सफरनामा

24 अक्तूबर, 2010

मच्छर-संगीत की स्वरलिपि

एक आदमी के मन में कितनी इच्छाएं होती हैं, शायद इसे कभी जान लिया जाएगा लेकिन इस रहस्य से कभी पर्दा नहीं उठ सकेगा कि दिल्ली, लखनऊ समेत देश में डेंगू से अब तक कितने मनुष्य मर चुके हैं। सरकारी, गैरसरकारी विशेषज्ञों से अब तक इतना पता चल पाया है कि डेंगू एक खास तरह के मच्छर के काटने से होने वाली बीमारी है जिससे बच कर रहना चाहिए। हम सब अपने अनुभव से जानते हैं कि मच्छर काटने से पहले गाना गाते हैं। इस गाने की महीन धुन में एक महान चुनौती है, एक हुंकार है। वे पूछते हैं कि आपने कई परमाणु परीक्षण कर दुनिया को बता दिया कि एटम बम बना सकते हैं, आपके डाक्टरों की दुनिया भर में साख है और अब दुनिया के नक्शे पर आर्थिक सुपर पॉवर बनने जा रहे हैं लेकिन आप हमारा बाल-बांका क्यों नहीं कर पाए? यह गाना और गंभीर इसलिए हो जाता है क्योंकि इसे ऐसा कीट गा रहा है जिसने दुनिया में किसी भी जानवर की तुलना में सबसे ज्यादा मनुष्यों को मौत की नींद सुलाया है।

मच्छरों पर दुनिया भर में घूम कर शोध करने में जिन्दगी लगा देने वाले हावर्ड विश्विद्यालय के प्रोफेसर एन्ड्रयू स्पीलमैन और पुलित्जर विजेता पत्रकार माइकेल डी. एन्तोनियो ने एक अद्भुत किताब लिखी है। इस किताब, “मस्कीटोः ए नेचुरल हिस्ट्री आफ अवर मोस्ट परसिस्टेन्ट एंड डेडली फो” में स्पीलमैन तथ्यात्मक ढंग से बताते हैं कि ये मच्छर ही थे जिन्होंने सिकन्दर और चंगेज खां की सेनाओं को हरा दिया था और उनके विश्वविजेता बनने के सपने धरे रह गए। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय डीडीटी (डाइक्लोरो डाइफिनाइल ट्राइक्लोरो ईथेन) आने के बाद वैज्ञानिकों ने मान लिया था कि मच्छर खत्म हो गए लेकिन यह भ्रम था। वे ज्यादा ढीठ होकर नए क्षेत्रों में फैलते गए और आज भी सारी दुनिया में नरसंहार का गाना गाते मंडरा रहे हैं।

लेकिन ये वैज्ञानिक हमारी हिन्दी पट्टी के मच्छरों को नहीं जानते। पौन इंच से भी छोटे आकार के इन मच्छरों ने सरकारों, दवाओं और आदमियों का स्वभाव बदल डाला और उनसे अभयदान पा लिया है। ढाई-तीन दशक पहले जब न तकनीक थी न इतने संसाधन गांवों की दीवारों पर स्वास्थ्य विभाग के कारिन्दे सफाई रखने और कुनैन की गोली खाने की सलाहें लिख रहे थे, बच्चों की जांच के लिए स्कूलों में खून की स्लाइडें बन रही थीं और छोटे कस्बों में दवाओं का छिड़काव हो रहा था। आम लोगों को लगता था कि सरकार को उनकी जान की फिक्र है और मलेरिया बस थोड़े दिनों का मेहमान है। जब से
शेयर बाजार के रास्ते देश को सुपर पावर बनाने का रायता फैलना शुरू हुआ, सबकुछ बदल गया। मच्छर तो वही रहे लेकिन वह आदमी बदल गया जो मलेरिया, डेंगू और कालाजार से लड़ने चला था। वह खुद मच्छर हो गया और सरकारी परियोजनाओं से रकम चूसने लगा। उम्मीद की जगह हताशा ने ली और आम आदमी ने खुद को रामभरोसे छोड़ दिया।

मच्छरों ने यह कारनामा कैसे किया। इसका रहस्य संगीत की उस स्वरलिपि में है जिसमें उनके गाने की ताल, मात्राएं और राग दर्ज हैं। वह भ्रष्टाचार के संगीत की स्वरलिपि है जिसे हम सब अच्छी तरह जानते हैं। मच्छर गा रहे हैं और उनके विनाश की परियोजनाएं चलाने वाले नेताओं, प्रशासकों, वैज्ञानिकों, चिकित्सकों, बुद्धिजीवियों का एक बड़ा तबका उस महीन धुन पर थिरक रहा है। विचित्र सांस्कृतिक समारोह जारी है।

1 टिप्पणी:

  1. मच्छर पर आपकी ये विवेचना अच्छी लगी ..और मच्छर उन्मूलन के नाम से फैला भ्रष्टाचार ..आपकी रचना बहुत अच्छी लगी .. आपकी रचना आज दिनाक ३ दिसंबर को चर्चामंच पर रखी गयी है ... http://charchamanch.blogspot.com

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