सफरनामा

12 अक्टूबर, 2010

पेड़ लोग औऱ गिरिबाला

पेड़ सम्मोहक क्यों लगते हैं। बस इसलिए कि हरे होते हैं, आक्सीजन देते हैं और जंगलात महकमें के सरकारी कर्मचारियों ने एक "वृक्ष दस पुत्र समान" जो तुकबंदियां रची हैं उन सबके समर्थन में हवा चलने पर सिर हिला कर हांजी! हांजी!! करते हैं? लालची आदमी कितने भी उत्पात क्यों न करे अपने अवचेतन में जानता है कि उसकी जिन्दगी बापनुमा पेड़ों पर निर्भर है, इस डर के कारण। या उनके भीतर से गुजरता आसमान अपना एकरस अनंत विस्तार भूल, झिलमिल वैविध्य दिखाने लगता है इसलिए? पेड़ों का अपना व्यक्तित्व होता है। बरगद संरक्षण देता लगता है और देवदार आत्मकेंद्रित रूक्ष हठयोगी और हरसिंगार जैसे "फूलबाबू" जिसकी अंतर को छू लेने वाली उदारता देख कर कभी-कभार यारा-दिलदारा टाइप कोई गाना गाने का मन होता है। भारतीय फिल्मों के इतिहास में सर्वाधिक गाने हीरो हिरोइनों से पेड़ों के इर्द गिर्द इसी मानसिक कुलेल पर नियंत्रण न कर पाने के कारण ही तो नहीं गवाए गए।

पेड़ों की जिंदगी होती है, क्या उन्हे पता है कि उनका हरा रंग आदमी को अच्छा लगता है और वे उसे प्राणों की सप्लाई करते हैं। आदमी को क्या शुरू से ही यह हरा रंग भा गया कि हरियाला बन्ना या बन्नी होना चाहने लगा। या बहुत दिनों वह चारो ओर के संघन, अंधियारे हरे विस्तार से डरता रहा फिर धीरे-धीरे पेड़ो से होने वाले कुल जमा नफा नुकसान का मिलान किया और उसका सौंदर्य बोध हरा हो गया। सौंदर्य बोध व्याकरण जैसी प्रशिक्षण की चीज है जिसमें अन्य अनुशासनों की तरह भय घुला होता है। इसीलिए अप्रशिक्षित लोग लोग बड़े कलाकारों की बड़ी पेन्टिंग्स को समझ नहीं पाते बस थोड़े से कला-ग्रामर जानने वाले लोग समझते, खरीदते और सराहते हैं और उनमें से भी कई ऐसे होते हैं जो इसलिए बढ़चढ़ कर सराहते हैं कि कहीं उनकी न समझने वाली असलियत का सचमुच के ज्ञानियों को पता न चल जाए।

अगर आदमी बुद्धिमान है तो उसने खुद को पेड़ों की तरह अपने भीतर क्लोरोफिल और फोटोसिन्थेसिस का फंडा क्यों नहीं विकसित किया। पापी के पेट के सवाल को सदा के लिए सूरज और बारिश पर छोड़ देता और मनचाहे काम करता। आदमी की जात को समर्पण पसंद नहीं हैं। कैसे सूरज पर छोड़ देता। उसे ईगो प्यारा है जिसे पौरूष कहा, जिसपर पत्थर के भाले बनाते, शिकार करते धार चढ़ती गई। (पता नहीं नारीवादियों ने पाषाणकाल की महिला शिकारियों के गौरव के लिए कौन सा शब्द ईजाद किया होगा) अब भी वही है क्योंकि दो वक्त की रोटी के आसपास जरा और सरंअजाम जुटाना ही मुख्यधारा का पौरूष है। वैसे गिरि बाला और थेरेस न्यूमान जैसे लोग भी हुए हैं जिनके भीतर फोटोसिन्थेसिस जैसा एक केमिकल लोचा सायास विकसित हो गया और बिना कुछ खाए उन्होंने मौज से अपनी जिन्दगी जी। 1868 में बंगाल में पैदा हुई गिरिबाला को सास ने हमेशा खाते रहने के लिए इतने ताने मारे कि उनने 1881 में एक दिन खाना बंद कर दिया और योगिनी हो गईं। बाद के छप्पन सालों में वैज्ञानिकों ने अंदाजा लगाया कि उनका मेडुला आबलांगेटा सूरज की रोशनी से सीधे उर्जा बनाने लगा था। रिकार्ड बताते हैं कि बर्दवान के महाराजा ने परीक्षण के लिए दो महीने उन्हें एक कोठरी में बंद रखा जिसमें वह सफल साबित हुईं। न्यूमान के बारे मे नेट जानकारियों से लदा हुआ है क्योंकि उन्हें देखने के लिए 1923 तक दुनिया भर के लोग पहुंचते थे और उनपर "स्टिगमाटा" नाम की एक फिलम भी बनी है।

जानवर, आदमी से ज्यादा जानते हैं कि उनकी जिन्दगी पेड़ों पर निर्भर है तो वे कभी उनके प्रति किसी आभार का संकेत क्यों नहीं देते। जहां जंगल कटते हैं जानवर, पक्षी भी खत्म हो जाते हैं। यह आभार प्रकट करने का तरीका नहीं है क्या? सेव टाईगर कैम्पेन किसका आभारी है।

08 अक्टूबर, 2010

उनकी सांसों के आगे सहम जाती है बंदूक-2

नवस्वामी ज्योतिष और नवसाध्वी देवी
चेतना का पूरी तरह आतंरीकरण सीखने (शरीर से समेट कर मेरूदंड में लाने की प्रक्रिया) में कई साल लग सकते हैं, कई जन्म भी लग सकते हैं लेकिन सांस पर नियंत्रण में मामूली प्रगति भी बड़े परिणामों तक ले जाती है। इसके जरिए मिला मानसिक संतुलन हमें निर्मम परीक्षाओं के दौरान शांत रहने, शांति और करूणा के साथ दूसरों की तकलीफ दूर करने और अपने काम में सफलता पूर्वक एकाग्र रहने में मदद करता है।

देवी एक बार नाजुक चाइना कप और क्राकरी का एक भारी बक्सा लेकर अपने घर से ऊपर पहाड़ी पर गई। उसकी बांहें थक गईं और वह डरने लगी कि बक्सा अब गिरा कि तब गिरा। एक क्षण के लिए वह थमीं तो उसका ध्यान अपनी सांस पर गया जो तनावग्रस्त और उथली थी। कुछ गहरी सांसे लेने के बाद उसने तुरंत महसूस किया कि तनाव जा रहा है और उर्जा शरीर में ज्यादा शक्ति से बह रही है।

गहरी और खुली सांस आपको एक खुली और स्वीकार से भरी जिन्दगी की तरफ ले जाती है। इसके उलट तनावग्रस्त, सिकुड़ती सांस को डर और क्रोध की सोहबत मिलती है।

भावना और चेतना में बदलाव
सांस के औजार के इस्तेमाल से भावनाओं को नियंत्रित करना आसान है। सबसे पहले तो यह जानें कि सांस की तीन अवस्थाएं हैं और हर एक का खास मनोवैज्ञानिक मतलब है। खींचना (इनहेलेशन) उर्जा की उर्ध्व, उद्दीप्त गति और मेरूदंड में चेतना के परिणामी भाव से जुडा है। रोकने (रीटेनशन) से उर्जा और ध्यान को एकाग्र करने में मदद मिलती है और बाहर छोड़ना (एक्सहेलेशन) राहत, आश्वस्ति, ग्रहणशीलता औऱ समर्पण की मानसिक अवस्थाओं को प्रोत्साहित करता है।

सांस की इन अवस्थाओं के जरिए अपनी चेतना को कारगर ढंग से बदला जा सकता है। जब आप हताश, नकारात्मक मनःस्थिति में हों, बाहर जाती सांस की तुलना में प्रबल और लंबी सांस खींचे। मतलब सांस लें ज्यादा और छोडें कम। अक्सर सीधा शारीरिक रास्ता आपकी मनःस्थिति को जल्दी बदलता है, विचारों में परिवर्तन का तरीका धीमे काम करता है। खुद को कमजोर महसूस करने वाले मेरूदंड में ऊपर की ओर उर्जा के शक्तिशाली बहाव को देखने की कल्पना करते हुए गहरी सांस लें। इस तरह के सांस-मनोविज्ञान का सफल इस्तेमाल अस्पतालों में हताश मानसिक रोगियों के इस्तेमाल में किया जा चुका है।
मामूली लगते सांस के अभ्यास गहरा असर पैदा करते हैं क्योंकि हमारे ज्यादातर विचारों की प्रकृति मेरूदंड में उर्जा की गति पर निर्भर करती है। आज मैं जमीन से छह इंच ऊपर हूं...मैं सातवें आसमान पर हूं...मैं अपना सर ऊंचा करके चल रहा हूं...मैं हवा में उड़ रहा हूं....ये अभिव्यक्तियां एक ही अनुभूत सत्य की है कि चेतना की ऊर्ध्वगति शरीर में उर्जा के ऊपर की ओर चलने के साथ संभव होती है। जब हम अपने सांस के प्रयोग से ऊर्जा के प्रवाह को उर्ध्वगामी बनाते हैं तो पाते हैं कि हमारे विचार अपने आप बदलने लगे हैं।

विशेष श्वसन तकनीकशरीर को ऊर्जा पूरित करने के लिए परमहंस योगानन्द "दोहरी सांस" (डबल ब्रीदिंग) का अभ्यास कराते थे। इसमें एक छोटी फिर एक लंबी सांस नाक से अंदर खींचते हैं फिर एक छोटी और एक लंबी सांस मुंह से बाहर छोड़ते हैं। शोधों से भी साबित हुआ है कि दोहरी सांस सामान्य की तुलना ज्यादा संपूर्ण तरीके फेफड़ों को भरती और खाली करती है। मेडिटेशन के लिए मन को शांत करने के लिए योगानन्द सभी तीन अवस्थाओं खींचने, रोकने, छोड़ने का अभ्यास समान गिनती के साथ, समान अवधि तक कराते थे।

योगानंद यह भी कह गए हैं कि नथुनों में सांस का प्रवाह जहां महसूस होता है, वह मष्तिष्क को प्रभावित करता है। औपचारिक और अपनी ही धारणाओं में जीने वाले (जजमेन्टल) लोग सिकुड़े हुए नथुनों के बीच संकीर्ण ढंग से सांस लेते हैं जैसे वे दुनियावी झंझटों को अपने भीतर बहुत ज्यादा नहीं जाने देना चाहते। कई लोग मुंह से सांस लेते हैं जो मेरूदंड में ऊर्जा को नीचे की ओर ले जाता है और दिमाग को भरपूर आक्सीजन नहीं मिल पाती। योगानन्द कहते थे कि सांस के बहाव को नाक में ऊपरी हिस्से में महसूस करना चाहिए जहां से आक्सीजन आसानी से दिमाग के फ्रंटल लोब में समा जाती है।

सांस ही रूक जाए तोसांस न ली जाए तो क्या होगा। जब गहरे ध्यान में मन बेहद शांत हो जाता है तो सांस रूक जाती है। एक साधारण सी ध्यान तकनीक है जिसमें सांस की आवाजाही पर सतत निगरानी रखी जाती है, इससे एकाग्रता बढ़ती है जो दिमाग को शांत कर देती है। दिमागी शांति सांस को धीमा कर देती है जो फिर दिमाग को शांत करती है। यह एक चक्र है जिसके जरिए मेडिटेशन कर रहा व्यक्ति सबल एकाग्रता के साथ ध्यान में गहरे और गहरे उतरता जाता है।

जब सांस धीमी हो जाती है तो हृदय को कम काम करना पड़ता है और धड़कने की गति मंद पड़ने लगती है। योगानन्द कहते थे कि हृदय चक्र "मेन स्विच" है जो मेरूदंड से शरीर में बाहर की तरफ जाती ऊर्जा को नियंत्रित करता है। जब हृदय मंद होता है तो अपने आप प्राण मेरूदंड में सिमट आते हैं और शरीर निलंबित हालत में पहुंच जाता है जहां सांस लेने की जरूरत नहीं रह जाती।

ब्रह्मांड चेतना का दरवाजा मशहूर किताब "लाइफ आफ्टर लाइफ" में जिन लोगों के अनुभव रिपोर्ट किए गए हैं, वे कहते हैं कि आपरेशन के दौरान जब उनका दिल ठप हो गया तो उन्होंने खुद को एक अंधेरी सुरंग से गुजरते पाया जो प्रेम और आनंद की अनुभूति कराने वाले चमकीले सफेद प्रकाश की ओर जा रही थी। स्वामी क्रियानन्द का मानना है कि यह सुरंग आतंरिक मेरूदंड है, जहां गहरे ध्यान में प्रवेश किया जा सकता है और चमकीला सफेद प्रकाश आध्यात्मिक आंख का प्रकाश है।

भौंहों के बीच के बिन्दु को योगानंद ने आध्यात्मिक आंख या ब्रह्मांड चेतना का दरवाजा कहा। आध्यात्मिक आंख पर ध्यान लगाकर हम अपनी चेतना को मष्तिष्क के मेडुला आब्लान्गेटा से फ्रंटल लोब्स की ओर ले आते हैं जो उच्चतर चेतना का केंद्र है। गहरे ध्यान में जब हम पांच कोनो वाले सितारे से आगे बढ़ते हैं तो ब्रह्मांड चेतना या समाधि की अनुभूति होती है। इसी आंतरिक समाधि के बारे में संत पॉल ने लिखा था कि मैं "रोज मरता हूं।" इस अवस्था में सांस बंद हो जाती है, जीवन ऊर्जा शरीर से मेरूदंड में सिमट आती है और साधक अपने शरीर को इच्छानुसार छोड़ सकता है।

हम सभी को कभी न कभी मरना ही है। लेकिन गहरे ध्यान में मेरूदंड की सुंरग से आध्यात्मिक आंख के प्रकाश की ओर जाते हुए हम मृत्यु को भय के बजाय आनंदमय तरीके से महसूस कर सकते हैं।

कितनी अच्छी बात है कि सांस जो हमारे अस्तित्व की बुनियाद है वही हमें आत्मसाक्षात्कार की ऊंचाईयों तक भी ले जाती है। जिन्दगी पर नियंत्रण का सारा रहस्य सांसों में है क्योंकि उनके बिना जिन्दगी नहीं चलती।

सांसों के आगे सहम जाती है बंदूक

नवस्वामी ज्योतिष और नवसाध्वी देवी


सान फ्रांसिस्को पुलिस की नारको सेल का अफसर स्तान टाउन्सले हाइत ऐशबरी जिले की एक इमारत की अंधेरी सीढ़ियों पर एक ड्रग डीलर का पीछा करते भागा जा रहा है। ड्रग डीलर के पास असलहा है अद्धी (नाल कटी बंदूक)। सीढ़िया खत्म हुईं, अपराधी गलियारे के अंतिम छोर तक गया। वह फंस चुका है, बौखलाया हुआ है और अब बीस साल की जेल से बचने के लिए अद्धी का इस्तेमाल ही आखिरी विकल्प है। तो यही सही, वह अद्धी टाउन्सले के सीने पर तान देता है।

इस ख्याल से सहम कर कि क्षण भर में किस्सा तमाम हो सकता है, स्तान ने डीलर की आंखों में देखा। मैं बस इतना सोच पाया कि मुझे उसकी आंखों से आंखे नहीं हटानी हैं, स्तान ने उस लमहे को याद करते हुए बाद में बताया, "तो उसकी आंखों में देखते हुए मैने जता दिया कि मेरा इरादा उसे नुकसान पहुंचाने का नहीं है।" पुलिस ट्रेनिंग के दौरान मैने सीखा था कि शांत, गहरी सांस से दिमाग नियंत्रित होने लगता है सो मैने सायास कुछ गहरी सांसे भरी। काफी राहत मिली। शांति और समझदारी उस तक संप्रेषित करते हुए फिर मैने धीरे से अपना हाथ उठाया, हथेलियों को ऊपर किया।

उसने अपनी बंदूक झुका दी और फर्श पर ढह गया।

स्तान (बदला हुआ नाम) परमहंस योगानंद का शिष्य है। हममे से कुछ ने बंदूकों की नालों के सामने भी अपने योग के संतुलन की परीक्षा की है। पेशे अलग-अलग हो सकते हैं लेकिन हममें से हर एक ने किसी कदर सांस, दिमाग और भावनाओं के बीच के संबंध को महसूस किया है।

आतंरिक उर्जा का पता देती है सांस
हम गुस्से में होते हैं तो सांस लेने में प्रयास करना पड़ता है और यह उखड़ने लगती है। डर में हम उथली और तेज सांस लेते हैं, कभी रूक भी जाती है। दोनों परिस्थितियों में सांसों से हमारी उर्जा या प्राण की आंतरिक हालत का पता चलता है।

योगियों के लिए प्राण शब्द एक ही मूल उर्जा की तीन अलग-अलग अभिव्यक्तियां हैं। सबसे बाहरी रूप में यह सांस है। जरा भीतर यह हमारे शरीर की जीवन उर्जा बन जाती है। ...और सबसे भीतर यह सूक्ष्म, बुद्धिमत्तापूर्ण उर्जा है जो सारी सृष्टि में व्याप्त है। योग के प्राचीन ग्रंथों के अनुसार इनमें से किसी एक को नियंत्रित करने से हम दूसरी को भी नियंत्रित करने लगते हैं।

योग के मुताबिक अध्यात्मिकता के विकास के केंद्र में उर्जा का नियंत्रण है। परमहंस योगानन्द ने प्राणों के प्रवाह को शरीर में महसूस करना, उन पर नियंत्रण और इच्छानुसार शरीर को उर्जा से भरना सिखाने के लिए "एनर्जाइजेशन कसरत" की ईजाद की थी। स्वामी क्रियानंद ने योगमुद्राओं के बारे में लिखा है कि वे कैसे प्राण को तीन बुनियादी रूपों में- उसके मुक्त प्रवाह के रास्ते खोल कर, उसे गतिमान करके और उसे मेरूदंड में ऊपर उठाकर प्रभावित करती हैं। प्राण उर्जा के नियमन के जरिए योगमुद्राएं दिमाग और भावनाओं पर बेहतर नियंत्रण का जरिया बन जाती हैं।

जो महज जीवन उर्जा को नियंत्रित कर ले जाते हैं उन्हें भावनात्मक स्थिरता, गहरी शांति और शारीरिक शक्ति प्राप्त होती है। लेकिन कुछ जो सूक्ष्म उर्जा की हलचल अपने शरीर में महसूस कर पाते हैं, वे ब्रह्मांड की सूक्ष्मतर उर्जाओं की थाह भी पाने लगते हैं। तो योग का अभ्यास सांसों पर नियंत्रण से प्रारंभ होता है। अगर हम प्राणों को अपने शरीर में हर तरफ चला सकते हैं तो हम उन्हें नियंत्रित भी कर सकते हैं। योग में सांस लेने की तकनीकों के जरिए यही तो किया जाता है।
(यह राइट अप पचीस साल पहले इन दोनों योगियों ने संयुक्त रूप से योगा जर्नल में लिखा था जो संभवतः आगे भी हारमोनियम पर जारी रहेगा)