सफरनामा

05 अक्तूबर, 2009

विदर्भ के किसानों की शहादत और वोटतंत्र

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के सिलसिले में विदर्भ में मौजूद आईबीएन7 के वरिष्ठ संवाददाता नीरज गुप्ता ने बताया है कि किसानों की खुदकुशी चुनाव में कोई मुद्दा नहीं है। चुनाव उन्हीं सारे छल-छंद में रंगा है जो भारतीय लोकतंत्र की खासियत माने जाते हैं। यानी खेती के मोर्चो पर खेत रहे किसानों का भूत नेताओं की नींद खराब नहीं कर रहा है। यूं भी, हमारे नेताओं को असल मुद्दों को दफनाने में महारत हासिल है। जनता की बेजारी ने उनका काम आसान कर दिया है, जो फिलहाल छोटे पर्दे में विराजतीं सास-बहुओं के चिंताकुल चेहरों का जायजा लेने में मुब्तला है और जब फुर्सत मिलती भी है तो कभी राजू श्रीवास्तव का गब्बर छेक लेता है, तो कभी राखी की स्वयंवरित परेशानियां।

पता नहीं, दुनिया का कौन सा ऐसा महाबली देश (आजकल भारत को महाशक्ति कहने का फैशन है) होगा जहां हजारों किसानों की खुदकुशी से राज और समाज इस तरह बेजार रह सकता है। वैसे, इसका आभास तो महीने भर पहले मुझे भी मिला था जब मैं विदर्भ का हाल देखने पहुंचा था। यवतमाल जिले में तुकाराम राठौड़ से हुई मुलाकात याद आ रही है। बोथबोड़न गांव के तुकाराम ने अगर अब तक खुदकुशी नहीं की है तो इसका श्रेय उनकी दारूबाजी को है। विदर्भ का ये जिला किसानों की खुदकुशी के लिए बदनाम है, और जिला मुख्यालय से बमुश्किल 20 किलोमीटर दूर बोथबोड़न गांव खुदकुशी के मामले में अव्वल। यहां 17 किसान खुदकुशी कर चुके हैं। कर्ज में डूबे तुकाराम जब देशी ठर्रे के दो-चार घूंट हलक से नीचे उतार लेते हैं तो कुछ घंटों के लिए उनके सारे दुख दूर हो जाते हैं। यवतमाल, वर्धा जिला से सटा हुआ है। वही वर्धा, जहां गांधी जी ने सेवाग्राम की स्थापना की थी और जो जीवन के आखिरी 12 सालों में उनका स्थायी पता था। लेकिन वर्धा समेत पूरे विदर्भ में शराब को लेकर वही रुख है जो राष्ट्रीय स्तर पर गांधी जी के ग्राम स्वराज को लेकर है।

तुकाराम की कहानी विदर्भ में खदबदा रही मौत की हांडी के एक चावल की तरह है। कुछ साल पहले तक उनके पास 26 एकड़ जमीन थी। पर अब वे साहूकार के हाथ अपनी 13 एकड़ जमीन गंवा चुके हैं। उन्होंने कुछ साल पहले खेती की जरूरतों को पूरा करने के लिए कर्ज लिया था जिसे वे उतार नहीं सके। शर्तनामे के मुताबिक मियाद बीतते ही उनकी जमीन पर साहूकार के गुंडे काबिज करने पहुंच गए। देखते-देखते अपनी हैसियत में आई ऐसी गिरावट को बरदाश्त नहीं कर पा रहे तुकाराम के दिमाग में कई बार खुदकुशी का ख्याल आया। लेकिन उन्होने कीटनाशक की जगह ठर्रे की बोतल को ओंठ से लगा लिया। अब वे रोजाना बहकते कदमों से पूरे गांव में चक्कर लगाते रहते हैं। साहूकार और सरकार के लिए उनके मुंह से मुसलसल गालियां झड़ती हैं जिसे लोग शराबी की बड़बड़ाट कहकर टाल देते हैं।


कहते हैं कि विदर्भ कृष्ण की पटरानी रुक्मिणी का मायका है और कालिदास के मेघदूत पर भरोसा करें तो यक्षों और गंधर्वों का निवास स्थान। लेकिन कभी धन-धान्य से भरपूर विदर्भ की हवा में श्मशान की गंध भरी हुई है। आंकड़े बताते हैं कि बीते आठ सालों में विदर्भ के छह जिलों में करीब छह हजार किसानों ने खुदकुशी की है। वजह है कर्ज। प्रेमचंद के किस्सों में आजादी के पहले के किसानों के मजदूर बनने का जो दर्द मिलता है, वो विदर्भ में छितराया पड़ा है। तुकाराम के पास 26 एकड़ जमीन थी। उत्तर भारत में इतनी जमीन वाले को जमींदार कहा जाता है। लेकिन विदर्भ में इसका कोई खास मतलब नहीं। मिट्टी में उपजाऊ पन कम है। सिंचाई की सुविधा सिर्फ तीन फीसदी इलाके में है। बारिश के पानी के मोहताज किसानों ने जितना हो सकता था, डीजल इंजनों से धरती के अंदर जमा जल निकाल लिया है। फिर भी ले-देकर खरीफ की ही फसल हो पाती है। लेकिन ज्यादा मुश्किल तब से बढ़ी है जब से लोग महंगी खेती के चक्कर में फंसे हैं। खासतौर पर बीटी काटन की खेती ने उन्हें कर्ज के दुश्चक्र में डाला है।

विदर्भ में कपास की खेती सदियों से होती रही है। लेकिन कुछ सालों से यहां बीटी काटन का प्रचार हुआ है। कहा गया कि जैव तकनीक से विकसित बीजों से पैदा हुई कपास में कीड़े नहीं लगेंगे और पैदावार भी ज्यादा होगी। शुरू में ऐसा होता दिखा भी। लेकिन किसान पारंपरिक बीजों से हाथ धो बैठे। हर बार कंपनी का बीज उन्हें लेना पड़ता है। एक एकड़ में डेढ़ किलो बीज लगता है जिसकी कीमत 1500 रुपये है। इसके अलावा तीन बोरी रासायनिक खाद लगती है जिसकी कीमत होती है 1650 रुपये। बीज डालने से लेकर घास निकालने तक में खर्च होते हैं 6000 रुपये। कीटनाशकों पर 750 रुपये का खर्च आता है और कपास चुनने में करीब 2000 रुपये खर्च होते हैं। यानी एक एकड़ में लागत पड़ जाती है 11850 रुपये। इसमें सिंचाई का खर्च शामिल नहीं है। यानी औसतन 12000 रुपये प्रति एकड़ का खर्च आ रहा है। और अच्छे किस्म के कपास का न्यूनतम समर्थन मूल्य है 3000 रुपये प्रति क्विंटल। यानी चार क्विंटल पैदावार हो तो किसान की लागत निकलेगी। पर दिक्कत ये है कि लागत बढ़ती जा रही है और सरकारी खरीद की जगह बिचौलिये ज्यादा सक्रिय हैं। उधर सूखे की मार से फसल अक्सर खराब हो जाती है। लागत बढ़ रही है और पैदावार साल दर साल घट रही है। नतीजा बार-बार नुकसान।


विदर्भ के किसानों से मिलकर यही लगा कि उनकी जिंदगी ही कर्ज है। हर अगली फसल के लिए कर्ज लेने को मजबूर। शादी-विवाह या त्योहारों के लिए भी वो कर्ज पर निर्भर हैं। और जब बैंक या साहूकार का दबाव बढ़ता है तो वे चुपचाप कीटनाशक पीकर जिल्लत की जिंदगी से विदा ले लेते हैं। दिलचस्प बात ये है कि सरकार बीच-बीच में कर्जमाफी की जो लोकलुभावन घोषणा करती है, उसका कोई खास लाभ किसानों को नहीं मिलता। कई बार उन्हें पिछला कर्ज चुकाने पर माफी मिलती है तो कई बार दो एकड़ खेती वाले किसानों को ही ये सुविधा मिलती है। जबकि खराब जमीन की वजह से न्यूनतम पांच एकड़ खेती होना आम बात है।


वैसे, अगर बिजली पानी सड़क को ही विकास का पैमाना माना जाए तो विदर्भ का दुख समझना मुश्किल है। उत्तर भारत की तुलना में वहां के गांवों में पीने के पानी के लिए टंकियों की बेहतर व्यवस्था है। सड़कों और पक्की गलियों का जाल है और बिजली भी तुलनात्मक रूप से ज्यादा मिलती है। लेकिन कर्ज में डूबे किसानों का आत्मविश्वास टूट चुका है। दूसरी तरफ किसी भी राजनीतिक दल की चिंता में ये मसला नहीं रह गया है। विदर्भ जनांदोलन समिति जैसे कुछ संगठन जरूर ये मुद्दा उठाते रहते हैं लेकिन हाशिये का ये हस्तक्षेप बड़ा स्वरूप ग्रहण नहीं कर पा रहा है। कभी-कभी तो लगता है कि विदर्भ के किसान खुदकुशी नहीं कर रहे हैं, शहादत दे रहे हैं। वे जान देकर हमें चेताना चाहते हैं कि देश को खेती और किसानों के बारे में नए सिरे से सोचना होगा। वे विकास के मौजूदा मॉडल पर बलि होकर देश की नाभिस्थल कहे जाने वाले विदर्भ में जीवन जल के सूखने की मुनादी कर रहे हैं।


लेकिन ये मुनादी मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था सुनने को तैयार नहीं। विकास के सारे हो हल्ले के बीच किसानों का दर्द गायब है। ये विकास की नई परिभाषा है जो देश की बहुसंख्यक जनता को नहीं, 10-15 फीसदी उपभोक्ता वर्ग को ध्यान में रखकर गढ़ी गई है। विदर्भ में फैली चितागंध पर इत्र छिड़कर एक बार फिर मंच सजा दिया गया है। माइक-माला, खान-पान-गुणगान, सब जारी है। इस उत्सव को देखकर सर्वेश्वर बार-बार याद आते हैं, जिन्होंने कभी लिखा था-



अगर तुम्हारे घर के एक कमरे में लाश पड़ी हो,

तो क्या तुम दूसरे कमरे में सो सकते हो..

अगर हां !...

तो मुझे तुमसे कुछ नहीं कहना....।

4 टिप्‍पणियां:

  1. अभी कुछ ही दिनों पहले मेरे अपने शहर वर्धा में लंगोटिया यारों, जो मुझसे ज्यादा ग्रासरूट के करीब हैं, से हुई बहस का लब्बोलुआब यह निकला कि हर अमीर अपनी काबिलियत से अमीर है और 'वाइस वर्सा'. पूँजी बाज़ार के इंद्रजाल से उपजे इस सरलीकृत ज्ञान से मैं पहली बार काँप सा गया.
    नौकरीपेशा वर्ग बड़ी बेशर्मी के साथ किसानों की बदहाली के लिए उनकी अपनी काहिली को जिम्मेदार ठहराता है. याद होगा कि अभी-अभी एक मुख्यमंत्री ने यही बात बड़े 'कोल्ड-ब्लडेड' अंदाज़ में बयां की थी. मेरे बचपन में शरद जोशी की शेतकरी संघटना का विदर्भ में बड़ा ज़ोर था. 'भीक नको, हवे घामाचे दाम' अर्थात 'भीख नहीं, पसीने की कीमत चाहिए' के उनके नारे से दीवारें भरी होती थीं. पर यह संगठन भी जोशी जी के उजबक तरीकों और मनमाने फैसलों से, जिसमें भाजपा-शिवसेना से हाथ मिलाना शामिल है, अपना प्रभाव पूरी तरह खो चुका है. वैसे जोशी जी की 'स्वतंत्र भारत पार्टी' का ना-उम्मीदवार इस बार भी वर्धा विधानसभा क्षेत्र से मैदान में है.

    पुनश्च: अगली बार विदर्भ का दौरा हो तो बताइयेगा, मैं अपने घर का पता दे दूंगा. आप मेरे घर हो आयें तो अच्छा लगेगा!

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  2. अगर तुम्हारे घर के एक कमरे में लाश पड़ी हो,

    तो क्या तुम दूसरे कमरे में सो सकते हो..

    अगर हां !...

    तो मुझे तुमसे कुछ नहीं कहना....। ....logon ne sharminda hona chhod diya hai. ve kuchh sunna nahi chahte

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  3. आत्मकेंद्रित होना हमारे समय का प्रमुख लक्षण है। पता नहीं क्यों सफलता के नुस्खे बताने वाली किसी किताब में अब तक साफ क्यों नहीं लिखा गया कि सफल होने के लिए लाशों को लांघने का अभ्यास करें।

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  4. lekin ghuma-phirakar yahi kaha jata hai aur safal log yahi to karte rahte hain

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