सफरनामा

31 अक्टूबर, 2010

जो अपराध नहीं कर सकते, क्या वे निर्दोष हैं?

यूपी में हर सरकार कानून का राज चलाने का दावा करते हुए आती है लेकिन जल्दी ही न्याय-देवी की ऐसी मूर्ति में बदल जाती है जिसकी आंखे पारदर्शी पट्टी के पीछे से विरोधियों को घूर रही हैं और जिसने न्याय के तराजू को अपने स्वार्थों की तरफ झुका रखा है। इस “टेनीमारी” का नतीजा यह होता है कि समूचा परिदृश्य अपराधियों के अनुकूल हो उठता है, लोग त्राहिमाम करने लगते हैं। लेकिन यह जो त्राहिमाम सुनाई पड़ता है क्या वह सचमुच की पीड़ा और आम नागरिक की सुरक्षा की चिन्ता से पैदा हुआ है, इसकी पड़ताल किए जाने की जरूरत है।

जैसे ही कोई बड़ी आपराधिक वारदात (आमतौर पर हत्या) होती है जिसमें सरकार को घेरने के लायक सारे रस और तत्व मौजूद हों कई नाटकीय परिवर्तन घटित होते हैं। सबसे पहले गले में सदाचार का ताबीज डाले विपक्षी राजनीतिक दल आते हैं। बयान, भर्त्सना फिर प्रायोजित आंदोलनों का सिलसिला शुरू होता है जिसमें यदा-कदा जनता भी दिखाई पड़ती है। फिर रिटायर्ड पूर्व पुलिस महानिदेशकों, कुछ वानप्रस्थी नौकरशाह और सक्रिय बुद्धिजीवियों के जत्थे प्रकट होते हैं जो प्रवचन शैली में बताते हैं कि कानून-व्यवस्था को सुधारने के लिए क्या-क्या किया जाना चाहिए। तभी उचित अवसर की प्रतीक्षा करती सरकार विपक्षी दलों डपट देती है कि जब आपकी सरकार थी तब आपने क्या किया था। आरोप-प्रत्यारोप में कानून बेचारा विधानसभा के पिछवाड़े कहीं जाकर दुबक जाता है। रिटायर्ड पुलिस महानिदेशकों से कोई नहीं पूछता कि आप जब कुर्सी पर थे, तब आपका यह ज्ञान कहां था। लिहाजा वे बुद्धिजीवियों के साथ मिलकर झुनझुने की तरह बजते रहते हैं। अपराधी कबड्डी खेलते रहते हैं, लोकतंत्र की लीला चलती रहती है।

जो अपराधी सरकारी दल में होते हैं उन्हें वहां एक खास उद्देश्य से भर्ती किया गया होता है। बड़े नेताओं द्वारा उन्हें सुधार कर, जिम्मेदार नागरिक के रूप में समाज को वापस कर देने का यह पवित्र उद्देश्य न्याय के मूलभूत सिद्धांतों पर आधारित है और जनता उन्हे अपने वोट से चुनकर यह इच्छा पहले ही सार्वजनिक कर चुकी होती है। उन्हें सुधारने की नीयत से ही बड़े नेता उन्हें कभी “गरीबों का मसीहा” तो कभी “राबिनहुड बताते” रहते हैं। लेकिन अन्य दलों के जो अपराधी होते हैं वे अनिवार्य तौर पर समाजविरोधी और लोकतंत्र के नाम पर कलंक होते हैं। वे हमेशा इस अवसर की तलाश में रहते हैं कि वे सरकार में घुस कर सुधरने का अवसर पा सकें। अवसरों की संभावना के इस दौर असल कारनामा यह हुआ है कि विधानसभा में आपराधिक पृष्ठभूमि के इतने माननीय पहुंच चुके हैं कि वे चाहें तो मिलकर अपनी सरकार बना सकते हैं और राजनेताओं को सुधारने की परियोजना चला सकते हैं। खैर उन्होंने उन्होंने अपने बाहुबल से राजनीति का चरित्र तो बदल ही डाला है। यही कारण है कि कोई भी सरकार अब कानून का राज नहीं स्थापित कर पाती।

सुखी-संपन्न भविष्य के अचूक फार्मूले के रूप में अपराध को समाज में जबर्दस्त लोकप्रियता मिल रही है। अपराध अब नैतिक मुद्दा नहीं रहा, वह एक तकनीक है। मूल रूझान अब कानून को मानने का नहीं उसे धता बताकर किसी भी कीमत पर कामयाब होने का है। रिश्वत लेने वालों से लेकर दूध में यूरिया मिलाने वाले, नकली दवाएं बेचने वाले, लौकी में आक्सीटोसिन का इंजेक्शन ठोंकने वालों तक, सभी किस्मों के अपराधियों को विश्वास है कि वे महान लोकतंत्र के गुप्त रास्तों से बच निकलेंगे। क्या अब उन्हीं लोगों निर्दोष कहा जाता हैं जिनमें अपराध करने की हिम्मत नहीं है? यह एक ऐसा सवाल है जिसपर सोचा जाना चाहिए।

24 अक्टूबर, 2010

मच्छर-संगीत की स्वरलिपि

एक आदमी के मन में कितनी इच्छाएं होती हैं, शायद इसे कभी जान लिया जाएगा लेकिन इस रहस्य से कभी पर्दा नहीं उठ सकेगा कि दिल्ली, लखनऊ समेत देश में डेंगू से अब तक कितने मनुष्य मर चुके हैं। सरकारी, गैरसरकारी विशेषज्ञों से अब तक इतना पता चल पाया है कि डेंगू एक खास तरह के मच्छर के काटने से होने वाली बीमारी है जिससे बच कर रहना चाहिए। हम सब अपने अनुभव से जानते हैं कि मच्छर काटने से पहले गाना गाते हैं। इस गाने की महीन धुन में एक महान चुनौती है, एक हुंकार है। वे पूछते हैं कि आपने कई परमाणु परीक्षण कर दुनिया को बता दिया कि एटम बम बना सकते हैं, आपके डाक्टरों की दुनिया भर में साख है और अब दुनिया के नक्शे पर आर्थिक सुपर पॉवर बनने जा रहे हैं लेकिन आप हमारा बाल-बांका क्यों नहीं कर पाए? यह गाना और गंभीर इसलिए हो जाता है क्योंकि इसे ऐसा कीट गा रहा है जिसने दुनिया में किसी भी जानवर की तुलना में सबसे ज्यादा मनुष्यों को मौत की नींद सुलाया है।

मच्छरों पर दुनिया भर में घूम कर शोध करने में जिन्दगी लगा देने वाले हावर्ड विश्विद्यालय के प्रोफेसर एन्ड्रयू स्पीलमैन और पुलित्जर विजेता पत्रकार माइकेल डी. एन्तोनियो ने एक अद्भुत किताब लिखी है। इस किताब, “मस्कीटोः ए नेचुरल हिस्ट्री आफ अवर मोस्ट परसिस्टेन्ट एंड डेडली फो” में स्पीलमैन तथ्यात्मक ढंग से बताते हैं कि ये मच्छर ही थे जिन्होंने सिकन्दर और चंगेज खां की सेनाओं को हरा दिया था और उनके विश्वविजेता बनने के सपने धरे रह गए। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय डीडीटी (डाइक्लोरो डाइफिनाइल ट्राइक्लोरो ईथेन) आने के बाद वैज्ञानिकों ने मान लिया था कि मच्छर खत्म हो गए लेकिन यह भ्रम था। वे ज्यादा ढीठ होकर नए क्षेत्रों में फैलते गए और आज भी सारी दुनिया में नरसंहार का गाना गाते मंडरा रहे हैं।

लेकिन ये वैज्ञानिक हमारी हिन्दी पट्टी के मच्छरों को नहीं जानते। पौन इंच से भी छोटे आकार के इन मच्छरों ने सरकारों, दवाओं और आदमियों का स्वभाव बदल डाला और उनसे अभयदान पा लिया है। ढाई-तीन दशक पहले जब न तकनीक थी न इतने संसाधन गांवों की दीवारों पर स्वास्थ्य विभाग के कारिन्दे सफाई रखने और कुनैन की गोली खाने की सलाहें लिख रहे थे, बच्चों की जांच के लिए स्कूलों में खून की स्लाइडें बन रही थीं और छोटे कस्बों में दवाओं का छिड़काव हो रहा था। आम लोगों को लगता था कि सरकार को उनकी जान की फिक्र है और मलेरिया बस थोड़े दिनों का मेहमान है। जब से
शेयर बाजार के रास्ते देश को सुपर पावर बनाने का रायता फैलना शुरू हुआ, सबकुछ बदल गया। मच्छर तो वही रहे लेकिन वह आदमी बदल गया जो मलेरिया, डेंगू और कालाजार से लड़ने चला था। वह खुद मच्छर हो गया और सरकारी परियोजनाओं से रकम चूसने लगा। उम्मीद की जगह हताशा ने ली और आम आदमी ने खुद को रामभरोसे छोड़ दिया।

मच्छरों ने यह कारनामा कैसे किया। इसका रहस्य संगीत की उस स्वरलिपि में है जिसमें उनके गाने की ताल, मात्राएं और राग दर्ज हैं। वह भ्रष्टाचार के संगीत की स्वरलिपि है जिसे हम सब अच्छी तरह जानते हैं। मच्छर गा रहे हैं और उनके विनाश की परियोजनाएं चलाने वाले नेताओं, प्रशासकों, वैज्ञानिकों, चिकित्सकों, बुद्धिजीवियों का एक बड़ा तबका उस महीन धुन पर थिरक रहा है। विचित्र सांस्कृतिक समारोह जारी है।

19 अक्टूबर, 2010

जोगी काहे ध्यान लगाए!

ध्यान की रहस्य गली में लारेन्स लीशान(http://en.wikipedia.org/wiki/Lawrence_LeShan)की मशहूर किताब 'हाऊ टू मेडिटेट' का पहला सफा कुछ यूं खुलता है:

यह वाकया कुछ बरस पहले वैज्ञानिकों की काफ्रेंन्स के दौरान हुआ। वे सभी वैज्ञानिक रोजाना ध्यान (मेडिटेशन) करने वाले थे। कांफ्रेन्स के चौथे दिन तक वे सभी किसी न किसी रूप में बता चुके थे कि वे कैसे ध्यान लगाते हैं, तब मैने जोर डालना शुरू किया कि वे बताएं कि क्यों ध्यान करते हैं। इसकी जरूरत क्या है। कई जवाब आए लेकिन हम सभी जानते थे कि वे संतोषजनक नहीं हैं। जो कहा जा रहा था वह इस सवाल का जवाब था ही नहीं। आखिरकार एक आदमी खड़ा हुआ और उसने कहा, "यह अपने घर लौटने जैसा है।" इसके बाद चुप्पी छा गई। देर तक सहमति में एक एक कर सिर हिलते रहे। जाहिर है कि अब किसी और जवाब की जरूरत नहीं रह गई थी।

मेडिटेशन क्यों? इस सवाल का उत्तर उस साहित्य में अनवरत गतिमान है जो इस अनुशासन का अभ्यास करने वालों ने लिखा है। हम कुछ पाने के लिए, फिर से स्वस्थ्य होने के लिए और सबसे बढ़कर अपनी उस किसी चीज (something) के पास लौटने के लिए ध्यान करते हैं जो कभी हमारे भीतर थी, जिससे हम अनजान थे या बस मद्धिम सा आभास था। फिर इसके पहले कि हम जान पाते कि वह चीज क्या थी, पता नहीं कहां और कब हमसे खो गई।

इसे हम अपनी भरपूर मानवीय क्षमता को पाने, या खुद के और यथार्थ के निकट होने, या जिजिविषा-उत्साह-प्यार करने के नैसर्गिक भाव को पाने, या हम ब्रह्मांड का भाग हैं और इससे कभी जुदा नहीं हो सकते के ज्ञान से रूबरू होने, या सचमुच प्रभावशाली ढंग से देखने और सक्रिय होने की अपनी क्षमता को हासिल करने का उपक्रम कह सकते हैं। जब हम ध्यान की दिशा में जुटते हैं तो पाते हैं कि मकसद के बारे में कही गई इन सारी बातों का मतलब एक ही है। उस क्षति के कारण ही, जिसकी भरपाई की तलाश ध्यान है, मनोवैज्ञानिक मैक्स वेरदाइमर ने वयस्क को "क्षतिग्रस्त बच्चे" के रूप में परिभाषित किया था।

ध्यान की झेन पद्धति का लंबे समय तक अध्ययन करने वाले यूजीन हेरीगेल ने लिखा है," कोआन (झेन स्कूल की एक ध्यान तकनीक) ऐसे बिन्दु पर ले जाती है जहां आप किसी भूली चीज को याद करते आदमी बन जाते हैं।" लुईस क्लाड डी सेन्ट मार्तिन ने ध्यान में अपने बहुतेरे साल खपाने के कारणों का सार कुछ इस अंदाज में पेश किया था, "हम सब विधवा जैसी हालत में हैं और हमारा काम फिर से विवाह करना है।"

अपनी सम्पूर्ण मानवता और मानव होने का जो भी अर्थ है उसका संपूर्ण उपयोग ध्यान का लक्ष्य है। ध्यान एक दृढ़ मन की जरूरत वाला कठोर अनुशासन है जो इस लक्ष्य की ओर जाने में सहायता करता है।

अंत में यह क्षेपक मेरी तरफ से जो युवा वेदांती शंकर ने कहा था-
प्रातः स्मरामि हृदि संस्फुरदात्मतत्वं
सच्चित्सुखं परमहंसगतिं तुरीयम।
यत् स्वप्नजागरसुषुप्तमवेति नित्यं
तद्ब्रह्म निष्कलमहं न च भूतसंघः।।

(प्रातः मैं उस आत्मतत्व का ध्यान करता हूं जिसका स्फुरण हृदय में होता है। जो सत्-चित-आनंद स्वरूप है। जो परमलक्ष्य है, तुरीय अवस्था है। जो स्वप्न, जागृति और सुषु्प्ति तीनों अवस्थाओं का नित्य प्रकाशक है। मैं भूतों का समूह मात्र नहीं मैं वही निष्कल ब्रह्म हूं। )