सफरनामा

17 सितंबर, 2008

यात्रा की यात्रा का विज्ञापन


सैर कर दुनिया की गाफिल जिन्दगानी फिर कहां।
जिन्दगानी गर रही तो यो नौजवानी फिर कहां।।

9 टिप्‍पणियां:

  1. रौ में है रख्शे-उम्र कहां देखिए थमे,
    न बाग हाथ में है न पा है रकाब में.

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  2. प्रमाद त्यागें बाजा बाबू! जल्दी अगली किस्त लिखें. बिग्यापन से बरगलाना - बन्द करो, बन्द करो!

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  3. करेजा ठंडा भा, जी जुड़ान,... नारा लगाय रहै हैं असोक....अब तो लिखि डारो, नाही तो लागी कि दुरगा मिसिर हौंक दिहिन कि आगे लिखिहौ तौ मारब...अमां लिखो यार जल्दी..जल्दी..

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