सफरनामा

11 मार्च, 2010

लड़की लाना बंद करो दाज्यू

केएनवीएएनपी-6
पीछे हंगामा देखकर सिपाही उधर लपके तभी न जाने कहां से एक अधेड़ नेपाली औरत झूमते हुए आकर डीआईजी के पीछे खड़ी हो गई। उसके बाल खुले थे, साड़ी धूल में लिथड़ रही थी, वह पीकर धुत्त थी। अगल- बगल की औरतें उसे खींच रही थी। अचानक वह चिल्लाने लगी और उसके गालों पर गंदले आंसू बहने लगे, ‘आस्तो न गर बड़ा साहब... आस्तो न गर दाज्यू.. अपाना हुकुम माथे पर लिया।’

डीआईजी चौंक कर पीछे घुमें तो उसने हाथ जोड़ लिए, ‘साहेब, मेरा साहेब। पहले यहां नई लड़की लोग का लाना तो बंद करो साहेब! हम लोग खुद तो नहीं आया साहेब... बहुत बड़ा-बड़ा लोग लेकर आता है। नेपाल से, बंगाल से, ओड़िसा से... हर नई लड़की पीछे थाना को पैंतीस हजार पूजा दिया जाता है। पुराना का तो घर है, बाल-बच्चा है, बूढ़ा होके नहीं तो बीमारी से मर जाएगी। लेकिन नया लड़की आता रहेगा तो यहां का आबादी बढ़ता जाएगा। जहां से लड़की आता है, रास्ते भर सरकार को बहुत रुपया मिलता है।’

सिपाही उसे चुप कराने लपके तो उचक कर उसने एक की टोपी झटक ली और उसी से खुद को पीटने लगी। मानो जिस सबसे बुरी होनी की आशंका हो, उसे खुद अपने हाथों घटित कर देना चाहती हो, वह उन्माद में बड़बढ़ाए जा रही थी, ‘मारेगा हमको, मारेगा... काट डालेगा... और जास्ती क्या कर लेगा। यहां से कोई नहीं जाएगा.... जहां जाओ, वहीं से भगाता है। कितना भागेगा... यहीं मर जाएगा। लेकिन अब कहीं नहीं जाएगा। डीआईजी हाथ में माइक लिए भौंचक ताकते रह गए। उन्होंने कई बार नाराज होकर सुनिए, सुनिए की अपील की लेकिन हुल्लड़ में उधर किसी का ध्यान ही नहीं गया। सिपाही ने उससे टोपी वापस लेनी चाही तो वह भागने लगी। सिपाही पीछे लपका तो उसने टोपी पहन ली और ठुमकते हुए भीड़ में घुस गयी। वह नाचते हुए आगे-आगे, बौखलाया सिपाही पीछे-पीछे। लोग सब कुछ भूलकर हंसने लगे। जो पुलिस वाले वहां अक्सर आते थे। वेश्याएं उनके साथ इसी तरह हंसी ठट्ठा करती थीं। लेकिन आज यह सिपाही नथुने फुलाए, दांत पीसते हुए, उसके पीछे लड़खड़ाता भाग रहा था। बच्चे तालियां बजाने और चीखने लगे।

डीआईजी ने घूरकर पुलिस वालों की तरफ देखा जो हंस रहे थे। पहले वे सकपकाए फिर तुरंत उन्होंने कतार बनाकर डंडों से भीड़ को बस्ती के भीतर ठेलना शुरू कर दिया। जो बस्ती के नहीं थे, सिपाहियों को धकेलकर सड़क की ओर भागने लगे। इन भागते लोगों पर पीछे खड़े सिपाहियों ने डंडे जमाने शुरू कर दिए। इसी बीच गुस्से से तमतमाए डीआईजी अपने फालोअर और ड्राइवर को लेकर निकल गए। बस्ती में स्कूल चलाने वाला लड़का डंडों के ऊपर इस तरह झुका हुआ था जैसे लाठियां उसके पंख हों और वह उड़ रहा हो। वह वहीं से चिल्लाया, ‘आप उनसे खुद ही बात कर लीजिए, मैडम! पता चल जाएगा... शरीफ औरतें वेश्याओं के बारे में बात नहीं करतीं। वे गुड़िया पीटने और विश्वसुंदरी प्रतियोगिता के विरोध में बयान दे सकती हैं बस। यहां आएंगी तो उनके पति घर से भगा देंगे, सारा नारीवाद फुस्स हो जाएगा।’

एक महिला रिपोर्टर उससे पूछ रही थी कि आप लोग महिला संगठनों से बात क्यों नहीं करते, तभी लाठियां चलनी शुरू हो गई थीं। अब वह पुलिस वालों के पीछे घबराई खड़ी हुई उसे लाठियों, शोर और बस्ती के अंधेरे में गायब होता देख रही थीं।

1 टिप्पणी:

  1. देश का दुर्भाग्य है कि कोई भी सही बात सुनना ही नहीं चाहता..
    गांधी जी के बन्दर बुरा न सुनने के उपदेश देते थे लेकिन सही न सुनने के नहीं..

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