सफरनामा

30 जून, 2008

डिब्बे से एकालाप

जो भी थोड़ी सी कंप्यूटरबाजी जानता है ब्लागर हो सकता है। यह अपने अमरूद का गुआवा होना है। वही हैं...हैं वही हाय-हाय वही हौं-हौं...। नया कुछ नहीं। वही मिडिल क्लास दंतचियरपन और पानमसाले और रात में ब्रश करने की आदत न पड़ पाने से पीले दांत दिखाना। वही खीरा खाने के बजाय आंख पर रख कर सोना। अहो- अहो और अबे तू के बीच झूलती छोटी सी बैल के अंडकोष के बराबर की लेकिन रक्ताभ, आभासी दुनिया। सोचते हैं कंप्यूटर का डब्बा कीर्ति देगा। एक गब्बर भी है भीतर जो अंत में पूछता है कितने आदमी थे? क्या लाए हो ज्वार? सोचा था सरदार शाबासी देगा। वहीं अपना ये भी है बजाज चेतक पर बैठा मूंगफली से बतियाता हुआ। कहां है सब सांबा, पाम्बा, बाम्बा। सफोला से पेट पर बने टायर स्वेटर में छिपाए, मफलर की छांव में कोलेस्ट्राल पाउच संभाले, झूलते गालों से पूछता हुआ और वो गब्बर कहां है? कहां गए सब अयं। किस सहारा के सहारे?

कंप्यूटर मुनाफा देता है। आढ़तियों को। यह कला आजकल डिब्बा ट्रेडिंग के नाम से जानी जाती है। न माल कहीं आता है न जाता है (ये सब करिश्माए तसव्वुर है शकील वरना आता है न जाता है कोई के अंदाज में) आनलाइन बुक जरूर होता है। जानने वाले जानते हैं कि मंहगाई बढ़ने के स्थायी कारणों में यह प्रमुख है। ब्लागिंग ख्यालों की डब्बा ट्रेडिंग है।

यह मास्टर काहे का अखबारों में इतना भौकाल बनाता है। अभिषेक कहता है जेब में बीस- चालीस पोस्टकार्ड रखा जाए और हर दिन एक पोस्ट कर दिया जाए जिन पर लिखा हो- सर जी, आज कई अखबार और पत्रिकाएं देख डालीं आप और उत्तिमा केशरी, पूर्णिया नहीं दिखाई दिए। प्लीज जहां कहीं भी हों, जिस भी हाल में हों, कुछ लिख-विख दीजिए न। अब लगता है कि यह मास्टर दरअसल इंटलेक्चुंअल गुंडा है जो हिंदी के गरीब किंतु परिस्थितजन्य कमीने लेखकों को उनकी जान में उड़नतश्तरी सी रहस्यमय किंतु भीम चीजों ब्लागिंग, गीगाबाइट, देरिदा, टेक्सट, उत्तरआधुनिकता, विखंडनवाद, यंगिस्तान वगैरा का डर दिखाकर अखबारों से हर हफ्ते साढ़े आठ सौ लेकर डेढ़ हजार तक खींचता रहता है। खैंच कर एतना सेफ हो गया है कि चश्मे में डोरी लगवा ली है कि कमानी टूट जाए तो भी सेफ रहेगा यानि निर्भरता के एकाधिक उपादान लहा चुका है। वे बेचारे पत्नी-बच्चों को कंट्रीमेड गन प्वाइंट पर खामोश कर अब भी साली-सलहज की दांताकिल-किल लिखे जा रहे हैं। अंदर ब्लगारी हुंकार भरी है आबे, पहचान। दो हंसों का जोड़ा छाप बीड़ी बेचने वाला आगरे का पप्पू आई विल क्राई टूमारो वाली लिलियन रूथ का हवाला देकर कहता है कि अमां रेवरेंड मदर उर्फ अम्मीजान चुप भी रहा करो, स्त्रीमर्श चल रहा है। ये दोनों बस आभासी नेता है बाकी असली जनता उर्फ प्रवृत्ति की जमात काफी बड़ी है।

अमां यही होना था ब्लागिंग में। वही चिरकुटपन। आज मैने सपने में हर्षद मेहता और धीरूभाई अंबानी दोनों को चिंदबरम को कंपट देकर, छोटा भाई कह कर इमोसनली ब्लैकमेल करते जब उसने छोटा होना मान लिया तो धौंसिया कर चुप कराते देखा। साथ में एक उपेक्षित एक छोटा सा काला, कुपोषित, नंगा, उत्पाती बच्चा था जो कहता था कि एक हफ्ता बहुत होता है बेटा- अब ब्लागिंग से नमस्ते करने का समय आ गया है। कट लो। करना क्या है आते समय दस-बारह दबाए थे जाते समय बेसिक में घुस कर बस एक डि्लीटटटटटटटटटटट वाला दाबना है और क्या? उस समय कोई शब्दपुष्टिकरण टाइप के बेहुदा सवाल पूछे तो हमसे कहना।

ऐसी दुनिया है यह जहां लोगों को उनकी पोस्टवैल्यू, फेसवैल्यू को ही स्वीकारना पड़ता है। उसी के हिसाब से रिस्पांस करना पड़ता है। अंत में तैलचित्र में प्रदर्शित समुद्र में तैरता हुआ हिमालय से भी ऊंचा आभासी पहाड़ खड़ा हो जाता है। यहां आंख का झपकाना, हकलाना, पसीना या कंपन नहीं देखे जा सकते। इस कला में हम पहले ही कम माहिर थे? त्याग और दान की नैतिकता पेलते हुए घूस बटोरने वाले, देवी को पूजते हुए बीवियों को कूटने वाले, बच्चों को भगवान मानते हुए ग्रेड के लिए उन्हें रेत कर शुतुरमुर्ग बनाने वाले, हर असुविधा के लिए सरकार को कोसते हुए अपराधमुक्त हो जाने वाले, कमजोरकोचांपने और दबंग के आगे हें-हें करने वाले। हम उन्हीं की तो संताने हैं। ब्लागों के इस कदर अमूर्त, सहमतिपरक और व्यक्तिगत होते जाने के कारण आनुवांशिक हैं। कोई एन्थ्रोपोलाजिस्ट अगर ब्लागर नहीं है तो चकित हो सकता है कि यह कला तो हमने सतयुग से साध रखी है उसके लिए ब्लाग की क्या आवश्यकता थी।

सबसे अच्छे ब्लाग वे होते हैं जिनमें कहा कम समझा ज्यादा जाता है।

जैसे कबाड़खाना, अंर्तध्वनि, मीत, रेडियो आदि। जैसे आज ही छाप-तिलक में यह क्यों कहा कि बात अधम कह दीनी रे नैना मिलाय के। वह भगवान और भक्तिन के बीच कौन सी बात थी जो अधम थी। क्या भगवान ने भी ब्लाग के जरिये कहा जिसे कोठारिन जी समझ नहीं पाईं और उनका आंचल मैला होते-होते रह गया।

7 टिप्‍पणियां:

  1. सही धुन है. ओहो. पीछे-पीछे अहा भी.

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  2. मुझे टिप्पणी शब्द नज़र नहीं आया सो आपके सी बॉक्स पर लिख गया.यहाँ दोहरा देता हूँ.

    हारमोनियम पर पहली बार आया.
    मराठी के यशस्वी गायक अरूण दाते के
    भावगीत मुखड़ा है....
    काही बोलायच आये
    पण मी बोळणार नाही.

    यानी कुछ बोलना तो है पर मैं बोलूंगा नहीं
    कैसे बोलूं..बोलती ही बंद हो गई है.
    लगता है आज से ब्लॉग लिखना बंद कर दूँ
    सिर्फ़ आप जैसे समर्थ लेखकों को पढ़ता रहूँ.

    टीप:कबाड़खाना से ये सुरीला मोती मिला.धन्यवाद अशोकभाई...आपकी पाती के लिये.

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  3. e sala blog ka frog aaj kal bahut fudak raha hai....jidhar dekho udhar ek bhadasi...aab bhadas ka kya hai...hai to hai....kya kare...koi sunane wala bhi to nahi...saheb log sunte nahi..saathi sawan ke bheege kukkre ke nai katne daudate hai....kare to kare kya...yahi dibba hai...saheb logon ko peet nahi sakte....bibi ko peetne mein khatra hai....naari "power" ka zamana hai...bigad gayi to kum se kum saat saal jail ki sewa...ab ek yahi dibba bacha hai....jitna chance utna peeto...kum se kum awaz to nahi karta....had se had kya hoga.....file corrupt ho gayegi...arey ee to apne haat mein hai...na jane kitni hui or kitni nai bani koi ginti hai...kul mila ke ajab zamana hai...chotte the to suna tha kalyug mein gadha ghoda eek saath honge.....bade ho gaye to dekh bhi rahe hai.....bura mat maniyega...yeh bhi bhadas ka hi ek hissa hai...kya kare badi aajeb si halat hai....jaise koi bina daanton ka aadmi kitkitata hai...bas ek dum waisi hi....aant mein ek baat aur......hindi mein haanth kuch kamjor hai....roman mein likh rahe hi.....samajh mein na aye to jyada gaaur karne ki zaroorat nahi hai.......ekalap mein yeh sab to chalta hai.....jai bheem

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  4. हारमोनियम तो हमें खूब पसंद है और यहां भी मधुर ही बज रहा है ।
    सबको ऐसा ही सुनाई दे रहा है क्या :)

    अनिल भाई,
    बढ़िया ब्लाग,
    बढ़िया शुरुआत,
    अच्छी संगत ।
    आप कहां थे
    अब तक ?

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