सफरनामा

08 अक्तूबर, 2010

उनकी सांसों के आगे सहम जाती है बंदूक-2

नवस्वामी ज्योतिष और नवसाध्वी देवी
चेतना का पूरी तरह आतंरीकरण सीखने (शरीर से समेट कर मेरूदंड में लाने की प्रक्रिया) में कई साल लग सकते हैं, कई जन्म भी लग सकते हैं लेकिन सांस पर नियंत्रण में मामूली प्रगति भी बड़े परिणामों तक ले जाती है। इसके जरिए मिला मानसिक संतुलन हमें निर्मम परीक्षाओं के दौरान शांत रहने, शांति और करूणा के साथ दूसरों की तकलीफ दूर करने और अपने काम में सफलता पूर्वक एकाग्र रहने में मदद करता है।

देवी एक बार नाजुक चाइना कप और क्राकरी का एक भारी बक्सा लेकर अपने घर से ऊपर पहाड़ी पर गई। उसकी बांहें थक गईं और वह डरने लगी कि बक्सा अब गिरा कि तब गिरा। एक क्षण के लिए वह थमीं तो उसका ध्यान अपनी सांस पर गया जो तनावग्रस्त और उथली थी। कुछ गहरी सांसे लेने के बाद उसने तुरंत महसूस किया कि तनाव जा रहा है और उर्जा शरीर में ज्यादा शक्ति से बह रही है।

गहरी और खुली सांस आपको एक खुली और स्वीकार से भरी जिन्दगी की तरफ ले जाती है। इसके उलट तनावग्रस्त, सिकुड़ती सांस को डर और क्रोध की सोहबत मिलती है।

भावना और चेतना में बदलाव
सांस के औजार के इस्तेमाल से भावनाओं को नियंत्रित करना आसान है। सबसे पहले तो यह जानें कि सांस की तीन अवस्थाएं हैं और हर एक का खास मनोवैज्ञानिक मतलब है। खींचना (इनहेलेशन) उर्जा की उर्ध्व, उद्दीप्त गति और मेरूदंड में चेतना के परिणामी भाव से जुडा है। रोकने (रीटेनशन) से उर्जा और ध्यान को एकाग्र करने में मदद मिलती है और बाहर छोड़ना (एक्सहेलेशन) राहत, आश्वस्ति, ग्रहणशीलता औऱ समर्पण की मानसिक अवस्थाओं को प्रोत्साहित करता है।

सांस की इन अवस्थाओं के जरिए अपनी चेतना को कारगर ढंग से बदला जा सकता है। जब आप हताश, नकारात्मक मनःस्थिति में हों, बाहर जाती सांस की तुलना में प्रबल और लंबी सांस खींचे। मतलब सांस लें ज्यादा और छोडें कम। अक्सर सीधा शारीरिक रास्ता आपकी मनःस्थिति को जल्दी बदलता है, विचारों में परिवर्तन का तरीका धीमे काम करता है। खुद को कमजोर महसूस करने वाले मेरूदंड में ऊपर की ओर उर्जा के शक्तिशाली बहाव को देखने की कल्पना करते हुए गहरी सांस लें। इस तरह के सांस-मनोविज्ञान का सफल इस्तेमाल अस्पतालों में हताश मानसिक रोगियों के इस्तेमाल में किया जा चुका है।
मामूली लगते सांस के अभ्यास गहरा असर पैदा करते हैं क्योंकि हमारे ज्यादातर विचारों की प्रकृति मेरूदंड में उर्जा की गति पर निर्भर करती है। आज मैं जमीन से छह इंच ऊपर हूं...मैं सातवें आसमान पर हूं...मैं अपना सर ऊंचा करके चल रहा हूं...मैं हवा में उड़ रहा हूं....ये अभिव्यक्तियां एक ही अनुभूत सत्य की है कि चेतना की ऊर्ध्वगति शरीर में उर्जा के ऊपर की ओर चलने के साथ संभव होती है। जब हम अपने सांस के प्रयोग से ऊर्जा के प्रवाह को उर्ध्वगामी बनाते हैं तो पाते हैं कि हमारे विचार अपने आप बदलने लगे हैं।

विशेष श्वसन तकनीकशरीर को ऊर्जा पूरित करने के लिए परमहंस योगानन्द "दोहरी सांस" (डबल ब्रीदिंग) का अभ्यास कराते थे। इसमें एक छोटी फिर एक लंबी सांस नाक से अंदर खींचते हैं फिर एक छोटी और एक लंबी सांस मुंह से बाहर छोड़ते हैं। शोधों से भी साबित हुआ है कि दोहरी सांस सामान्य की तुलना ज्यादा संपूर्ण तरीके फेफड़ों को भरती और खाली करती है। मेडिटेशन के लिए मन को शांत करने के लिए योगानन्द सभी तीन अवस्थाओं खींचने, रोकने, छोड़ने का अभ्यास समान गिनती के साथ, समान अवधि तक कराते थे।

योगानंद यह भी कह गए हैं कि नथुनों में सांस का प्रवाह जहां महसूस होता है, वह मष्तिष्क को प्रभावित करता है। औपचारिक और अपनी ही धारणाओं में जीने वाले (जजमेन्टल) लोग सिकुड़े हुए नथुनों के बीच संकीर्ण ढंग से सांस लेते हैं जैसे वे दुनियावी झंझटों को अपने भीतर बहुत ज्यादा नहीं जाने देना चाहते। कई लोग मुंह से सांस लेते हैं जो मेरूदंड में ऊर्जा को नीचे की ओर ले जाता है और दिमाग को भरपूर आक्सीजन नहीं मिल पाती। योगानन्द कहते थे कि सांस के बहाव को नाक में ऊपरी हिस्से में महसूस करना चाहिए जहां से आक्सीजन आसानी से दिमाग के फ्रंटल लोब में समा जाती है।

सांस ही रूक जाए तोसांस न ली जाए तो क्या होगा। जब गहरे ध्यान में मन बेहद शांत हो जाता है तो सांस रूक जाती है। एक साधारण सी ध्यान तकनीक है जिसमें सांस की आवाजाही पर सतत निगरानी रखी जाती है, इससे एकाग्रता बढ़ती है जो दिमाग को शांत कर देती है। दिमागी शांति सांस को धीमा कर देती है जो फिर दिमाग को शांत करती है। यह एक चक्र है जिसके जरिए मेडिटेशन कर रहा व्यक्ति सबल एकाग्रता के साथ ध्यान में गहरे और गहरे उतरता जाता है।

जब सांस धीमी हो जाती है तो हृदय को कम काम करना पड़ता है और धड़कने की गति मंद पड़ने लगती है। योगानन्द कहते थे कि हृदय चक्र "मेन स्विच" है जो मेरूदंड से शरीर में बाहर की तरफ जाती ऊर्जा को नियंत्रित करता है। जब हृदय मंद होता है तो अपने आप प्राण मेरूदंड में सिमट आते हैं और शरीर निलंबित हालत में पहुंच जाता है जहां सांस लेने की जरूरत नहीं रह जाती।

ब्रह्मांड चेतना का दरवाजा मशहूर किताब "लाइफ आफ्टर लाइफ" में जिन लोगों के अनुभव रिपोर्ट किए गए हैं, वे कहते हैं कि आपरेशन के दौरान जब उनका दिल ठप हो गया तो उन्होंने खुद को एक अंधेरी सुरंग से गुजरते पाया जो प्रेम और आनंद की अनुभूति कराने वाले चमकीले सफेद प्रकाश की ओर जा रही थी। स्वामी क्रियानन्द का मानना है कि यह सुरंग आतंरिक मेरूदंड है, जहां गहरे ध्यान में प्रवेश किया जा सकता है और चमकीला सफेद प्रकाश आध्यात्मिक आंख का प्रकाश है।

भौंहों के बीच के बिन्दु को योगानंद ने आध्यात्मिक आंख या ब्रह्मांड चेतना का दरवाजा कहा। आध्यात्मिक आंख पर ध्यान लगाकर हम अपनी चेतना को मष्तिष्क के मेडुला आब्लान्गेटा से फ्रंटल लोब्स की ओर ले आते हैं जो उच्चतर चेतना का केंद्र है। गहरे ध्यान में जब हम पांच कोनो वाले सितारे से आगे बढ़ते हैं तो ब्रह्मांड चेतना या समाधि की अनुभूति होती है। इसी आंतरिक समाधि के बारे में संत पॉल ने लिखा था कि मैं "रोज मरता हूं।" इस अवस्था में सांस बंद हो जाती है, जीवन ऊर्जा शरीर से मेरूदंड में सिमट आती है और साधक अपने शरीर को इच्छानुसार छोड़ सकता है।

हम सभी को कभी न कभी मरना ही है। लेकिन गहरे ध्यान में मेरूदंड की सुंरग से आध्यात्मिक आंख के प्रकाश की ओर जाते हुए हम मृत्यु को भय के बजाय आनंदमय तरीके से महसूस कर सकते हैं।

कितनी अच्छी बात है कि सांस जो हमारे अस्तित्व की बुनियाद है वही हमें आत्मसाक्षात्कार की ऊंचाईयों तक भी ले जाती है। जिन्दगी पर नियंत्रण का सारा रहस्य सांसों में है क्योंकि उनके बिना जिन्दगी नहीं चलती।

4 टिप्‍पणियां:

  1. अनिल यादव जी आपका सारगर्भित आलेख पढ़ कर अच्छा लगा। अनुभूति के बिना इतनी सटीक भाषा में लिखा जाना सम्भव नही है। आपसे परिचय होना सौभाग्य की बात है।
    http://supportinghands.blogspot.com/2008/10/life-is-engineering-of-psychoware-and.html

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  2. मेरे तमाम भौतिक कष्‍टों का समाधान मेडिकल साइंस के साथ योग में भी है। अक्‍सर उत्‍तेजित होता रहता रहता हूं, जिससे ग्‍लूकोज लेवल बढ़ जाता है और शरीर में तमाम तरह के विकार पैदा होते रहते हैं।
    अच्‍छा लगने के साथ-साथ रास्‍ता दिखाने वाला भी है यह लेख। साधुवाद।

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