सफरनामा

10 मार्च, 2010

घुंघरू और बुलडोजर

केएनवीएपीएन-5
धंधा बंद होने के एक हफ्ते बाद, डीआईजी रामशंकर त्रिपाठी का काफिला फिर मड़ुवाडीह पहुंचा। आगे उनकी बिल्कुल नई हरे रंग की जिप्सी थी। पीछे खड़खड़ाती जीपों में कई थानों के प्रभारी और लाठियों, राइफलों से लैस सिपाही थे। सबसे पीछे एक रिक्शे पर माइक और दो भोंपू बंधे हुए थे। शाम को जब यह लाव-लश्कर वहां पहुंचा तो मकानों की बत्तियां जल चुकी थी। आसमान पर छाते कुहरे के धुंधलके में बदनाम बस्ती के दोनों तरफ भरे पानी के गड़ढों के पार एक-एक बुलडोजर रेंग रहे थे। कोई कंस्ट्रक्शन कंपनी इस खलार जमीन को पटवा रही थी। कुहरे में हिचकोले खाते बुलडोजर बस्ती की तरफ बढ़ते मतवाले हाथियों की तरह लग रहे थे।

एक जीप के बोनट पर मुश्किल से चढ़ पाए एक तुंदियल सिपाही ने माइक से ऐलान किया, ‘मानव-मंडी के सभी बंशिंदे फौरन यहां आ जाएं, डीआईजी साहब उनसे बात करेंगे, उनकी समस्याएं सुनेंगे और उनका निदान करेंगे।’ मडुवाडीह थाने में मानव-मंडी बाकायदा एक बीट थी और एक रजिस्टर में वहां रहने वाले सभी लोगों के नाम पते और अतीत दर्ज था। नए आने और जाने वालों का रिकार्ड भी उसमें रखा जाता था। रेड लाइट एरिया के देसी विकल्प के रूप में सब्जी मंडी, गल्ला मंडी, बकरा मंडी के तर्ज पर रखा गया यह नाम कितना सटीक था। मानव देह ही तो बिकती थी, वहां। चेतावनी की लालबत्ती जलती तो कभी देखी नहीं गई। नगर वधुओं को बुलाने के लिए सिपाहियों का एक जत्था बस्ती में घुस गया। थाने के ये वे सिपाही थे जो इन मकानों की एक-एक ईंट को जानते थे। वेश्याओं ने सोचा था कि धंधा बंद कराना, पुलिस की हफ्ता बढ़वाने की जानी पहचानी कवायद है। आमतौर पर थानेदार एक आध कोठे पर छापा डालता, दो चार दलालों से लप्पड़-झप्पड़ करता। कोई लड़की पकड़ कर थाने पर बिठा ली जाती और तय-तोड़ हो जाता था। लेकिन डीआईजी खुद दूसरी बार आए थे। उन्हें अंदाजा हो गया था कि इस बार मामला गंभीर है।

सबसे पहले बच्चे आए। उनके साथ एक युवक आया, जिसने दो साल पहले उन्हें पढ़ाने के लिए बस्ती में स्कूल खोला था। बच्चे उसे मास्टर साहब कहते थे। पीछे बस्ती के दुकानदार, साजिंदे, भड़ुए, सबसे बाद में वेश्याएं आईं। इतनी भीड़ हो गई कि उसमें अचानक गुम हो गए डीआईजी की फोटो खींचने के लिए प्रकाश को एक मकान की छत पर चढ़ना पड़ा। भीड़ के बीच छोटे से घेरे में, चार पांच बूढ़ी औरतें और उनकी नकल करते बच्चे, बलैया लेते हुए, गिड़गिड़ाते हुए, नाटकीय ढंग से डीआईजी के पैरों की तरफ लपक रहे थे। सिपाही उन्हें डांटते हुए आगे बढ़ते, वे उनसे पहले ही तपाक से वापस अपनी जगह चले जाते थे। एक चाय की दुकान से लाए गए बेंच पर, हाथों में माइक थामकर डीआईजी खड़े हुए तो सन्नाटा खिंच गया। बस्ती के किनारों पर रेंगते बुलडोजरों की गड़गड़ाहट फिर सुनाई पड़ने लगी। उन्होंने कहा ‘भाईयों और बहनों।’ बहनों के ‘ओं’ में जैसे कोई चुटकुला छिपा था, भीड़ हंसने लगी, वेश्याएं हंसते-हंसते एक दूसरे पर गिरने लगीं।

उन्होंने गला साफ करके कहीं दूर देखते हुए कहना शुरू किया, प्रशासन को मानव मंडी के बशिंदों की समस्याओं का पूरा ध्यान है, वेश्यावृत्ति गैर-कानूनी है इसलिए उस पर सख्ती से रोक लगा दी गई है। मड़ुवाडीह थाने में अलग से एक सेल खोला गया है। आप लोग वहां जाकर सरकारी लोन के लिए आवेदन करें। आप लोगों को छूट के साथ, कम ब्याज पर भैंस, सिलाई-मशीन, अचार-पापड़ का सामान दिलाया जाएगा। अपना रोजगार शुरू करें, जो काम करने के लायक नहीं हैं, उन्हें नारी संरक्षण गृह भेज दिया जाएगा ताकि आप लोग यह बेइज्जती का पेशा छोड़कर सम्मान के साथ...। सरकार के नारी संरक्षण गृह का नाम सुनकर वेश्याएं फिर आपस में ठिठोली करने लगी। डीआईजी ने अपने फालोअर को डपटा, जाओ पता करो, वे क्या कह रही है। फालोअर थोड़ी देर वेश्याओं के बीच जाकर हंसता रहा लेकिन पलटते ही उसका चेहरा पहले की तरह सख्त हो गया। लौटकर अटेंशन की मुद्रा में खड़ा होकर बोला, ‘सर, कहती हैं फ्री में समाज सेवा नहीं करेंगे।’

डीआईजी समझ नहीं पाए, वेश्याओं ने सिपाही से कहा था कि संरक्षण गृह जाने से बेहतर तो जेल है क्योंकि वहां फ्री में समाज सेवा करनी पड़ती है। कुछ दिन पहले संरक्षण गृह में संवासिनी कांड हुआ था। वहां की सुपरिटेडेंट नेताओं, अफसरों और अखबारी भाषा में सफेदपोश कहे जाने वाले लोगों को लड़कियां सप्लाई करती थीं। जब यह मामला खुला तो एक के बाद एक मारकर पांच लड़कियां गायब कर दी गईं। ये वे लड़कियां थी जिन्होंने मुंह खोला था। इन दिनों सीबीआई इस मामले की जांचकर रही थी।

भीड़ के पीछे एक बुढ़िया गश खाकर गिर पड़ी थी। झुर्रियों से ढके उसके चेहरे पर सिर्फ बेबस खुला मुंह दिखाई दे रहा था। एक मरियल औरत बैठकर आंचल से उसे हवा करते हुए गालियां दे रही थी, करमजले, मिरासिन की औलाद...मार डाला बेचारी को... जब जवानी थी तब यही पुलिस वाले रोज नोंचने आ जाते थे। कसबिन की जात अब चौथेपन भैंस चराएगी.... पेड़ा बनाएगी। कोई जाकर पूछे मरकीलौना से रंडी के हाथ का कौन पापड़ खाएगा, कौन दूध पिएगा, कौन कपड़ा पहिनेगा...यह सब, हम लोगों से घर-बार छीनकर भीख मंगवाने का इंतजाम है और कुछ नहीं... शहर छोड़कर चले जाओ, जैसे हम हाथ पकड़ कर लोगों को घर से बुलाने जाते हैं। लोगों को ही क्यों नहीं मना कर देते कि यहां न आया करें। जो हमें भगाने के लिए धरना देकर बैठे हैं, वही कहीं और जाकर क्यों नहीं बस जाते। हमें कौन अपने पड़ोस में बसने देगा। यहां की तरह वहां भी छूत नहीं लगेगी क्या?

यह बुढ़िया अकेली रहती थी। उसने सबेरे से कुछ खाया पिया नहीं था। सुबह से ही वह दोनों छोरों तक घूम-घूम कर आंदोलन करने वालों को गालियां बक रही थी। उसके दो बेटे थे जो कहीं नौकरी करते थे। चोरी छिपे साल-दो साल में मिलने आ जाते थे। सबके सामने उसे वे अपनी मां भी नहीं कह सकते थे।

3 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़े चलो उस्ताद...काशी का पूरा रंग खिल रहा है..एक-एक चीज आंखों के आगे घूम रही है। बाकी उनके लिए मुश्किल होगी जो काशी मतलब सिर्फ गंगा घाट समझते हैं...

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  2. लिखते रहो अनिल, समां बंध रहा है। अब तक की सारी कड़ियां पढ़ीं। संवेदनाओं और सरकारी मशीनरी के इस घालमेल में इंसान की मज़बूरी और झूठी हेकड़ी दोनों का दम है।

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  3. क्या बात है सर जी!!!आज बहुत दिनों बाद किसी ब्लाग पर इतनी अच्छी रचना पढ़ी है!सच्चाई के इतने करीब एक लेखक ही ले जा सकता है!बहुत बहुत शुभकामनायें!!!

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