सफरनामा

27 मार्च, 2010

मरियल क्लर्क, थ्रिल और गलता पत्थर

(अमर होने की चाह के बजाय जिंदगी की गति के साथ चलने के थ्रिल को बार-बार महसूस करने की गरज से लिखी इस लंबी कहानी उर्फ लघु उपन्यास की यह समापन किस्त है। इसे हजार-पांच सौ प्रतियों वाली किसी पत्रिका में प्रकाशित कराने के बजाय नेट पर खास मकसद से जारी किया गया है। इरादा है कि हिंदी के प्री-पेड आलोचकों, समीक्षकों और साहित्यबाजों के बजाय इसे सीधे पाठकों के पास ले जाया जाए और उनकी राय जानी जाए। आप सबसे आग्रह है कि इस कहानी पर अपनी राय बेधक ढंग से लिखें बिना इस बात की परवाह किए कि वह पहले कहीं देखी किसी स्वनामधन्य की लिखावट के आसपास है या नहीं। क्या पता बिना साहित्यिक विवादों की झालर, आलोचना शास्त्र के सलमे सितारों से रहित, इन या उन "जी" के दयनीय दबावों से मुक्त सहज प्रतिक्रियाएं हिंदी के नए लेखकों की रचनाओं के मूल्यांकन का कोई नया दरवाजा खोल दें। आपके नजरिए को अलग से प्रकाशित किया जाएगा।)अनिल

भेजने का पता हैः oopsanil@gmail.com

केएनवीएएनपीः समापन किश्त
कोई तीन महीने बाद, फिर बीमा कंपनी का वही मरियल क्लर्क, काला चश्मा लगाए अखबार के दफ्तर की सीढ़ियों पर नजर आया। इस बार फिर पक्की खबर लाया था कि प्राइवेट डिटेक्टिव एजेंसी की जांच रिपोर्ट आ गई है कि पान मसाला नहीं, डीआईजी रमाशंकर त्रिपाठी ही अपनी पत्नी की आत्महत्या के जिम्मेदार हैं। लगातार मारपीट, प्रताड़ना के तारीखवार ब्यौरे वह लवली त्रिपाठी की डायरियों की फोटो प्रतियों में समेट लाया था। इसके अलावा वह यह खबर भी लाया था कि डीआईजी त्रिपाठी डेढ़ महीने बाद, अपने से काफी जूनियर एक महिला आईपीएस अफसर से शादी करने जा रहे हैं। इन खबरों की स्वतंत्र पड़ताल कराई जाने लगीं।

उन दिनों अखबार प्रकाश को बेहद उबाऊ लगने लगा। हर सुबह खोलते ही काले अक्षर एक दूसरे में गड्डमड्ड अपनी जगहों से डोलते हुए नजर आते थे, जिसकी वजह से सिरदर्द करने लगता था और वह अखबार फेंक देता था। इसकी एक वजह तो यही थी कि जिन घटनाओं को खुद उसने देखा और भोगा होता था, वे छपने के बाद बेरंग और प्राणहीन हो जाती थी। किसी जादू से उनके भीतर की असल बात ही भाप की तरह उड़ जाती थी। पहली लाइन पढ़ते ही वह जान जाता था कि असलियत कैसे शब्दों की लनतरानियों में लापता होने वाली है। रूटीन की बैठकों में उसे रोज झाड़ पड़ती थी कि वह अखबार तक नहीं पढ़ता इसीलिए उसे नहीं पता रहता कि शहर में क्या होने वाला है और प्रतिद्वंदी अखबार किन मामलों में स्कोर कर रहे हैं। दरअसल वह इन दिनों अपनी एक बहुत पुरानी गुप्त लालसा के साकार होने की कल्पना से थरथरा रहा था। यह लालसा थी नकचढ़ा, अहंकार से गंधाता पत्रकार नहीं सचमुच का एक रिपोर्टर होने की। ऐसा रिपोर्टर जिसकी कलम सत्य के साथ एकमेक होकर धरती में कंपन पैदा कर सके।

उसके पास इतने अधिक कागजी सबूत, अनुभव, फोटोग्राफ और बयान हो गए थे कि अब और चुपचाप सब कुछ देखते रह पाना मुश्किल हो गया था। अब वह जब चाहे जब वेश्याओं को हटाने वालों के पाखंड का भांडा फोड़ सकता था। यही सनसनी उसके भीतर लहरों की तरह चल रही थी। सीधे सपाट शब्दों में, उसने रातों को जागकर कंपोज कर डाला कि कैसे पैसा, दारू, देह नहीं मिलने पर वेश्याओं को बसाने वाले लोकल नेता उनके खिलाफ हुए। कैसे निधि कंस्ट्रक्शन कंपनी ने उनके गुस्से को अपने पक्ष में इस्तेमाल कर लिया। कैसे डीआईजी ने अपनी छवि बनाने के लिए धंधा बंद कराया और बाद में वे कमिश्नर के साथ कंस्ट्रक्शन कंपनी के एजेंट हो गए। कंस्ट्रक्शन कंपनी कैसे इससे बड़ा और आधुनिक वेश्यालय खोलने जा रही है। वेश्याओं को हटाने से कैसे यह धंधा और जगहों पर फैलेगा। कैसे डीआईजी के पिता और कमिश्नर ने धार्मिक भावनाओं को भड़काया और कैसे हर-हर महादेव के उद्घघोष के साथ विरोध और वेश्यावृत्ति दोनों एक साथ घाटों पर चल रहे हैं। उसका अनुमान था कि यह सीरीज छपते-छपते बीमा कंपनी के जासूसों की जांच रपट का भी सत्यापन हो जाएगा और उसके छपने के बाद सारे पाखंड के चिथड़े उड़ जाएंगे। इसके बाद शायद सचमुच वेश्याओं के पुनर्वास पर बात शुरू हो।

प्रकाश ने दो दिनों तक अपने ढंग से सभी छोटे-बड़े संपादकों को टटोला और आश्वस्त हो गया कि, उसकी रिपोर्टिंग का वक्त आ गया है। तीसरे दिन उसने रिपोर्ट, तस्वीरें, रजिस्ट्री के कागज, ले-आउट प्लान और तमाम सबूत ले जाकर स्थानीय संपादक की मेज पर रख दिए। पूरे दिन वे उन्हें पढ़ते, जांचते और पूछताछ करते रहे। शाम को आकर उन्होंने उसकी पीठ थपथपाई, ‘तुम तो यार, पुराने रंडीबाज निकाले! बढ़िया रिपोर्ट हैं, हम छापेंगे।’
यह सचमुच दिल से निकली तारीफ थी।

अगले दिन अखबार की स्टियरिंग कमेटी की बैठक हुई क्योंकि इस मसले पर पुराना स्टैंड बदलने वाला था। संपादक का फैसला हो चुका था, बाकी विभागों से अब औपचारिक सहमति ली जाने की देर थी। डेढ़ घंटे की बहस के बाद अखबार के मैनेजर ने संपादक से पूछा, ‘मड़ुवाडीह में कुल कितनी वेश्याएं हैं?

‘करीब साढ़े तीन सौ’।

‘इनमें से कितनी अखबार पढ़ती हैं?’

इसका आंकड़ा किसी के पास नहीं था। उसने फैसला सुनाने के अंदाज में कहा, आज की तारीख में सारा शहर हमारे अखबार के साथ है। कुल साढ़े तीन सौ रंडिया जिनमें से कुल मिलाकर शायद साढ़े तीन होंगी जो अखबार पढ़ती हों, ऐसे में यह सब छापने का क्या तुक है। अगर कोई बहुत बड़ा और नया रीडर ग्रुप जुड़ रहा होता, तो यह जोखिम लिया भी जा सकता था।

संपादक जो ध्यान से उसका गणित सुन रहे थे, हंसे। उन्होंने कहा, सवाल वेश्याओं की संख्या का नहीं है मैनेजर साहब! वे अगर तीन भी होती तो काफी थी। उनके बारे में जो भी अच्छा-बुरा छपता है। उसे उनका विरोध करने वाले भी पढ़ते हैं। बल्कि उनकी ज्यादा दिलचस्पी रहती है।

मैनेजर ने पैंतरा बदला, अब आप ही बताइए कि अपने स्टैंड से इतनी जल्दी कैसे पलट जाया जाए। कल तक आप ही छाप रहे थे कि वेश्याओं की वजह से लोगों की बहू-बेटियों का घर में रहना तक मुश्किल हो गया है और डीआईजी धंधा बंद कराकर बहुत धर्म का काम कर रहा है। अब जब मुद्दा आग पकड़ चुका है तो उस पर पानी डाल रहे हैं। आप बताइए अखबार की क्रेडिबिलिटी का क्या होगा। संपादक ने समझाने की कोशिश की कि क्रेडिबिलिटी एक दिन में बनने-बिगड़ने वाली चीज नहीं है। लोग थोड़ी देर के लिए भावना के उबाल में भले आ जाएं लेकिन अंतत: भरोसा उसी का करते हैं जो उनके भोगे सच को छापता है। पहले ही दिन कोई कैसे जान सकता था कि मड़ुंवाडीह की असली अंदरूनी हालत क्या है। अब हमें जितना पता है, उतना छापेंगे। हो सकता है कल कुछ और नया पता चले उसे भी छापेंगे। अगर हमने नहीं छापा तो हमारी क्रेडिबिलिटी का कबाड़ा तो तब होगा जब लोग देखेंगे कि कंस्ट्रक्शन कंपनी मंडुवाडीह में इमारतें बना रही है।

गुणाभाग और अंततः जिंदगी

मामला उलझ गया कुछ तय नहीं हो पाया। मैनेजर ने डाइरेक्टरों से बात की। डाइरेक्टरों ने प्रधान संपादक को तलब किया। प्रधान संपादक ने फिर बैठक बुलाई। प्रधान ने स्थानीय संपादक को वह समझाया जो वे जानते-बूझते हुए नहीं समझना चाहते थे। उन्होंने उन्हें बताया कि इस इलाके के जितने बिल्डर, नेता, व्यापारी अफसर हैं निधि कंस्ट्रक्शन कंपनी के साथ हैं और चाहते हैं कि जल्दी से जल्दी वह बस्ती वहां से हटे ताकि काम शुरू हो। उन्होंने जनता को भी अपने पक्ष में सड़क पर उतार दिया है। अखबार एक साथ इतने लोगों का विरोध नहीं झेल सकता। खुद हमारे अखबार के इस इलाके के फ्रेंचाइजी यानि जिनकी बिल्डिंग में हम किरायेदार हैं, जिनकी मशीन पर हमारा अखबार छपता है, इस कंस्ट्रक्शन कंपनी के पार्टनर हैं। अखबार के कई शेयर होल्डरों ने भी इस कंपनी में पैसा लगा रखा है। वे सभी अपनी मंजिल के एकदम करीब हैं, और कहां हैं आप! खुद डाइरेक्टर नहीं चाहते कि उनकी राह में कोई अड़ंगा डाला जाए। नौकरी प्यारी है तो हमें, आपको दोनों को चुप रहना चाहिए, फिर कभी देखा जाएगा।

स्थानीय संपादक को निकालने की पूरी तैयारी हो चुकी थी, इसलिए उन्हें सबकुछ बहुत जल्दी समझ में आ गया। स्टियरिंग कमेटी की बैठक में प्रधान संपादक ने भाषण दिया, सभी जानते हैं कि सरसों के पत्तों पर और बैंगन में अल्लाह अपना हस्ताक्षर नहीं करते, दो सिर वाले विकृत बच्चे देवता नहीं होते, खीरे में से भगवान नहीं निकलते, गणेश जी दूध नहीं पीते। यह सब सफेद झूठ है लेकिन हम छापते हैं क्योंकि जनता ऐसा मानती है और उन्हें पूजती है। हम साढ़े तीन सौ वेश्याओं के लिए बीस लाख जनता से बैर नहीं मोल ले सकते। बाजार में हम धंधा करने बैठे हैं। हम वेश्याओं का पुनर्वास कराने वाली एजेंसी नहीं है। लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि है इसलिए उसकी भावनाओं का आदर करना ही होगा।
मैनेजर मुस्कराया।
प्रधान संपादक ने स्थानीय संपादक को मुस्करा कर देखा, ‘हम अखबार किसके लिए निकालते हैं?
‘जनता के लिए’ बेजान हंसी हंसते हुए उन्होंने कहा।

स्थानीय संपादक ने प्रकाश से कहा, इस समय ऊपर के लोगों में नाराजगी बहुत है इसलिए थोड़ा माहौल ठंडा होने दो तब देखा जाएगा। वह जानता था कि धरती हिलाने का उसका अरमान सदा के लिए धरती में ही दफन किया जा चुका है।

उसी समय एक विचित्र बात हुई। जलसमाधि का इरादा लिए गंगा में फिरने वाला युवक एक दिन गांजे के नशे में नाव से लड़खड़ाकर नदी में गिर गया। गले में बंधी पत्थर की पटिया के पीछे वह कटी पतंग की तरह लहराता हुआ नदी की पेंदी में बैठा जा रहा था। बड़ी कोशिश करके जल पुलिस के गोताखोरों ने उसे निकाला। पुराना पत्थर काटकर उसकी जगह छोटा पत्थर बांधा गया। उसी दिन से अपने आप उसके गले में बंधे पत्थर का आकार घटने लगा। जैसे चंद्रमा घटता है उसी तरह पहले सिल, फिर चौकी, फिर माचिस की डिबिया के आकार का होता गया। धीरे-धीरे घटते हुए वह एक दिन ताबीज में बदलकर थम गया।

उस क्रमश: घटते हुए रहस्यमय पत्थर की तस्वीरें, प्रकाश के पास मौजूद हैं।

अभी वेश्याएं मड़ुवाडीह से हटी नहीं है। अब वह युवक नाव में नहीं रहता। वह गाहे बेगाहे अपने गले का ताबीज दिखाकर अपना संकल्प दोहराता रहता है कि वह एक दिन काशी को वेश्यावृत्ति के कलंक से मुक्ति दिलाकर मानेगा। लोग उसे प्रचार का भूखा, नौटंकीबाज कहते हैं और उस पर हंसते हैं। प्रकाश को लगता है कि वैसा ही एक ताबीज उसके गले में भी है, जो हमेशा दिखाई देता है। उसे वह ताबीज अक्सर अपनी कमीज के बटन में उलझा हुआ दिख जाता है। उसे भी लोग धंधेबाज, दलाल और एक पौवा दारू पर बिकने वाला पत्रकार कहते हैं। उस पर और उसके अखबार पर हंसते हैं।

प्रकाश सोचता है कि अब छवि से जल्दी से शादी कर ले। माना कि सच लिख नहीं सकता लेकिन उसे अपनी जिन्दगी में स्वीकार तो कर सकता है।
(समाप्त)

3 टिप्‍पणियां:

  1. mujhe kahani prastoot karne ka aapka tareeka bahut hi dilchasp laga,aapka yeh laghu upanyas bina kisi lag lapet k hamare samaj ki sachhai pesh karta hai.halanki me kisi prakaar ka vidvaan to nahi hun par mujhe aapke is upanayas me kaafi originality dikhai padti hai .me aapke is prayaas ki tah e dil sarahana karta hun.aap aag bhi isi prakaar likhte rahenge isi vishwaas k saath aapko meri taraf se shubhkamnaye.
    basant

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  2. अनिल जी, सबसे पहले बधाई कि रचना बारी - बारी से और कभी विलयन के रूप में सभी रसों का निष्पादन करती है. मैंने इसे किश्तों में ही पढ़ा है यानि छपते ही बांच लिया. इस पर आपको किसी तरह की आलोचना की आवश्यकता पाठकों से क्यों कर है ? बहुत बार हमारी सहृदयता से कंधे पर बिठाया गया अजगर अपनी मौज में ही फंदा कसने लगता है. कमलेश्वर जी दावा करते हैं कि मैं, दुष्यंत और राकेश एक नए लड़के नामवर को पकड़ कर लाये थे और उसे नई कहानी की आलोचना करने का पाठ पढाया था... आगे का किस्सा आप जानते हैं कि उन्होंने किस तरह ताम्र-पत्र वितरित किये हैं.
    खैर आपकी इस कहानी से मैंने आनंद उठाया है. यहाँ रचना किसी प्राणमय रिपोर्ताज से आगे निकाल चुकी है जबकि नई कहानी और किसी संभावित होलीवुड डाक्यूमेंट्री के बीच में खड़ी हुई है. संदेह भी हुआ कि कहीं आपने इसे किसी फिल्म के लिए तो नहीं लिखा है ?

    मेरी ढेर सारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं.

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  3. भई एक तकलीफ़ तो है..इस जबर्दस्त कहानी की ’हैवी-वेहिकल’ किश्तों का ट्रैफ़िक ब्लॉग पर इतना ज्यादा है कि हम जैसे ’स्लो-मोशन’ सड़क पार ही नही कर पाते!

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