सफरनामा

10 मार्च, 2010

हुसैन की भारत माता पर न्यायमूर्ति कौल का फैसला

मकबूल फिदा हुसैन के खिलाफ़ अश्लीलता और अपमान के आरोपों वाली तीन याचिकाओं ( ११४/२००७, २८०/२००७ और २८२/२००७) जिनमें कि बहुउल्लेखित और चर्चित भारतमाता वाले चित्र वाली याचिका भी शामिल है, पर दिल्ली हाईकोर्ट ने ८ मई २००८ को फ़ैसला सुनाते हुए, खारिज कर दिया था। इस फ़ैसले में न सिर्फ़ कला पर वरन और भी कई मानसिकताओं पर पुरजोर टिप्पणियां की गई हैं।

दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति संजय किशन कौल द्वारा, कला की गहराइयों, कलाकार के नज़रिये, अन्य देशों के कानूनों और न्यायिक मतों, भारत में ही पूर्व मामलों, कलात्मक स्वतंत्रता और अश्लीलता, सामयिक मापदंडों, सौन्दर्यबोध अथवा कलात्मक प्रवृति, साहित्यकारों/कलाविदों की राय, अभिव्यक्ति की आज़ादी, आम आदमी की कसौटी, सामाजिक उद्देश्य या मुनाफ़ा, और दायित्वों की कड़ी कसौटी के मापदंड़ों पर इस मामले को कसते हुए, दिये इस फ़ैसले के कुछ उद्धरणों और चित्र की व्याख्याओं को यहां प्रस्तुत किया जा रहा है। (भारत माता का चित्र नीचे दिया गया है)



अपने फैसले में न्यायमूर्ति कौल ने कहा है--

. अश्लीलता पर भारत और विदेशों में बने कानूनों की कसौटियों पर ऊपर विचार विमर्श किया जा चुका है और वे स्पष्ट हैं। इन कसौटियों के मुताबिक मेरे विचार में यह पेंटिंग भादंवि की धारा २९२ के तहत अश्लील नहीं है। न तो यह पेंटिग कामोत्तेजक है और न ही कामवासना को बढावा देती है। न ही उसे देखने वाला कोई व्यक्ति भ्रष्ट अथवा पतित हो सकता है। दूसरे शब्दों में यह पेंटिंग किसी भी व्यक्ति में कामवासना नहीं भड़काती और न ही उसे भ्रष्ट करती है। इसके बावज़ूद कि कुछ लोग बुरा महसूस करेंगे कि तथाकथित भारतमाता को नग्न दिखाया गया है, पर मेरी राय में इसे अश्लीलता की कसौटी पर ठीक ठहराने के लिए कोई तर्क नहीं है। यह पेंटिंग जिसमें भारत को एक मानवाकृति में दिखाया गया है, किसी अवधारणा का नग्न चित्र होने के नाते किसी तरह से आम आदमी को शर्मिंदा नहीं करती। क्योंकि वह उसका कलात्मक मूल्य भी नहीं खोती।

. कलाकार/याचिकाकर्ता के नज़रिए से इस पेंटिंग को समझने के प्रयास से पता चलता है कि कैसे चित्रकार ने एक अमूर्त अभिव्यक्ति के जरिए एक राष्ट्र की अवधारणा को व्यथित स्त्री के रूप में दिखाया है। कोई संदेह नहीं कि राष्ट्र की अवधारणा लंबे समय से मातृत्व के विचार से जुड़ी हुई है। लेकिन सिर्फ़ इसलिए कि चित्रकार ने इसे नग्न रूप में अभिव्यक्त किया है, अश्लीलता की कसौटी पर सही नहीं उतरती है, क्योंकि इस कसौटी में कहा गया है कि सेक्स अथवा नग्नता अकेले को ही अश्लील नहीं ठहराया जा सकता। यदि पेंटिंग को संपूर्णता में देखा जाए तो यह साफ़ होता है कि प्रतिवादियों के वकील की जो दलील कि यह नग्न है, उसके विपरीत किसी भी देशभक्त भारतीय के मन में इसे देखकर घृणा का भाव नहीं उठेगा और न ही इसमें आंखों को चुभने वाली कोई चीज़ है। तथ्य यह है कि जिसे नग्नता के रूप में अश्लीलता कहा जा रहा है, उसकी वज़ह से पेंटिंग में भौंचक्काकर देने वाला कलाबोध आ गया है, जबकि नग्नता इतनी गैरमहत्वपूर्ण हो गई है कि उसे आसानी से नज़रअंदाज़ किया जा सकता है।

. कभी हैंस हॉफमैन ने कहा था और मैं जिसका उल्लेख कर रहा हूं : “कोई भी कलाकृति अपने आपमें एक दुनिया होती है, जो कलाकार की दुनिया की संवेदनाएं और भावनाएं प्रतिबिंबित करती है”। इसे ही दूसरे शब्दों में एड़वर्ड़ हॉपर ने कहा है : “महान कला किसी भी कलाकार की अंदरूनी ज़िंदगी की बाहरी अभिव्यक्ति होती है”। यदि ये बातें ठीक हैं तो यह कहना अनुचित नहीं होगा कि याचिकाकर्ता हमारे राष्ट्र की बढ़ती हुई अव्यक्त पीड़ा से व्यथित है और उसने उसे कैनवास पर उतारने का प्रयास किया है। इस पेंटिंग में कलाकार की सृजनशीलता का साक्ष्य है। उसमे एक महिला के आंसुओं या अस्तव्यस्त, उलझे हुए खुले बालों के जरिए एक चित्रकार हमारे देश के दुःखी और हताश चहरे की तस्वीर खींचना चाहता है, जो कि घोर वेदना और व्यथा के दौर से गुजर रहा है। इसमें एक महिला के दुःख को उसके लेटने के तरीके जिसमें उसने अपने चहरे को हाथ से ढ़ंका हुआ है, आंखें बंद की हुई हैं और उनमें एक आंसूं छलक रहा है, से व्यक्त किया गया है। महिला को नग्न दिखाना भी उसी अभिव्यक्ति का हिस्सा है और उसका मकसद किसी दर्शक की कामवासना को भड़काना नहीं है, बल्कि उसके दिमाग़ को झकझोरकर रखना है ताकि वह भारत की वेदना से जुड़ सके तथा इसके लिए दोषी व्यक्तियों से घृणा करने पर मजबूर हो। जो भी व्यक्ति पेंटिंग को देखेगा, उसकी प्रतिक्रिया आंसुओं में, मौन या इससे मिलती-जुलती होगी, परंतु कामवासना के रूप में तो कतई नहीं हो सकती। इस पेंटिंग की कई व्याख्याएं हो सकती हैं। एक व्याख्या यह भी हो सकती है कि वह पेंटिंग एक हताशा से भरे हुए भारत को दिखाती है जो कई समस्याओं से घिरा है, मसलन भ्रष्टाचार, अपराधीकरण, नेतृत्व का अभाव, बेरोजगारी, गरीबी, अधिक आबादी, निम्न जीवनस्तर, सिद्धांतों एवं मूल्यों का क्षरण आदि। एक व्याख्या यह भी हो सकती है कि भारतमाता को वंचना से जूझ रहे एक रूपक के तौर पर चित्रकार ने प्रयुक्त किया हो, क्योंकि जिस समय पेंटिंग बनाई गई, उस वक्त देश में भूकंप से काफ़ी बरवादी हुई थी। एक व्याख्या यह भी हो सकती है कि हिमालय की श्रेणियों को एक महिला के खुले बालों और रंगों के उदात्त उपयोग द्वारा दर्शाया गया है। यह कलाकृति को कलाबोध प्रदान करता है।
. इस संदर्भित पेंटिंग में नग्न महिला ऐसी मुद्रा या भंगिमा, में नहीं है और न ही उसके आसपास के वातावरण को इस तरह चित्रित किया गया है कि वह बददिमाग़ लोगों में सेक्सी भावनाएं जगाए, जिसे असम्मानजनक कहा जा सके, जैसी कि प्रतिवादियों की दलील थी।……….यदि भिन्न विचार लिया जाए कि अगर चित्रकार भारत को मानवीय रूप में दिखाना चाहता था तो यह अधिक उपयुक्त होता कि उसे साड़ी या किसी लंबे कपड़े इत्यादि से लपेट देता, परंतु केवल इतना ही उसे दोषी ठहराने में पर्याप्त नहीं है। यह अलग बात है कि कुछ लोग भारतमाता को न्यूड पेंट करने पर कुछ कट्टरपंथी तथा दकियानूसी विचार रखते हों। लेकिन याचिकाकर्ता जैसे व्यक्ति पर इसके लिए अपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता, जो संभवतः भारतमाता को चित्रित करने में और आज़ादख्याल हो। हमारे संविधान में दी गई आज़ादी, समानता और बंधु्त्व की संकल्पना दूसरे विचारों के प्रति असहिष्णुता से नफ़रत करती है।………..

. जिस चीज़ ने कुछ लोगों के दिमाग़ बंद कर दिये हैं, उन्हें स्वामी विवेकानंद का एक कथन अवश्य पढना चाहिए--
” हम हर किसी को अपने मानसिक विश्व की सीमा से बांधना चाहते हैं और उसे
हमारे सिद्धांत, नैतिकता, कर्तव्यबोध और यहां तक कि उपयोगिता का बोध भी
सिखाना शुरू कर देते हैं। सारे धार्मिक संघर्ष दूसरों के ऐसे मूल्यांकन की देन हैं।
यदि हम सचमुच मूल्यांकन करना चाहते हैं तो यह ‘उस व्यक्ति के ख़ुद के आदर्श
के मुताबिक करना चाहिए, न कि किसी दूसरे के’। यह महत्वपूर्ण है कि दूसरों के
दायित्वों को उनकी नज़रों से देखा जाए और दूसरों के रीतिरिवाज़ों तथा प्रथाओं
को हमारे मापदंड़ों से नहीं देखा जाए“।

. हम एक ऐसे चौराहे पर खड़े हैं, जहां हमें आत्मावलोकन करने की जरूरत है, ताकि भीतर और बाहर दोनों देख सकें। ……आधुनिक भारत में समाज के मानदंड़ तेजी से बदल रहे हैं और इसलिए अब आधुनिकता के जमाने में हमें विभिन्न सोच-विचारॊं को खुले दिल से अपनाना चाहिए। लेकिन जहां कलाकार को अपनी कलात्मक स्वतंत्रता मिलनी चाहिए, वहीं वह वो सब करने के लिए स्वतंत्र नहीं है, जो सब वह चाहता है। एक वह कला है जो सुंदरता की अभिव्यक्ति है और दूसरी वह कला है जो अप-संस्कृति की फ़ूहड़ अभिव्यक्ति से भरे दिमाग़ की उपज है। इन दोनों कलाओं में फ़र्क करना होगा। अशिष्ट चीज़ो को बढ़ावा देने वाली कला को सभ्य दुनिया से हटाने की जरूरत है।

. मानवीय व्यक्तित्व तभी भरपूर फलेगा-फूलेगा और इंसानीयत उसी वातावरण में गहरी जड़ें जमा सकेगी और सुगंध दे सकेगी, जहां सभी मिलकर सहिष्णुता औए आज़ाद ख्याली का परिचय दें।

. हमारी सबसे बड़ी समस्या फिलहाल कट्टरपंथ है, जिसने लोकतंत्र की आत्मा का हरण कर लिया है। एक आज़ाद समाज में सहिष्णुता मुख्य विशेषता होती है। ख़ासतौर पर तब जब वह एक बड़ा और जटिल किस्म का समाज हो, जिसमें अलग-अलग मतों और हितों वाले लोग रहते हों। ……………यह समझा जाना चाहिए कि असहिष्णुता विचार-विमर्श और विचार की आज़ादी पर प्रतिबंध लगाती है। इसका प्रतिफल यह होता है कि असहमतियां सूख जाती हैं। और तब लोकतंत्र अपना अर्थ खो देता है।

. कला की आलोचना हो सकती है, बल्कि एक नागरिक समाज में विभिन्न मत व्यक्त करने के कई मंच व तरीके हो सकते हैं। लेकिन अपराध न्याय प्रणाली को किसी कला के खिलाफ़ आपत्ति दर्ज़ करने के लिए उपयोग नहीं करना चाहिए। इसे किसी अविवेकी के हाथ में औज़ार नहीं बनने देना चाहिए, जो इसका दुरुपयोग लोगों के अधिकारों के गंभीर उल्लंघन में करे। खास तौर पर सृजन क्षेत्र के लोगों के।………….

” दुर्भाग्य से इस दिनों कुछ लोग हमेशा पलीता लगाते रहते हैं। और प्रदर्शन करने
जो अक्सर हिंसक हो जाता है, के लिए उत्सुक रहते हैं। मुद्दा दुनिया की कोई भी
चीज़ हो सकती है, कोई किताब, पेंटिंग अथवा फिल्म आदि हो सकती है, जिसने
उनके समुदाय की ‘भावना को ठेस’ पहुंचा दी हो। ऐसी खतरनाक प्रवृतियों पर
लगाम कसनी चाहिए। हम एक राष्ट्र हैं और हमें अनिवार्य रूप से एक दूसरे का
सम्मान करना चाहिए और सहनशीलता रखनी चाहिए“। …………..

. उपरोक्त नज़रिए से याचिकाकर्ता के खिलाफ़ आदेश दिया जाना और गिरफ़्तारी वारंट निकाला जाना रद्द किया जाता है और उनके खिलाफ़ दायर पुनरीक्षण याचिकाओं को मंजूरी दी जाती है……..

उपसंहार

. विभिन्न नज़रियों के प्रति सहिष्णुता किसी का नुकसान नहीं करती। इसका मतलब सिर्फ़ आत्मनियंत्रण से है। लेखन, पेंटिंग अथवा दृश्य मीडिया के जरिए अभिव्यक्ति की विविधता बहस को बढावा देती है। किसी बहस को कभी बंद नहीं किया जाना चाहिए। ‘मैं सही हूं’ का अर्थ यह नहीं होता कि ‘तुम गलत हो’। हमारी संस्कृति विचार और कार्यों में सहिष्णुता को बढ़ावा देने वाली है। इस फ़ैसले को लिखते वक्त उम्मीद है कि यह कला क्षेत्र के लिए खुली सोच और व्यापक सहिष्णुता की भूमिका बनेगा। ९० साल की उम्र के एक चित्रकार को उसके घर पर होना चाहिए–कैनवास पर चित्र उकेरते हुए।


हस्ताक्षर


८ मई, २००८ न्यायमूर्ति संजय किशन कौल


(हुसैन को लेकर सारी बहस ये मान कर हो रही है कि उन्होंने देवी देवताओं की नंगी तस्वीरें बनाईं। मुझे शुरू से इस बात पर आपत्ति है। इस लिहाज से न्यायमूर्ति कौल का ये फैसला बेहद अहम है। मुझे ये रवि कुमार के ब्लाग सृजन और सरोकार में मिला। मूल फैसले का सुनील सोनी ने अनुवाद किया था जिसे उद्भावना के अंक 85 में छापा गया। मैं दोनों महानुभावों के प्रति आभार व्यक्त करते हूं कि उन्होंने एक बेहद जरूरी काम को अंजाम दिया।)

13 टिप्‍पणियां:

  1. आपने आइना दिखाया है, यही बात तो लोगों को समझ नहीं आती। आइने के सामने अपना कुरूप चेहरा देखना कौन चाहेगा। भारत मां की पेंटिग में कहीं अश्लीलता नहीं दिखती और वासना तथा कामभावना की बात तो दिगर है पर चिल्ला पों करने वाले यह समझे तब तो..........
    बहुत सुन्दर, सरगभीZत और प्रेरक पोस्ट

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  2. शानदार,बहुत ही उत्तम लेख लिखा है,सही मायनो लेख जैसा लग रहा है,नहीं तो कुछ लोगों ऐसी लेख के नाम पर ऐई गंदगी बिखेर कर राखी है की क्या बताएं....बिना किसी तथ्य के अंधाधुंध बकवास चाप राखी है

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  3. सहमत हूं पंकज जी....आपका धन्यवाद कि कम से कम अब कुछ लोग तो तथ्य जान पाएंगे....

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  4. ११४/२००७, २८०/२००७ और २८२/२००७ पर जिस पेंटिंग पर निर्णय है विरोध उसका ही नहीं है। भारत माता की उसकी बनायी एक पेंटिंग पर माननीय हाई कोर्ट के निर्णय पर कोई टिप्पणी नहीं चूंकि न्याय का हमें सम्मान करना चाहिये।

    हुसैन को अपनी और भी पेंटिंग्स जैसे शेर की माँ दुर्गा के साथ लैंगिक जुडाव के साथ, गणेश के सिर पर नग्न लक्ष्मी, रावण की जंघा पर नग्न सीता आदि के लिये भी अदालत का सामना कर लेना चाहिये था? कुछ एक पेंटिंग मोहम्मद साहब की भी बना लेते, इस्लाम में इसकी इजाजत नहीं तो क्या हुआ कलाकार् को तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है न? वह ही दुनिया को बताता कि मुहम्मद कैसे दिखते होंगे? आखिर धर्म का नहीं अभिव्यक्ति का मामला है? भगोडा मैदान छोड कर भाग गया :)


    हुसैन के समर्थन में छाती पीटिये। छ्द्म धर्मनिर्पेक्षता हमारे भारत का चेहरा है। हारमोंनियम एसे ही बजाते रहिये उस विदेशी के लिये जो टेक्स बचाने के लिये भारत से भागा।

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  5. यानी सरकार की राय हुसैन के पक्ष में रही है.. लेकिन हुसैन का कहना है कि उन्हे सरकार की तरफ़ से कोई सहयोग नहीं मिला.. इसीलिए उन्होने क़तर की नागरिकता ले ली.. आप क्या समझते हैं कि क़तर में उन्हे अभिव्यक्ति की अधिक आज़ादी मिल पाएगी?
    मैं समझता हूँ कि हुसैन लौट आते और हालात का सामना करते तो बेहतर होता। क्या शाहरुख़ की फ़िल्म को रिली़ज़ करने में सरकार ने मदद नहीं की? और जनता के बड़े वर्ग ने उनका साथ नहीं दिया? हुसैन का यह रवैया जिस में कि विरोध की कोई भी आवाज़ उन्हे बरदाश्त नहीं, क्या लोकतांत्रिक है? विशेषकर जब तब कि उन्होने धार्मिक चरित्रों के साथ छेड़छाड़ की हो? अभिव्यक्ति के एकदम साथ लगा शब्द ख़तरे है, ये आप जानते हैं। हुसैन शायद बिना ख़तरे की, फ़ोकट की आज़ादी की कल्पना कर रहे थे!
    हमारे समाज में समस्या ये भी है कि बहुत सारे अधिकार हमें बिना उनके लिए लड़े प्राप्त हो गए हैं जिनके चलते सामाजिक व्यवहार और क़ानूनी अधिकार में अक्सर खाईयां नज़र आती हैं।
    एक बात ये और कि आप का हुसैन को पूरी तरह बरी कर के केवल बजरंगियो को लताड़ पिलाना एकांगी लगता है। एकाध या दो-चार लताड़ के अधिकारी हुसैन भी हैं।

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  6. और आप ने पता नहीं वो तस्वीरें देखीं हैं या नहीं जिसमें हनुमान, सीता, पार्वती आदि नग्नावस्था में चित्रित किए गए हैं, मैं तो देखीं हैं। और उसमें यह शंका भी नहीं है कि वे हनुमानादि की हैं या नहीं, सीधे तौर पर हैं।
    मेरे मत से इस तथ्य को नकारने से कुछ हासिल नहीं होगा। मुद्दा यही है कि समाज में सहिष्णुता होनी चाहिये। और गुंडागर्दी और तोड़फोड़ का अधिकार किसी को नहीं।
    लेकिन अगर समाज में कुछ अतिवादी तत्व हों, जो कि हर समाज में हमेशा होते हैं, तो कोई क्या करे? उनका मुक़ाबला करे या देश छोड़ दे?
    हम कोई बन्द स्थिर समाज नहीं है। उछलता-कूदता विकसित होता हुआ समाज हैं। बहुत कुछ कूड़ा-करकट जमा है जिससे मुक्ति पानी है। बहुत कुछ अलट-पलट होगी। नैपौल की मिलियन म्यूटिनीज़ वाली बात को ज़रा ठीक से तौलने की ज़रूरत है।
    विरोध करने की मानसिकता इतनी प्रबल हो कर हमारे भीतर बैठ गई है कि हम हर मुद्दे के दो पक्ष ही देखते हैं- इधर या उधर। समर्थन और विरोध से अलग भी नज़रिया हो सकता है जिसमें समस्या के महीन पक्ष उजागर हो सकें।

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  7. समीचीन प्रस्तुति. पर, विरोधियों के लिए तो भैंस के आगे बीन बजाने जैसी ही बात होगी. क्योंकि वो तो डीफ़, डम्ब और नेत्रहीन जैसे हैं - कुछ समझना ही नहीं चाहते!

    अभय जी के लिए - शायद आपने पुराने जमाने के मिनिएचर पेंटिंग और स्कल्पचर नहीं देखे हैं जिनमें देवताओं को खजुराहो शैली में चित्रित किया गया व उकेरा गया है. दरअसल मेरे दृष्टिकोण में परिवर्तन इन प्राचीन कलाकृतियों को देखकर ही हुआ अन्यथा हुसैन की मजम्मत करने वालों में मैं भी था!
    और, किसी भी गांव-शहर में चले जाएं, वहाँ पर बजरंग बली, भैरू जी या शक्ति माता - पत्थर पर बने मिलते हैं, वे नग्न होते हैं, उन में अकसर कोई वस्त्र नहीं होता - बस प्रार्थना व इबादत के फूल पत्र चढ़े होते हैं.

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  8. रवि जी,
    मुझे इस बात से कोई ऐतराज़ नहीं कि हुसैन ने नग्न चित्र बनाए, हमारी परम्परा में तमाम ऐसी चीज़ें है जो बजरंगियों के होश उड़ा देगी, लेकिन बेपढ़ों को कुछ पता नहीं है। मेरी बात पंकज की उस बात के जवाब में है जिस में वे कह रहे हैं :
    "हुसैन को लेकर सारी बहस ये मान कर हो रही है कि उन्होंने देवी देवताओं की नंगी तस्वीरें बनाईं। मुझे शुरू से इस बात पर आपत्ति है।"

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  9. अभय प्यारे, अब वक्त आ गया है कि मैं तुम्हारी बातों का जवाब दूं। हां, मैं इस कथन को आपत्तिजनक मानता हूं कि हुसैन ने देवी-देवताओं की नग्न तस्वीरें बनाईं। मेरी राय में हुसैन ने हिंदू मिथकों से जुड़ी तस्वीरें बनाईं जिन्हें कुछ लोगों ने नग्न कहकर प्रचारित किया। मानो इसमें दूसरी राय ही न हो। हुसैन और उनके चित्रों के खिलाफ फतवा देना, हिंसक होना, भड़काना..सब सायास था। इसका मकसद सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करके राजनीतिक लाभ उठाना था। ऐसा करने वालों की नीयत इसी से समझो कि इस लेख को छापने वाली पत्रिका के कर्ताधर्ता को धोखाधड़ी के आरोप में जेल जाना पड़ा।

    तुम्हारा जस्टिस कौल के फैसले का ये मतलब निकालना गलत है कि सरकार की राय हुसैन के पक्ष में थी। क्या न्यायपालिका और सरकार के बीच इतना सीधा संबंध होता है। न सरकार ने पहले हुसैन के मसले मे चुप्पी तोड़ी थी और न बाद में। जस्टिस कौल का फैसला आने के बाद कम से कम भारत माता के चित्र को विवादित चित्रों की लिस्ट से बाहर कर देना चाहिए था। क्या हुआ?

    आखिर हुसैन विरोधी ये तर्क कहां सुनेंगे कि हुसैन के चित्रों में जो नग्नता दिखाई पड़ती उसका मकसद अपने समय की त्रासदियों को मिथकों के बहाने दिल की गहराइयों में उतारना है, न कि काम भावना भड़काना, जैसा कि जस्टिस कौल कहते हैं।

    सवाल ये भी है कि क्या चित्रों या किसी कलाकृति पर भीड़ का फैसला मान्य होगा, या कलाबोध की परंपरा से दीक्षित लोगों की राय मानी जाएगी। तुम फिल्म विधा से जुड़े हो, क्या मानोगे कि सत्यजित रे की पाथेर पांचाली भारत की गरीबी को बेचने का उपक्रम था। जैसा कुछ लोगों का आरोप है । इसीलिए मैंने पहले भी 'असिकेषु काव्य निवेदनम्' से बरजने वाली परंपरा की याद दिलाई थी।

    मैं स्पष्ट तौर पर मानता हूं कि हिंदू, इस्लाम, ईसाइयत या किसी भी धर्म से जुड़े महापुरुषों का आपत्तिजनक चित्र बनाकर लोगों को भड़काना गलत है। लेकिन क्या सचमुच हुसैन के मसले में यही हुआ। क्या हिंदुओं ने उनके चित्र देखा और भड़क गए। या फिर उन कलादीर्घाओं में हिंदुओं का जाना वर्जित था जहां हुसैन के चित्र प्रदर्शित होते थे। जाहिर है, भावनाएं भड़की नहीं, दशकों बाद ठोस राजनीतिक मकसद से भड़काई गईँ।

    प्यारे मोहन मैंने हनुमान-सीता से जुड़े तमाम प्रसंगों वाले चित्र देखे हैं और मैं उन्हें अश्लील नहीं पाता। इसमें किसी की राय अलग भी हो सकती है। हो सकता है कि कभी कोई न्यायमूर्ति इन पर भी फैसला दे।
    आजकल ये फुटपाथी तर्क चलन में है कि हुसैन मे दम हो तो मुहम्मद साहब या इस्लाम के प्रतीक पुरुषों से जुड़े ऐसे ही चित्र बनाएं। असल अश्लील तो ये सवाल ही है, जो हुसैन को भारतीय मानने को तैयार नहीं है। भाई मेरे, हुसैन ने पंढरपुर में जन्म लिया और फिर इंदौर की गलियों में इक्का चलाने वाले अपने पिता की उंगली पकड़कर दुनिया देखी। उनके इर्द-गिर्द जो कलारूप बिखरा था, वो उसी में दीक्षित हुए। चित्रकला की शिक्षा लेने वे मक्का-मदीना नहीं गए थे। शुद्ध भारतीय कला परंपरा मे दीक्षित हुए। इसीलिए चित्रकार मित्र अशोक भौमिक कहते हैं कि हुसैन की उम्र 95 साल नहीं पांच हजार साल है। खुजराहो और कोणार्क न होता तो हुसैन भी न होते।

    अगर इस्लाम में चित्र बनाने की परंपरा नहीं है, तो इसके लिए हुसैन जवाबदेह क्यों हैं। अगर कतर में अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है तो हुसैन की जिम्मेदारी कैसे। वे दुनिया के किसी हिस्से मे इतनी आजादी चाह रहे हैं जहां वे अपने मन मुताबिक चित्र बना सकें। जहां कोई भीड़ उन्हें निशाना न बना सके।

    आखिरी बात ये है कि मैं हुसैन को न खुदा मानता हूं, न संत। वे चित्रकार हैं और उनमें तमाम मानवीय दुर्बलताएं होंगी ही। मैंने पहले भी लिखा था कि वे भारत में रहकर लड़ाई लड़ते तो बेहतर होता। लेकिन क्या ये लड़ाई सिर्फ हुसैन की है। तमाम लोग अगर हुसैन के पक्ष में हैं तो इसलिए कि परंपरा और संविधान ने एक चित्रकार को जो आजादी दी है, उसकी रक्षा नहीं हो पा रही है। हुसैन के कतर जैसे मजहबी मुल्क में जा बैठने पर ताना देने वाले समझ लें कि इसी लड़ाई के जरिये भारत को कतर बनने से बचाया जा सकता है।

    बाकी, गांधीवादी विचारक प्रशांत कुमार ने हाल ही में जनसत्ता में सटीक टिप्पणी की है कि हुसैन उस देश के नागरिक हैं जिसकी कोई सरहद नहीं है। मस्त रहो।

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  10. चलो वक़्त आया तो!
    मैं तो यह मानने को भी तैयार हूँ कि एक कलाकार को एक पैग़म्बर का मखौल उड़ाने की भी आज़ादी होनी चाहिये और इसी तर्क से मैं डेनिश कार्टूनिस्टो के पक्ष में खड़ा होता हूँ।
    रही बात तुम्हारे हुसैन के चित्रों को अश्लील न पाने की तो उस में मेरी कोई आपत्ति नहीं। मैं कुछ रोज़ पहले ही चकाचक बनारसी के साहित्य की मुख्य धारा से अलगाव पर एक पोस्ट लिखी थी। लेकिन सामाजिक मानकों से चकाचक अश्लील ही कहलायेंगे। उसी तरह हुसैन की तस्वीरों में स्त्रियों के स्तन के विवृत है, उसे सामान्य भाषा में नग्न ही कहा जाता है। और अगर सर्वमान्य ब्रह्मचारी (भले ही अन्यत्र उसके अपवाद मौजूद हों) हनुमान का लिंग उनके लंगोट से झलक रहा हो तो उसे भी श्लील नहीं कहा जा सकता।
    मेरी शिकायत तुम से और दूसरे साथियों से बस इतनी है कि तुम लोगों ने इस मसले में हुसैन को धर्मनिरपेक्षता के झण्डे का पर्याय सा बना दिया है। पहले तो धर्मनिरपेक्षता ही बड़ा जटिल मसला है और हुसैन को उसका प्रतीकपुरुष बनाकर उसकी हर सूरत से सुरक्षा में लग जाना ठीक नहीं। उस से हमारी समझ भोथरी और भोथरीतर होते जाने के ख़तरे हैं। तुम्हारी और प्रंशात कुमार की बातों से ऐसा असर आता है कि हुसैन को इस देश में रखने की ज़िम्मेदारी हम पर थी जिसे निभाने में हम असफल रहे। कलाकार कोई विशेष व्यक्ति होता है, जिस के मान-मनुहार बाक़ी समाज को उठाने होंगे? हम उसकी लड़ाई लड़ेंगे भले वो भी तो हमारा साथ दे। हम तो लड़े पड़े हैं और उधर वो ही हमें रिजेक्ट कर दे?
    पता नहीं किस ऐतबार से तुम भारत के क़तर बनने की सम्भावना देखते हो? सैटेनिक वर्सेज़ बैन करने वाला पहला देश भारत था, तस्लीमा को इसी देश में जूते मारे गए, पं बगाल ने उसे रहने की जगह नहीं दी, उसके बावजूद भी भारत क़तर नहीं बना। हुसैन के चित्रों पर आपत्ति है लेकिन वो प्रतिबंधित नहीं है क्योंकि उस की रक्षा करने वाले आप जैसे लोग मौजूद हैं। भारत क़तर कभी नहीं बनेगा।
    मेरा मानना है कि भारत क़तर तब बनेगा जब हुसैन की तर्ज पर कलाकार, चंद बजरंगियों की धमकियों से किसी और देश में शरण लेने लगेंगे, और बजरंगियों के हौसले को हवा मिलेगी। अगर मनसे के डर से सभी उत्तरभारतीय महाराष्ट्र और मुम्बई छोड़-छोड़ भागना शुरु कर दें तो क्या इस से मनसे को बल नहीं मिलेगा?

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  11. भला हो आप लोगों का क्यों नहीं एक एक आर्डर अपनी मांओं का भी नग्न चित्र बनवालेते हैं हुसैन साहब से....क्यों कि हमारी मांओं के चित्र तो आप बनवा चुके हैं.....अच्छी कलाकृति बनेगी

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  12. भर्तहरि के नीतिशतक के एक श्लोक का अनुवाद कुछ यूं है-------

    बांध सको बौराए हाथी को
    नरम मृणाल के रेशे से
    काट सको वज्रमणि हीरे को
    शिरीष के फूलों की नोक से
    कि किसी में हो शक्ति
    इतनी दिव्य
    कि एक बूंद शहद से मीठा कर दे
    पूरा समुद्र
    वैसा ही है एक काम बड़ा
    रास्ते पर लाना किसी मूर्ख को
    बोलकर मीठी बातें।

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