सफरनामा

15 अक्तूबर, 2008

आपका दिल हमारे पास है


इ. इ. कुमिन्ग (1864-1962)
नेट पर सबसे अधिक कौन कवि इधर पढ़ा गया. इस मटरगश्ती में ये सज्जन मिले. नाम है इ. इ. कुमिंग, अमेरिका के रहने वाले. ज्यादा परिचय का कोई खास मतलब नही है. सूरत कितनी जानी-पहचानी जैसे मेरे गांव के किसी आदमी को अंगरखे की जगह शर्ट पहना दी गई हो. खैर यह झूठ है वहां अब कोई टेलर मास्टर अंगरखा सिलता भी नहीं. असल चीज तो इनकी कविता है जो जीवन को वैसे पकड़ने की कोशिश करती है जैसा कि वह होता है. बिना चेतावनी दिए, बिना भाषा की मदद लिए या बिना अपने होने का पता दिए. अपने ही फार्म की निराली यह कविता पढ़िए। शीर्षक और अनुवाद मेरा। बाकी कुमिंग साहब का।

आपका दिल हमारे पास है
तुम्हारा दिल साथ लिए फिरता हूं ( मैं इसे अपने दिल में लिए रहता हूं ) बिना इसके कभी नहीं होता हूं
( कहीं जाऊं तुम जाते हो, और मुझसे जो भी हुआ तुम्हारा किया हुआ है, मेरी जान ) मुझे डर नहीं किस्मत का ( मेरी किस्मत तुम जो हो, प्रिये ) नहीं चाहिए मुझे दुनिया ( क्योंकि सुंदरी तुम दुनिया हो मेरी, असल मेरी ) और यह तुम हो जो भी हमेशा एक चांद होने का मतलब होता है और जो भी एक सूरज सदा गाएगा, तुम हो यहां है गहनतम रहस्य जिसे कोई नहीं जानता ( यह उस पेड़ के जड़ की जड़ है और कली की कली और आसमानों का आसमान जिसे जीवन कहा जाता है, जो बढ़ता जाता है आत्मा की संभवतम आशा या मन के रहस्यों से भी ऊंचा ) और यही वो अचरज है जो सितारों को अलग-अलग किए हुए है मैं तुम्हारा दिल साथ लिए फिरता हू ( अपने दिल में ही तो लिए रहता हूं )

4 टिप्‍पणियां:

  1. कमिंग्स मेरे बहुत प्यारे कवि हैं कॉलेज के ज़माने से. उनकी ख़ास बात यह थी कि उन्होंने अपनी किसी कविता के किसी भी वाक्य में एक बार भी कैपिटल लैटर्स का प्रयोग नहीं किया. यह उनकी सनक थी. पर कवि बहुत धारदार थे. उनकी कुछ बेहद सनसनीख़ेज़ प्रेम कविताएं दुनिया भर में तहलका मचाती रहीं. साहित्य के दिग्ग्ज उनसे ख़ौफ़ खाते थे और उन्हें वह सम्मान नहीं मिला जिसके वह पात्र थे.

    आपको धन्यवाद साब! अच्छा अनुवाद ऑफ़ कोर्स!

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  2. हां गजब आदमी है यार। निसंग, तटस्थ और अनौपचारिक। इतनी बड़ी बात उसकी विरोधी लगती बात की निरंतरता में कहता जाता है। शायद इसके पीछे यह सोच हो कि जब जीवन में कोई जोड़ या अलगाव नजर नहीं आता तो मेरी कविता मे क्यों आए।

    वह भी तो जीवन का ही एक्सटेन्शन है।

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  3. पहली बार पढ़ा। नाम शायद गलत लिख गया। जिन्हें खटके, उनसे कहता हूं खेद है। वरना हिंडू, गान्डी, नैरू सुनने का अभ्यास तो है ही।

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  4. यार मत पढ़वाअो इस तरह कविताएं। कबाड़खाने पर अशोक जी ने स्वेतायेवा और अख्मातोवा की कविताएं पढ़वाई थीं। फिर कुछ अपनी आलमारी से निकाल कर पढ़ लीं। इस तरह की कविताएं मुझे उदास करती हैं। अवसाद में ले जाती हैं। फिर इससे उबरना थोड़ा मुश्किल होता है। पर क्या करूं, इन्हें पढ़े बगैर भी चैन नहीं मिलता।

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