सफरनामा

26 मार्च, 2010

तितलियों के पंखों की धार

केएनवीएएनपी-16
बदनाम बस्ती में पहले भूखे भंवरे आते थे। तीन महीने तक खिचड़ी खाने के बाद अब भूखी तितलियां दम साधकर फूलों की तरफ उड़ने लगीं, उनके रहस्यमय पंखों के रास्ते में जो भी आया, कट गया।

शाम के धुंधलके में जब गाड़ियों का धुंआ मड़ुंवाडीह की बदनाम बस्ती के ऊपर जमने लगता, सजी-धजी तितलियां एक-एक कर बेहिचक बाहर निकलतीं। सिपाहियों के तानों का मुस्कानों से जवाब देते हुए वे सड़क पार कर जातीं। वहां पहले से खड़े उनके मौसा, चाचा, दुल्हाभाई या भाईजान यानि दलाल उन्हें इशारा करते और वे चुपचाप एक-एक के पीछे हो लेतीं। वे उन्हें पहले से तय ग्राहकों के पास पहुंचा कर लौट आते थे। जिनके कस्टमर पहले से तय नहीं होते थे, वे अतृप्त, कामातुर प्रेतों की तलाश में सड़कों और घाटों पर चलने लगतीं। औरतों को मुड़-मुड़ कर देखने और उनका पीछा करते हुए भटकने वालों को वे ठंडे, सधे ढंग से इतना उकसाती कि वे घबराकर भाग जाते या उन्हें रोककर तय तोड़ करने लगते। जो थोड़ा तेज तर्रार और आत्मविश्वासी थीं वे होटलों और सिनेमाहालों के बाहर कोनों में घात लगातीं।

दोयम दर्जे की समझी जाने वाली अधेड़ औरतें रात गए बस्ती के दूसरे छोर से झुंड में निकलतीं और गांव के पिछवाड़े खेतों से होते हुए हाई-वे पर निकल जातीं। वहां ओस से भीगे, पाले से ऐंठते पैरों को कागज, प्लास्टिक और टायर जलाकर सेंकने के बाद वे एक-एक कर ढाबों पर खड़ी ट्रकों की कतार में समा जातीं। भोर में जब वे लौटतीं लारियों में, चाय की दुकानों की बेंचों और मकानों के चबूतरों पर ओवरकोट में लिपटे, पुलिस वाले आराम से सो रहे होते। पहरा देने वालों का हफ्ता तय कर दिया गया था जिसे दलाल और भड़ुए एक मुश्त पहुंचा आते थे।


एक दोपहर प्रकाश घाट पर सलमा को देखकर चक्कर खाकर गिरते-गिरते बचा। वह नीले रंग का स्कर्ट और सफेद कमीज पहने, छाती पर एक मोटी किताब दबाए, एक पंडे की खाली छतरी के नीचे बैठी छवि के पेट पर लेटी, नदी को देख रही थी। छवि का पेट थोड़ा और उभर आया था और चेहरे पर लुनाई आ गई थी। सलमा की बांह पर हाथ रखे वह जितनी शांत और सुंदर लग रही थी, उतना ही वीभत्स, हाहाकार प्रकाश के भीतर मचा हुआ था।....तो मेरा पूर्वाभास सही था। उसे मडुवाडीह में उस लड़की के बलात्कार का पता था। शायद वह वहां के बारे में मुझसे कहीं ज्यादा जानती है, उसने सोचा। उसका हाथ कैमरे पर गया कि वह दोनों की एक फोटो उतार ले लेकिन फिर वह विक्षिप्त जैसी हालत में लड़खड़ाता, भरसक तेज कदमों से दूसरे घाट की ओर चल पड़ा।

सामने जलसमाधि लेने वाले युवक के आगे पीछे, अजीबो-गरीब अंतर्राष्ट्रीय बेड़ा गुजर रहा था। और लोगों की तरह सलमा भी नाव पर घंटे घड़ियाल बजाते, नारे लगाते लोगों को देखकर हाथ हिला रही थी।

कोई दो घंटे बाद सलमा उसे फिर दिखी। इस बार वह अकेली, छाती पर किताब दबाए भटक रही थी। वह उससे बहुत कुछ पूछना चाहता था, लपक कर पास भी गया। लेकिन उसने किताब की ओर इशारा किया, आज कल तुम्हारे स्कूल में कुरान पढ़ाई जा रही है क्या?

उसने कुरान को पलट दिया और अपनी चुटिया को ऐंठते हुए हंसी। तुनक कर धीमे से कहा, जो मुझे ले जाएगा, वह किताब को नहीं पढ़ेगा... अच्छा अब आप जाइए। यहां मत खड़े होइए, बात करनी हो तो वहीं दिन में आइएगा। वहां अब रात में कोई नहीं मिलता। अब प्रकाश को दिखा कि नीचे घाट की सीढ़ियों पर, नदी किनारे उसी जैसी पांच-सात और लड़कियां स्कर्ट, सलवार सूट, सस्ती जींस पहने घूम रही थीं। उनकी बुलाती आंखे, रूखे बाल, ज्यादा ही इठलाती चाल और किताबें पकड़ने का ढंग, कोई भी गौर करता तो जान जाता कि वे स्कूल-कालेज की लड़कियां नहीं हैं। जो लोग उनके खिलाफ इतने ताम-झाम से समारोहपूर्वक अपना गुस्सा उगल रहे थे, उन्हीं के बीच भटकती हुई वे कस्टमर पटा रही थीं। प्रकाश उनके दुस्साहस पर दंग था। शायद उन्हें सचमुच की हालत का पता नहीं था इसीलिए वे सड़क पर हुंकारते ट्रकों के बीच मेढ़कों की तरह फुदक रही थीं। अगर लोगों को पता चल जाता कि वे वेश्याएं है तो भीड़ उनकी टांगे चीर देती और झुलाकर नदी में फेंक देती। सलमा ने पलटकर देखा प्रकाश वहीं खड़ा, कैमरा फोकस कर रहा था। उसने पूछा ‘आप अखबार में हम लोगों को नगर-वधू क्यों लिखते हैं?’

प्रकाश ने कैमरे में देखते हुए ही कहा, ‘क्योंकि तुम किसी एक की नहीं, सारे नगर की बहू हो, तुम यहां किसी खास आदमी को तो खोज नही रही हो, जो मिल जाए उसी के साथ चली जाओगी।’

‘अच्छा तब मेयर साहब को नगर प्रमुख क्यों, नगर पिता क्यों नहीं लिखते और उनसे कह दो कि आकर हम लोगों के साथ बाप की तरह रहें।’

प्रकाश ने खिलखिलाती हुई उस वेश्या छात्रा को देखा। उसे अचानक लालबत्ती और रेडलाइट एरिया का फर्क नए ढंग से समझ में आ गया। मेयर पुरुष है, संपन्न है इसलिए लालबत्ती में घूम रहे हैं। तुम गरीब लड़की हो इसलिए अपना पेट भरने के लिए मौत के मुंह में घुसकर ग्राहक खोज रही हो।

उसकी हंसी से चिढ़कर पूछा, ‘तुम्हें यहां डर नहीं लगता। इन लोगों को पता चल गया तो?’

वह हंसती ही जा रही थी, उसने नदी के उस पार क्षितिज तक फैले बालू का सूना विस्तार दिखाते हुए कहा, ‘जिन्हें पता चल गया है, वे लड़कियों के साथ उस पार रेती में कहीं पड़े हुए हैं और वे किसी से नहीं कहने जाएंगे... अलबत्ता हल्के होकर हम लोगों को हटाने के लिए और जोर से हर हर महादेव चिल्लाएंगे।...अच्छा अब आप चलिए, नहीं तो लड़कियां आपको ही कस्टमर समझ कर पीछे लग लेंगी।’

बेईमानी का संतोष

धंधा, शहर में फैल रहा है। यह खबर डीआईजी रमाशंकर त्रिपाठी को लग चुकी थी। उन्होंने अफसरों की मीटिंगे की। सिपाहियों की मां-बहन की। दारोगाओं को झाड़ा, एलआईयू को मुस्तैद किया, तबादले किए लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। जो भी मड़ुंवाडीह के दोनों छोरों पर पहरा देने जाता, भड़ुओं का गुस्सैल बड़ा भाई हो जाता। जिसकी हर सुख-सुविधा का वे ढीठ विनम्रता के साथ ख्याल रखते। कप्तान वगैरह रस्मी तौर पर मुआयना करने आते तो सिपाही उन्हें वेश्याओं के खाली पड़े दो-चार घर दिखा देते। वे लौटकर रिपोर्ट देते कि धंधा बंद होने के कारण, उन घरों को छोड़कर वे कहीं और चली गईं हैं। डीआईजी ने शहर के लॉजों, होटलों में छापे डलवाने शुरू करा दिए, जिनमें बाहर से आकर धंधा कर रही कालगर्लें पकड़ी गईं लेकिन मड़ुवाडीह की कोई वेश्या नहीं मिली। हमेशा की तरह खबरे छपी कि रैकेट चलाने वालों की डायरियों और कालगर्लों के बयानों से कई सफेदपोश लोगों के नाम, पते और नंबर मिले हैं जल्दी ही पुलिस उनसे पूछताछ करेगी और उनकी कलई खुलेगी। हमेशा की तरह न पूछताछ हुई, न कलई खुली और न ही फालोअप हुआ। कालगर्लें जमानत पर छूटकर किसी और शहर चली गईं और रैकेट चलाने वालों ने भी नाम और ठिकाने बदल लिए।

प्रकाश की ड्यूटी लगाई गई कि वह शाम को पहरा देते पुलिसवालों के बीच से होकर बदनाम बस्ती से धंधे के लिए निकलने वाली लड़कियों की फोटो ले आए। उसने पहली बार बेईमानी की, जब वे निकल रहीं थी, तब वह अंतरात्मा के घर में बैठकर उनके साथ चाय पी रहा था। उनके निकल जाने के बाद वहां पहुंचकर उसने एक पूरा रोल खींच डाला, जिसमें कुहरे बीच झिलमिलाते सिपाहियों और गुजरते इक्का-दुक्का राहगीरों के सिवा और कुछ नहीं था। उसे फ्लैश चमकाते देख, दो सिपाहियों ने खदेड़ने की कोशिश की तो उसने कहा कि वे निश्चिंत रहें आज वह एक भी फोटो ऐसा नहीं खींचेगा जिससे उनको कोई परेशानी हो। एक सिपाही ने पूछा, बहुत साधु की तरह बोल रहे हो, बाई जी लोगों ने कुछ सुंघा दिया है क्या?’

सिपाही जब आश्वस्त हो गए तो उन्होंने बताया कि कम उम्र की लड़कियों का धंधा बढ़िया चलने से अब नई लड़कियां भी आ रही थीं। उन्हें मड़ुवाडीह में नहीं, शहर में किराए पर लिए मकानों में रखा जा रहा था। थाने का रेट बढ़कर अब पैंतीस से पचास हजार हो गया था। प्रकाश ने अंतरात्मा से कहा कि लगता है निहलानी का मॉरेलिटी ब्रिज ही बनेगा और बड़े लोगों की चांदी रहेगी। तुम तो बाई जी लोगों से ही बात कर लो, शायद उनमें से कोई तुम्हारा मकान खरीद ले। अंतरात्मा को अफसोस था कि पुलिस भी दो टुकड़ा हो चुकी है।

प्रेस लौटकर उसने फोटो एडीटर को समझाया कि कुहरा इतना है कि वहां कुछ भी देख पाना संभव नहीं है। जो बन सकती थीं, वे यही तस्वीरे हैं। वह बेईमानी करके बहुत खुश था। उसने खुद को हताशा से बचा लिया था। उसके फोटो खींचने से अखबार की थोड़ी विश्वसनीयता बढ़ती, सर्कुलेशन बढ़ता लेकिन धंधे पर कोई फर्क नहीं पड़ता। पुलिस वाले ही बंद नहीं होने देते। वह चाहता भी नहीं था कि धंधा बंद हो। वह अब चाहता था कि चले और खूब चले। (जारी)

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर! इसे अब पढ़ना शुरु किया अभय तिवारी की चर्चा के बाद!http://chitthacharcha.blogspot.com/2010/03/blog-post_26.html

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