से खेलता है।’ रिपोर्टर झेंप गया। वह बोले, ‘अरे भाई, ख़बर पकड़ने के लिए बच्चों जैसा कौतुक ज़रूरी है।’रिपोर्टर के जाते ही वह दोबारा पुरानी पटरी पर आ गये, ‘हां, तो आप इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को बूझना-समझना-जानना चाहते हैं। सच कहूं तो यह बहुत छिछोरा माध्यम है। भदेस ढंग से कहें तो थूकने की भी जगह नहीं है यहां। ख़बरनवीस को कुछ नहीं करना है, केवल माइक सामने वाले के मुंह पर अड़ा देना है। बाकी काम कैमरामैन करता रहेगा। समय इतना कम है और बंदिशें इतनी ज़्यादा कि किसी के लिए बहुत कुछ करने की गुंजाइश ही नहीं है। पांच साल कोई यही करता रहे तो तकनालोजी का तो बड़ा जानकार हो जाएगा, लेकिन दिमाग़ एकदम ख़ाली हो जाएगा। अगर आप कुछ ख़ास करके ले भी आएं, तो दूरदर्शन का सेंसर कैंची चला देगा, वहां एक से एक ठस दिमाग़ वाले बैठे हैं। आम बोलचाल की भाषा, दरअसल, उन्हें समझ में नहीं आती, आपत्तिजनक लगती है। हां, यहां पैसा और चकाचौंध बहुत है।’


एसपी की आंखें सिकुड़ कर और छोटी हो गयीं। फिर वह झटके से बोले, ‘मुझे कोई मुगालता नहीं है कि लोग मेरे लिखे को पढ़ने के लिए बेताबी से इंतज़ार कर रहे होंगे। और यह भी नहीं कि मेरे लिखे से कोई उलट-पुलट हो जाएगी। अब मेरा अख़बार में लिखने का मन नहीं करता। हिन्दी के अख़बारों में कोई चीज़ों की तह में उतर कर पड़ताल करता और लिखता नहीं है। वहां साहस और पहल का बहुत-बहुत अभाव है।’


‘मेरा मानना है कि पढ़े-लिखे विचार वाले लोगों को प्रिंट मीडिया में ही जाना चाहिए। अब भी वहां बहुत गुंजाइश है।’नौकरी गयी एक तरफ। एसपी को और अधिक खोलने के लिए सीधी मुठभेड़ का मन बना चुका था। पूछ ही लिया, ‘फिर आप सब जानते-बूझते हुए क्यों इस माध्यम में आ गए?

’कुर्सी पर निढाल होते हुए एसपी खुले, ‘हां यार, आ तो गया। मैं ‘इंडिया टुडे’ में एक कॉलम लिख रहा था। पैसे भी ठीक मिल रहे थे। काम चल रहा था। इसी बीच बीमार पड़ा और अस्पताल पहुंच गया। लिखना रुक जाने से पैसे मिलने का सिलसिला टूट गया। अरुण पुरी (लिविंग मीडिया के मालिक) से पहले भी बातचीत हुई थी। इस बार फिर बात हुई। उन्होंने कहा कि काम शुरू कर दीजिए। मैं मना नहीं कर पाया और ज्वाइन कर लिया।’‘लेकिन यहां आने के बाद आपने पत्रिका और अख़बारों में लिखना क्यों छोड़ दिया?’एसपी की आंखें सिकुड़ कर और छोटी हो गयीं। फिर वह झटके से बोले, ‘मुझे कोई मुगालता नहीं है कि लोग मेरे लिखे को पढ़ने के लिए बेताबी से इंतज़ार कर रहे होंगे। और यह भी नहीं कि मेरे लिखे से कोई उलट-पुलट हो जाएगी। अब मेरा अख़बार में लिखने का मन नहीं करता। हिन्दी के अख़बारों में कोई चीज़ों की तह में उतर कर पड़ताल करता और लिखता नहीं है। वहां साहस और पहल का बहुत-बहुत अभाव है।’

मुझे झटका लगा। क्या एसपी इसी तरह हताशा और मोहभंग की हालत में बीते कई सालों से यंत्रवत लिखते आये हैं। मैंने उन्हें दूसरी तरफ मोड़ा, ‘ऐसा नहीं है। हिंदी अख़बारों में भी नये प्रयोग हो रहे हैं। अभी ‘अमर उजाला’ ने अपने एक संवाददाता को उत्तरप्रदेश में मंडल और मंदिर आन्दोलन के बाद बदली सामाजिक और राजनीतिक स्थितियों के अध्ययन के लिए लगाया है।

’अनमने-से दीख रहे एसपी चौकन्ना हो गये, ‘क्या सचमुच ऐसा है! क्योंकि आम तौर पर हिंदी में दूसरों (ख़ास कर अंग्रेज़ी) का कहा सच मान लिया जाता है। लोग ख़ुद खोजने की ज़हमत नहीं मोल लेते। जिसने भी यह काम किया है, उस सम्पादक से मैं मिलना चाहूंगा। यह मामूली बात नहीं है!’इस बातचीत के बीच वह लगातार सहकर्मियों को निर्देश देते हुए, टेलीप्रिंटर से ख़बरें छांटते हुए, मज़ाक करते हुए रिकॉर्डिंग के लिए तैयार हो रहे थे।

ख़बरों पर बहस करते-करते अचानक किसी को डपट देना और तुंरत गढे गये किसी लतीफे से खिंच आये सन्नाटे को तोड़ डालना उनके स्वभाव का अविरल बहता हिस्सा था।मैं ख़बरनवीस एसपी में अब कुछ और खोज रहा था। वह क्या चीज़ है, जो गाज़ीपुर के उस छोटे-से अंधियारे गांव से यहां कनाट प्लेस में बसे मायावी मीडिया लोक के शीर्ष तक उन्हें ले आयी है।ख़फीफी दाढ़ी और पैनी आंखों की कौंध के बीच उसे तुंरत खोजना असंभव था।

आत्मविश्वास से भरे एसपी को वहां शीर्ष पर देखना सचमुच एक गुरूर जगाता था कि मीडिया का सिंहासन सिर्फ विदेशपलट या वसीयतनामे जेब में ले कर आये लोगों के लिए ही नहीं है। अपनी ज़मीन की समझदारी में पगी जिजीविषा भी वहां छलांग मार कर बैठ सकती है। मुझे वहां खोया हुआ छोड़ एसपी ने कुर्सी पर टंगा कोट उठाया और झटके से रिकॉर्डिंग के लिए चले गये......यही उन्होंने 27 जून को दिल्ली के अपोलो अस्पताल में भी किया। इससे उस गुरूर को धक्का जरूर लगा है।

उनकी फोटो

सही समय पर सही जगह सेट न कर पाने की तकनीक न आने के कारण एसपी का भुटन्नी भर फोटो दाहिने लग गया है। मैग्नीफाइंग लेन्स से देखेंगे तो पाएंगे कि हाल में सचिन तेंदुलकर को सुल्तापुर घुमाने वाले कांग्रेसी एमपी, राजीव शुक्ला के गुरू और फरूर्खाबाद से एमपी रहे पूप्रमं वीपी सिंह के चेले पत्रकार भी दिखाई दे रहे हैं।

16 जून, 2008

एस पी की गैरहाजिरी का मतलब

हां भाई दिलीप, इसी महीने एसपी की मौत हुई थी और उसके एक हफ्ते बाद लखनऊ में एनेक्सी के प्रेस रूम में एक रस्मी शोक सभा हम लोगों ने की थी। हम लोगों के पास वह फोटो नहीं था जो उनसे नत्थी हर कार्यक्रम में लगता आया है। जैसा कि देश में अन्य शोकसभाओं में कहा गया था, उस शोकसभा में भी आश्चर्यजनक समानता से कहा गया- अच्छे थे, भले बहुत थे, पत्रकारिता के सबसे उज्जवल नक्षत्र थे और यह भी कहा कि उनके निधन से क्षति अपूरणीय हुई है।

लेकिन मुझे पक्का भरोसा है कि इले. मीडिया की इस गति यानि ओझा, सोखा, भूत, चुरइन, तंत्र-mant, बैंगन में भगवान, हत्या-बलातकार के मूल से भी वीभत्स रिप्ले, बिल्लो रानी, कैसा लग रहा है आपको, जनता गई तेल लेने-टीआरपी ला उर्फ छीन-झपट-झोली में धर टाइप फ्यूचर का अंदाजा था और वे बहुत चाहते हुए भी इसे रोकने के लिए कुछ नहीं कर पाए.

कर भी क्या सकते थे वे? उनके बस में था ही क्या? शायद वे भी बस एक पुरजा बनकर रह गए थे। या नई छंलाग से पहले जरा गौर से तमासा देख रहे थे। जितना रविवार में या दैनंदिन जिंदगी में उनने किया वो क्या कम था, इससे ज्यादा की उम्मीद उनसे करना क्या ज्यादती नहीं है। अक्सर हम लोग पत्रकारों में नायकत्व की तलाश की रौ में उस शालीन, चुप्पे, नजर न आने वाले चतुर व्यापारी उर्फ मालिक को भूल जाते हैं जिसका पैसा लगा होता है। यानि जिसने हमारे नायक को नौकरी दी होती है और हर महीने तनख्वाह दे रहा (झेल रहा ) होता है।

अगर कोई बदलाव आना है इले, प्रिंट, इंटरनेट पत्रकारिता में तो पहले उस पूंजी के चरित्र, नीयत और अकीदे में आएगा (क्या वाकई)- जिसके बूते अभिव्यकक्ति की स्वतंत्रता का सुगंधित, पौष्टिक बिस्कुट खाने वाला या लोकतंत्र का रखवाला यह कुकुर (वॉचडाग) पलता है। बहरहाल इस कुकुर को पोसना मंहगा शौक बना डाला गया है और उसे बिजनेस कंपल्सन्स के कारण इतना स्पेस देना ही पड़ता है कि कभी-कभार गुर्रा सके। ...... और यह गुर्राना भी आवारा पूंजी के मालिकों के छलकते लहकट अरमानों के हूबहू अमल के दौर में कम बड़ी सहूलियत नहीं है।

उस शोक सभा के एक दिन पहले मेरी लिखी आबिचुअरी अमर उजाला के लखनऊ संस्करण के पेज ग्यारह पर छपी थी (अपने वीरेन डंगवाल की जगह रिपोर्टर की खबर अपने नाम से छापने वाला, जनेऊ का प्रतिभा की तरह इस्तेमाल करने वाला कोई और संपादक होता तो शायद वह भी नहीं छपती )। काश, वह क्लिपिंग मेंरे पास आज होती तो आधी रात इतना हारमोनियम बजाने की जरूरत नहीं पड़ती। शायद आपके किसी परिचित ने कोई किताब एसपी पर एडिट की है जिसमें शायद वह राइटअप है। अगर वह मिल सके तो उसे जरूर अपने ब्लाग पर डालिएगा।

मैं, उन दिनों मेरठ अमर उजाला में खबर एडिट करने वाला मजूर था और पार की पटकथा लिखने वाले, चुंधी आंखों और न फबने के बावजूद खफीफी दाढ़ी रखने वाले एसपी के लिए मेरे भीतर कोई सम्मोहन था। वह होना ही था वरना गिद्धों की बीट से गंधाती दिल्ली रोड से हर शाम गुजर कर अमर उजाला में पपीता फल ही नहीं औषधि भी टाइप के फीचर और मृतक साइकिल पर जा रहा था टाइप खबरें रात के तीन बजे तक एडिट करते हुए और सुभाष ढाबे वाले के मोबिल आयल में डूबे गुनगुनाते पराठे खाकर जीना संभव नहीं था।

(हां वे इतने मोटे और फूले होते थे फोड़ने पर सीटी बजाते और गुनगुनाते थे )

तो तिरानबे में दीवाली के आसपास अपने जिले के पत्रकार एसपी से मिलने एक दिन आजतक में पहुंच गया। दो दिन- कई घंटे बैठने के बाद मुलाकात हुई। बैठने के दौरान मैने पीपी, राकेश त्रिपाठी अनेकों परिचितों और खुद की थोड़ी दबी (लेकिन इसी दबाव के कारण ज्यादा फैले नथुनों से एफिशिएंट) नाक से सूंघ कर जाना कि आजतक में एक चारा मशीन इन्सटाल हो चुकी थी जिससे गुजर कर अच्छी खासी तंदरूस्त खबर लंगड़ाने लगती थी। एसपी टीवी के बाहर ्पनी गरदन निकाल कर उसे दर्शक तक ठेलने की जिद भरी कोशिश करते पर वह टांग टूटी मैना की तरह वहीं कुदकती रह जाती थी।

एसपी चौकन्ने बहुत थे वे बहुगुणा की तरह मुझे और मेरे मालिक अतुल माहेश्वरी दोनों को जानते थे।

स्वाभिक था कि उन्होंने मुझे नौकरी-आतुर गाजिपुरिया युवक समझा होगा। लेकिन थोड़ी बात-चीत के बाद कहा कि इस मीडियम में क्यों आना चाहते हो यह तो अब थूकने की भी जगह नहीं है। यहां क्या है, बस भोंपू लेजाकर किसी नेता-परेता या बाइटबाज के मुंह पर अड़ा देना होता है, बाकी काम वह खुद करता है। यहां सोचने समझने वाले के लिए कोई स्पेस नहीं है। तुम प्रिंट में हो फिर भी वहां बहुत स्पेस है और फिर अतुल माहेश्वरी जैसा समझदार लाला तुम्हारा मालिक है जिसने समय की नब्ज देखते हुए कारोबार जैसा अखबार निकाला है।


इसी बीच दीपक कमरे में आगया उसके हाथ में एक टेडी बियर था एसपी ने उसे लेकर उलट-पलट कर देखा, फिर मेरी तरफ देखा, देखा हमारा रिपोर्टर अभी भी भालू से खेलता है। इसमें व्यंग्य था या दीपक के ट्रेंडी होने का रिकगनिशन मैं नहीं समझ पाया। दीपक के तो खैर दोनों होंठ कानों को छू रहे थे समझ ही गया होगा।

स्वाभाविक यह भी था कि मुझे लगा कि मीठी गोली है, अब कट लो का इशारा है। इडियोलाजी और मीडिया को जनता के पक्ष में इस्तेमाल करने के लौंडप्पन भरे अरमानों की बातें काफी हो लीं अब काम का समय है चलो....मेरठ निकलो।

बराबरी के आंतरिक स्केल पर सबको नापने के कुटैव से और उनके आकर्षण से त्रस्त मैने पूछ लिया, तो आप फिर क्यों अब तक यानि इस मीडियम में क्यों बने हुए हैं। आपको नहीं लगता कि निकल लेना चाहिए?

----मैं तो बेहद बीमार था (बीमारी बाद में पता चली) अस्पताल का बिल (मैने मतलब निकाला कर्ज)बहुत हो गया था। एक दिन अरूण पुरी बोट क्लब पर मिल गए वहां से हम दोनों पैदल चलते हुए यहां तक आए और हाथ पकड़ कर उन्होंने इस कुर्सी पर बिठा दिया। तब से बैठा हुआ हूं। क्या कर सकता हूं पैसा चाहिए तो यहीं बैठना होगा।

होगा (होबो) सुनकर लगा बंगाल वाले एसपी हैं क्योंकि उनकी आंखों की कोर भीग गई थी। एक पछतावा था जो मैने महसूस किया।

उस रात राकेश के कमरे पर नोएडा में रूकना था हम लोग आज तक की रात की पाली के स्टाफ को घर छोडने वाली कार से वापस से लौटे। कार में एक ढलती सी, सेक्सी, बस जरा बीच-२ में मजबूर लगती गाय सी कातर आंखों वाली लड़की थी जो किसी जूनियर को बता रही थी कि उसका सपना किसी दिन दो वारशिपस् की आमने-सामने टक्कर को कवर करना है। मुझे रोमांचित होना चाहिए था लगा कि इससे कल रात ही कोई थ्रिलर पढ़ा है या फिर जो इसके रोल माडल सर होंगे उनकी बकचोदी को सत्य मानकर उवाच रही है।

बहरहाल फिर वह ढलती लड़की फिर कभी अफगान, इराक या किसी और वार के दौरान नजर नहीं आई।

फिर लड़की की नकली उन्माद में खत्म तेल की भभकती ढिबरी लगती आंखों में झांकते हुए, उस रात मुझे लगा कि एसपी गोली नहीं दे रहे थे। उन्हें आभास है कि कल दफ्तर के भीतर एमएमएस और बाहर डाइन के प्रकोप में खेलती गरीब औरतों का दयनीय उन्माद और उनके फटे ब्लाउज बिकने वाले हैं।

आज ही भाई दिलीप को बजरिए ई-मेल बताया कि ब्लाग बन गया। शाम को पोस्ट से ख्याल आया कि एसपी आज ही गए थे। सोचा था रात बारह से पहले लिख देना है क्या, पता किसी को इस का इंतजार हो. लेकिन देर हो ही गई।

बच्चा नींद में उन्मत्त रो रहा है, भूख भयानक लगी है, सुबह जल्दी उठ कर डाक्टर को आंख दिखानी है नहीं तो ससुरा इस हफ्ते फिर लटका देगा। एसपी पर संशोधित, सुचिंतित पोस्ट फिर कभी। खैर जाते समय क्या एसपी मुझ जैसी ही हड़बड़ी में नहीं गए होंगे।

देखिए तो कितने काम छूट गए जो शायद वह या वही कर सकते थे।

बरसो रे मेघा

दो दिन से झमाझम है। आज बादलों से घटाटोप आसमान को देखते एक कविता याद आई। कहीं पढ़ी या किसी से सुनी होगी।



नीली बिजली मेघों वाली

झींगुर, सांवर, सूनापन

हवा लहरियोंदार

घन घुमड़न भुजबंधन के उन्माद सी

बढ़ती आती रात तुम्हारी याद सी।



(बादल और बांहों का चमत्कृत कर देने वाला फ्यूजन है। जरा सोचिए बादल आपकी बांहों के भीतर अनियंत्रित लय में घुमड़ रहे हैं, आतुर हैं, उन्मत्त हैं। उसकी याद का आना जुगुनुओं की टिमटिम, झींगुरों के कोरस के बीच उमस भरी, आपके अस्तित्व को विलीन कर देने वाली अंधियारी रात का आना है। और यह सांवर क्या है, शायद बदली के मद्धिम प्रकाश का खांटी रंग है।)



पता नहीं किसकी कविता है। शायद छायावादी कवि होगा कोई। कवि का नाम गुम गया है, कविता कितनी बरसातों के बाद अब भी बादलों में घुमड़ रही है।

15 जून, 2008

देश की हवा

ब्लाग से ब्लाह, ब्लाह।

एक शाइस्ता किस्म के विधायक जी थे। यह बानबे था। उनके डेरे दारूलशफा के बड़े वाले हाल में दरी पर छह पत्रकार रहते थे। गरमी के दिनों देर रात, जब कभी विधायक जी अपने क्षेत्र से आते तो पाते कि अपने बर्थ-डे सूट में अंडरवीयर या पटरवाले जांघियों के संशोधन के साथ वे छह स्वपनों, आशंकाओं, अवसादों, उन्मादों, अखबारों, किताबों में लिपटे सोए मिलते और वे उनकी तरफ हाथ उठाकर बुदबुदाते- ....हं, हई देखिए ये पत्रकार लोग हैं।


डेरे में एक टूटा स्टंप था और गुरमा मारकुंडी कहीं से एक कंचा लहा लाए थे। देर रात गए उस गोली की गेंद और स्टंप के बल्ले से वे छह क्रिकेट भी खेलते थे। पीपुल फीिलडिंग में जान लगा देते थे और खुद को जोंटी रोडस से कम नहीं समझते थे। वे किसी काकटेल पार्टी में घुस पाते तो वहां से गुरमा के लिए भी दारू और खाना पैक कराकर ही आते थे। कभी-कभार आंगन की मोरी को बनियान से बंद कर घुटनों तक पानी भरने के बाद तैराकी का कंपटीशन भी हो लिया करता था।


श्री कंट- यह नाम उनके नैन्सी फ्राइडे के लिखे की त्वरित भौतिक प्रतिक्रिया देने वाले घनघोर पाठक होने के कारण मिला था। उन ने उस दिन विधायक जी की एक रोलदार कापी फाड़ी और कई पन्नों पर ब्लाह। ब्लाह। .आई एम ममाज ब्वाय- चमकीले पेन से लिखकर दीवारों पर चिपका दिया। और फकत एक चड्ढी में कैलिप्सो करने के बाद खुद बिछौने पर गुलाटी खाने लगे। फिर सबको एक एक टाफी दी अपनी एक कनपटी पर आंच वाले दिन कविता सुनाई। फिर रोने लगे और सुबकते-सुबकते सो गए। देर रात गुरमा लौटे तो बताया कि आज श्री कंट का जन्मदिन था किसी ने विश किया?


सबसे निरपेक्ष पगुराते, धर्नुजंघी टांगों वाले और इलस्ट्रेशन खींचने में माहिर कलाकार फकिंग गाय थे। जो हमेशा भोजन के चक्कर में रहते थे। सबकी आंख बचा कर वे दस रूपया भर पेट वाले होटल में रोटियां गिन ही रहे होते कि अचानक रेड पड़ती और उनके मुंह से बस इतना ही निकल पाता-नििश्चत ही मैं तुम सब को बुलाने वाला था। भाऊ कभी-कभार लोक संवेदना, लोकधर्मी पत्रकारिता वगैरा की बहस से पेट न भरने पर, सरकारी हीटर पर खिचड़ी पकाने बैठते थे। अभी वे चावल बीन ही रहे होते कि उनके खुजलाने की लयबद्ध प्रलयंकर अदा के कारण शुचिता बोध का विस्फोट हो जाता और बहस बौद्धिकता और मलिच्छपन के पेंच लड़ाने लगती थी।


एक बार नवरात्र में श्रीकंट और भाऊ ने पूजा भव्य बंधान बांधा। धूप, दशांग, गुग्गुलादि हवन सामग्री को शंकर भगवान के काफी हाउस के सामन खरीदे पोस्टर के सामने सजा कर दोनों नहाने गए। तभी हर हफ्ते नया हुलिया बनाने के शौकीन जखाकू असली नेपाली मिरचईया लेकर मिर्जापुर से प्रकट हुए और बताने लगे ट्रैक्टर चलाते-३ उनके चूतरों पर गट्ठे पड़ गए हैं और अब वे फिर जर्नलिज्म में एिक्टव होना चाहते हैं। काहे, तो दुर मरदे जौन भौकाल हेम्मे हौ और कत्तों मिली। हम पत्रकार ना निरल्लै किसान रहित त अबले रोवां-रोवां तहसील वाला लील्लाम कई देहले रहतैं।


बहरहाल इसी बीच किसी ने जखाकू का रेल टिकट किसी ने बैल की आंख पर चिपका दिया और स्केच पेन से शंकर भगवान की दाढ़ी बनाकर चूने से गोल नमाजी टोपी पहनाने का प्रयास कर डाला चुका था जिसमें जालियां भी कटी हुई थीं।


बिना सिले कपड़ों में पवित्र भाव से इष्टदेव को हृदय में स्थापित कर श्रीकंट और भाऊ जब हवन के लिए पहुंचे तो भाऊ के मुंह से निकला आहि माई कमनिस्टवा कुल इ का कई दिहलैं और कंट थोड़ी देर शून्य में निहारने के बाद वहीं धड़ाम से गिर कर बेहोश हो गए।



कल रात, बारिश में, एक रेखियाउठान लड़के को कमीज के सारे बटन खोले हुच्च--- बाइक पर उड़ते देखा तो उन सभी की और उनके पंखयुक्त सपनों की बेतरह याद आई। उसके पीठ में घुसकर, बाइक पर एक दुबली सी लड़की बैठी थी जो कह रही थी, हैन्सम नो, नो नाट दिस वे इसी सड़क पर तो मेरा घर है।

लड़के ने कहा, डैम इट लेट देम नो इट टू नाइट। या सिर्फ कहा हो योप्प....। लेकिन मैने कैसे सुना।

भाऊ बहुत दिन जनसत्ता की एक कटिंग लिए फिरते थे। जिसमें ग्वालियर में भाजपा किसी सम्मेलन की रपट थी। पढ़ते थे- आसमान में घना कुहरा था, कहीं कुहरे के भीतर जहाज डोल रहा था। अटल जी मन ही मन बुदबुदाए लैंड करना मुिश्कल होगा। फिर कहते थे- कहो हई अलोक तोमरवा मान ला जहजिए में बैठल रहे त, मन में क बुदबुदाइल कइसे सुन लिहलस।

त रउवा सभे कहां बानी आजकल और कहां तक पहुंचे। आजतक मैं आज तक नहीं जान पाया हूं कि बैल की आंख पर टिकट किसने चिपकाया था?



13 जून, 2008

sarnath की gajarwali

दिन, उस छोटी सी खबर और उससे भी ज्यादा साथ छपी फोटू ने गुदगुदाया। सारनाथ गई एक घुमक्क़ड़ विदेशी युवती ने सड़क की पटरी पर बैठी बुढ़िया से दो रूपए का गाजर खरीदा और स्कूली लड़कों जैसे खिलवाड़ भाव से बिना पैसा दिए जाने लगी। हो सकता है कि युवती को उसमें अपने बचपन की कोई रिगौनी आंटी नजर आ गई हो। लेकिन उस देहातिन को जैसे आग लग गई और वह दौड़कर उस युवती से जूझ गई। युवती को वाकई मजा आ गया, शायद एक गंवई हिन्दुस्तानिन से पहली बार अनायास वास्तविक संवाद स्थापित हो गया था। पुलिस के सिपाहियों और देसी लहकटों को वह रोज झेलती होगी लेकिन उसे बर्दाश्त नहीं था कि कोई ललमुंही विदेशिन उसे उल्लू बनाकर दांताखिलखिल करती हुई चली जाए।इसी बीच गाजर भारत-यूरोप के बीच पुल बन चुका था।फोटू में खड़े युवती के साथी का चेहरा कुछ ऐसा प्रफुल्ल था, जैसे सारनाथ के परदे पर कोई ओरियंटल फिल्म देख रहा हो। उसके आराम से खड़े होने के पीछे का आत्मविश्वास रहा होगा कि वह बुढिया, बैलेंस डाइट पर पली, दिन भर उसके साथ पैदल भारत नापने वाली उसकी छरहरी साथिन का क्या बिगाड़ पाएगी? बाई द वे यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि इस युगल को यह घटना जिंदगी भर याद रहेगी। इसमें हाऊ डू यू फील अबाउट बेनारस जैसी रस्मी बोरियत नहीं थी। तंत्र, मंत्र, योगा और होली गंगा का फंदा नहीं था। इसमें खांटी भारतपन था जिसे वे अपने देश जाकर लोगों को बताएंगे।तो अखबार में छपी फोटू में परमआधुनिक यूरोप के साथ एक भारतीय देहातिन भिड़ी हुई थी।कल्पना में न समाने वाला यह पैराडाक्स लोगों को गुदगुदा रहा था। लेकिन गाजर वाली के लिए यह झूमाझटकी कोई खिलवाड़ नहीं थी। ललमुंही विदेशिन के लिए दो रूपए का मतलब कुछ सेंट या पेंस होगा लेकिन गाजरवाली के लिए इसका मतलब है। कुप्पी में डाले गए दो रूपए के तेल से कई रात घर में रोशनी रहती है।दस-बीस के सिक्के चलन से बाहर हो गए हैं फिर भी गाजर का कुछ सेंटीमीटर का पुल पारकर आप उन लोगों की अर्थव्यवस्था में झांक सकते हैं जो हमारे बहुत करीब रहते हुए भी आमतौर पर हमें नजर नहीं आते। मिर्जापुर, सोनभद्र से लाकर महुए के पत्तों के बंडल पान की दुकानों पर बेचने वाले मुसहरों को पत्ता पीछे एक पैसे की आमदनी होती है। रेलवे स्टेशन पर नीम की दातुन बेचने वालों को एक छरका एक रूपए में पड़ता है और वे एक चार टुकड़े कर के आठ-आठ आने में बेचते हैं। चने का होरहा या मौसमी तरकारियां बेचने वालों को देर रात तक सड़कों पर ऐसे ग्राहकों का इंतजार रहता है जो दो रूपया कम ही देकर उनकी परात या खंचिया खाली कर दें। लोग चिप्स का पैकेट बिना दाम पूछे खरीद लेते हैं लेकिन उनसे इस अंदाज में मोल भाव करते हैं जैसे वे उन्हें ठगने के लिए ही आधीरात को सड़क पर घात लगाकर बैठे हों।चूरन, चनामुरमुरा, गुब्बारे, फिरकी और प्लािस्टक के फूल बेचने वाले दस बीस रूपए की आमदनी के लिए सारा दिन गलियों में पैदल चलते रहते हैं। बनारस में अब भी पियरवा मिट्टी के ढेले बिकते हैं, जिन्हें शहनाज हुसैन सबसे बेहतरीन हेयर कंडीशनर बताती हैं। इन्हें बेचने-खरीदने वाले दोनों के लिए दो रूपया रकम है।अभी मार्च के आखिरी हफ्ते में आयकर-रिटर्न भरने में सारा देश पसीना-पसीना हो रहा था। तरह-तरह के खानों वाले ठस सरकारी कागजों का अंबार था और कर विशेषग्यों की चौर्य-कला से विकसित देसी तिकड़में थी। जो चख-चख थी उसका सार यह था कि सरकार बड़ा अत्याचार कर रही है, यदि कोई ईमानदारी से इनकम-टैक्स भर तो भूखों मरेगा और उसके बच्चे भीख मांगेगे। लिहाजा बीमा के प्रीमियम, धर्माथ चंदे और मकान किराए की फर्जी रसीदों, एनएससी वगैरा के जुगाड़ं फिट किए गए ताकि अपना पैसा अपने पास रहे। .यहां कुछ हजार का सवाल था और सारनाथ की गाजरवाली के सामने अदद दो रुपयों का। क्या अब भी ललमुंही विदेशिन से गुत्थमगुत्था बुढ़िया पर अब भी हंसा जा सकता है। अगर आयकर विभाग को झांसा देकर कुछ हजार बचा लेने वाले बाबुओं और सड़क किनारे बैठी बुढ़िया के बीच खरीद-बेच के अलावा कोई और रिश्ता बचा हुआ है तो नहीं हंसा जाएगा।वाकई, क्या ऐसा कोई रिश्ता है?