सफरनामा

14 अक्तूबर, 2008

जो शिकस्तः हो तो अज़ीज़तर

न बचा-बचा के तू चल इसे, तिरा आईना है वो आईना
जो शिकस्तः हो तो अज़ीज़तर, है निगाह-ए-आईनासाज़ में

... यह त्वरित प्रक्रिया मेरी पहली पोस्ट समझी जाय इस ब्लॉग पर. यहां पिछली दो पोस्टों का लिखा पढ़ने के बाद से ये शेर बस घुमड़ रहा था.

बाक़ी यूं है के:


आगे आते नहीं किसू की आंखों में
हो के आशिक़ बहुत हकीर हुए

अब जो मन में आएगा, यहीं आएगा!

दुर्गा दादा का गढ़वाल क़िस्सा आगे न चला पाने की जादों साब की हर अपील को ख़ारिज किया जाता है. सो अलग. इसी माह इसकी असल वाली सर्रीयल और असल किस्तें न आने पर सज़ा-ए-मौत का फ़रमान भी इस बिलाग को.

3 टिप्‍पणियां:

  1. आगा़ज़ इस अंदाज़ में हुआ है तो सफ़र अच्छा कटेगा ....

    "हर किसू से फ़रो नहीं आता
    हैफ़, बन्दे हुए ख़ुदा न हुए"

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  2. ताब लाये ही बनेगी ग़ालिब
    वाकया सख्त है और जान अजीज

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  3. लप्पूझन्ना को atkakar एक जगह खडा कर देने वाला कैसे किसी को मौत का फरमान दे सकता है..अब ये मत कह dena `मुझे भी मृत्युदंड मिले`

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